मौन - कर्म इंद्रियां यथा मुख को बंद रखना , कुछ न बोलना मौन नहीं है । मौन आंतरिक क्रिया है बाहरी नहीं ।
मनुष्य का स्वरूप हीं ऐसा है कि मनुष्य एक पल के लिए अकर्मा नहीं रह सकता जीवन पर्यंत । यहां तक कि अर्ध सुसुप्ति की अवस्था में बुद्धि हो जाती है लेकिन मन सक्रिय रहता है तभी वो स्वप्न देखता है। पुर्ण सुसुप्ति कि हीं अवस्था ऐसी होती है जिसमें मन तथा बुद्धि भी पुर्ण रूप से सो जाती है । ऐसी अवस्था में मन बुद्धि न तो कोई संकल्प करता है और न विकल्प ना कोई चिंतन करता है ना कोई मनन , ना हीं बुद्धि कोई तर्क या वितर्क करती है । फिर भी इस पूर्ण सुसुप्ति की अवस्था में भी मनुष्य को अकर्मा नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इसको भी मनुष्य के द्वारा सोने के क्रिया तथा मनुष्य के कर्म को हीं इंगित करती है । सोने का कर्म ।
तो फिर मौन क्या है ? किसको कहते हैं मौन ?
तो श्री महाराज जी के कृपा से मैंने जो समझा है वो है कि मौन एक ऐसी अवस्था का नाम है जब हमारा मन तथा बुद्धि किसी भी मायिक बिषय , बस्तु , या जीव यानि संसारिक बिषय बस्तु तथा जीव को छोड़ कर जब केवल पुर्ण रूप से भगवान का या गुरू का रूपध्यान करने के साथ साथ उनके गुणों का , उनके रूप माधुर्य का उनके लीलाओं का, उनके धामों का या उनके द्वारा दिया गया दिव्य वाणी का , प्रवचन का , सिद्धांतों का चिंतन करने में इंगेज्ड हो और मुख से कुछ भी ना बोले, तो ऐसी अवस्था का नाम है मौन ।
वरना केवल मुख बंद हो , मुख पर जीव ताला लगा कर रखें और मन बुद्धि संसार तथा किसी भी संसारिक , मायिक बिषय बस्तु या मायाधिन व्यक्ति का चिंतन कर रहा हो , तर्क कुतर्क वितर्क की क्रिया मन के अंदर चल रहा हो तो ऐसी अवस्था मौन नहीं है ।
और ऐसी अवस्था भी मायाधिन जीव के लिए असंभव है कि वो जगा हो और उसके मन के अंदर कोई बिचार जन्म न लें , मन के अंदर बिचारों का प्रवाह न उठ रहा हो ।
इसलिए जीव के मन के अंदर जब भगवान या भगवद् प्राप्त संत , हरि गुरू के रूप , उनके गुण , उनकी लीला उनके धाम का चिंतन चल रहा हो, बिचारों का प्रवाह भगवद् बिषय संबंधित हो और बाहर से जुवां खामोश हो तो इसी अवस्था का नाम है मौन ।
वरना जुवान से कुछ न बोलना और मन के अंदर संसारिक बिषय संबंधित बिचारों के प्रवाह को संचालित रखना मौन विल्कूल नही , एक नाटक है , एक ढोंग है । इसको "खामोशी" कहते हैं , "मौन" नहीं ।
श्री राधे ।
आज एक मौनी बाबा को देखा , वो व्रत के समय मौन रखने पर लेक्चर दे रहे थे कुछ आदमी को , उपदेश दे रहे थे कि अपने मुख के उपर एक सफेद कपड़ा बांध कर मौन का अभ्यास करो । वो यह नहीं बताया किसी को कि व्रत के दिन जुबां बंद रख कर मन से भगवान का चिंतन करो !
अरे कोरोना काल में दुनिया में तो अरबों लोग बड़ा बडा़ मास्क पहन कर घंटों मौनी बाबा बना रहा । क्या लाभ हो गया उस मौन से , कुछ मिला क्या किसी को ? कुछ अनुभव हुआ क्या ? क्या कोई शांति मिली क्या किसी को ? उल्टा बहुत से लोग इस काल में गलत चिंतन से , निगेटिव चिंतन से डिप्रेशन का शिकार हो गय ।
:- संजीव कुमार
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