Thursday, 20 July 2023

मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें?

प्रश्न :- मन और चेतना क्या अलग अलग वस्तु है या एक हीं है अन्तर क्या है? सुख और दुख कि कारक चेतना है या मन? कृपा करके मेरे संसयकाे दुर करेगें?

मेरा उत्तर :- अंत:करण चातुष्ट मन बुद्धि, चित तथा अहंकार को कहते हैं । संक्षिप्त में :- बिचारो का प्रवाह है मन और चेतना प्राण वायु या प्राण उर्जा का प्रवाह है । 
संक्षिप्त में बताऊं आपको कि अंतःकरण चातुष्ट्य मन बुद्धि चित्त और अहंकार को कहते हैं । 
यह हमारे सुक्ष्म शरीर का अंग है ।
मानव शरीर में आत्मा अपने कारण शरीर ( अपनी अतृप्त इच्छा, वासना और प्रारब्ध ) एवं सुक्ष्म शरीर के साथ प्रवेश करती है । हमारा यही कारण शरीर भगवान द्वारा फल के रूप में निहित प्रारब्ध के कारण तय योनि में स्थूल शरीर के प्रकार को प्राप्त करता है । अगर मानव शरीर मिला तो फिर कुल , गोत्र, धर्म, जाति , देश , गांव, अमीर , गरीब परिवार , गुण प्रकार परिवार (जैसे सात्विक ,राजसिक या तामसिक ) में जन्म होता है । 
जैसे हीं शरीर में आत्मा का प्रवेश होता है वैसे ही शरीर का यह सौफ्ट वेयर जिसको अंत:करण चातुष्ट्य कहते हैं एक्टीभ हो जाता है । यानि शरीर में दस प्रकार के प्राण 72000 नाड़ियो द्वारा पुरे शरीर को चेतन मान कर देती है।
जिसमें पांच प्रमुख प्रान , यानि 1 प्राण ,2 अपान ,‌3 व्यान , 4 समान, और 5 उदान , एवं तीन मुख्य नाड़ियां इड़ा , पिंगला , सुषुम्ना नाड़ी है । 
और अंतिम दसवां प्राण धनंजय कहलाता है जो मरने के बाद जब तक देह का फुनरल यानी जलाने के बाद हीं शरीर से निकलता है अग्नी मार्ग द्वारा ।

तो अब विज्ञान से भी साबित है ( सिगमंड फ्रायड का नाम सुना होगा मशहुर साईक्लोजीस्ट ) 
जिसने भी सिद्ध किया की 
जीव तीन अवस्था में ही जीता है जब तक जीता है तबतक , ये तीन अवस्था है - 
१. जागृत ( जिसको conscious mind कहते हैं )
 २. अर्ध जागृत ( जिसको subconscious mind ,) 
३. पूर्ण सुसुप्ति ( जिसको unconscious mind ) कहते हैं ।
और 99.9% मानव इड़ा और पिंगला में हीं तमाम उम्र गुजार देते़ है । 

पर संत महापुरुष , असली भक्त , योगी आदि सुषुम्ना में अपने प्राणों के संचार को तीव्र और स्थिर कर लेतें हैं । जिससे वो जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपनी इच्छा से इस मृत्यु लोक में आते जाते हैं । उनपर काल का बस नहीं चलता । वे स्वेच्छाचारी होते हैं , सुसुप्ति अवस्था में भी हमेशा जागृत रहते हैं । या यूं कहिए की वे हमेशा हर अवस्था में जागृत रहतें हैं । जिसको जागृत महावस्था कहते हैं सर्वांतर्यामी अवस्था, सर्व दैविय शक्ति और ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न । (always awakening ) जैसे हमारे प्रभु श्री कृपालु महाप्रभु जी ।

और हम लोग इड़ा या पिंगला नाड़ी में ही जीते हैं तो जिसका जो नाड़ी अधिक एक्टींभ होगा वो उसी प्रकार के दो प्रकार के गुणों यानि रजोगुण या तमो गुणी स्वाभाव का होगा । उसका प्रसनैलटी , सोच बुद्धि आदि उसी गुणों के सापेक्ष में होती है । जिसका अनुभव सबको है । कि वो किस प्रकार के सोंच व व्यक्तित्व का जीव है । 

पर जो जीव ( साधक ) महान महापुरूषों के संग में आ जाता है तो धीरे धीरे उनका सुषुम्ना नाड़ी में दिव्य प्राण उर्जा का प्रवाह अपने आप शुरू होने लगता है पर यह साधना के स्तर पर निर्भर करता है । चाहे वो भक्ति मार्गी हो या जप तप , योग मार्गी । पर कलयुग में केवल भक्ति मार्ग जल्दी और तुरंत फलदाई है । 

वांकी आज के तथाकथित योग केवल दो नाड़ी यानि इड़ा और पिंगला को ही मैनेज करती है रामदेव बाबा वाला योग , जिससे कफ पीत वात को ठिक करके जीव रोग मुक्त हो सकता है । पर भक्ति से सुषुम्ना नाड़ी एक्टिभ हो जाता है , जिसका प्रारंभिक प्रमाण है तत्वज्ञान , यादास्त आदी काफी मजबुत हो जाना । मैं यह आपको अपनी यादाश्त से लिख के ज़बाब दे रहा हुं । और अगर आप फिजाकली सामने होते तो और भी डिटेल्स में आपको बता पता ।

सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों की ज्यादा प्रवाह जीव को पहले सतोगुणी बनाता है । फिर भगवद् प्राप्ति के साथ हीं निर्गुण हो जाता है । और जैसे हीं निर्गुण होता है उसी क्षण गुरू द्वारा शरीर दिव्य हो जाता है और फिर कमाल होता है। उस जीव कि चेतना दिव्य होकर उसका प्रवाह भगवान के तरफ होने लगती है , और भगवान को इन्हीं आंखों से देखने लगता है । तो मन तभी एक्टीभ होता है जब शरीर चेतन मान हो , अतः चेतना प्राण उर्जा का प्रवाह है और मन बिचारों के प्रवाह है । दोनों अलग है । पर यह तभी काम करेगा जब शरीर चेतन मान हो , जैसे कार तभी चलेगी जब उसमें पेट्रौल हो ,फिर उस पेट्रोल से अग्नी रूपी प्राण उत्पन्न होकर कार को चलाएमान करता है और मन ड्राईवर है जो उस कार का संचालन और दिशा देता है । 

और सुख दूख का कारण मन है , यही सुख दुख का अनुभव अपने तीन गुणों के प्रभाव वश करता रहता है । जिस समय जिस गुण में स्थिर या लय रहता है जीव को उसी प्रकार का अनुभव होता है । एक ही परिस्थितियों को अपने इन्हीं गुणों के प्रभाव के वश अलग अलग सुख दुख के मात्रा और प्रकार को फिल करता है जीव ।
  श्री राधे । : - संजीव कुमार ।

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