उत्तर :- इसका एक मात्र कारण हैं अवचेतन मन जो कि जीव का परमानेंट मेमोरी है उसमें डर स्टोर हो जाना । मनुष्य का मन अति संवेदनशील होता है , चारों तरफ विश्व में निगेटिव घटना घटते देख कर , सुन कर समाचार चैनल से , टी भी सिरियल से , जैसे क्राईम पेट्रौल , जागते रहो , सी आई डी या लगभग वैसे हीं अनेक प्रकार के गंदे धारावाहिक चार चार पांच शादी वाला , साजिश वाला धारावाहिक या खुद के साथ पहले की कष्टकारी घटना आदि , संसारिक कार्य में असफलता आदि के कारण जीव के अवचेतन मन में अनेक प्रकार का भय , डर , आगे आनेवाले समय में वैसी ही या उससे बड़ी घटना , दुर्घटना न हो जाए ऐसा भय दमित हो जाता है । यही डर कुछ समय बाद जीव को सशंकित करता रहता है , भय पैदा करता रहता है , आत्मबल को क्षीण कर देता है । कुसंग दमित होता रहता है अवचेतन मन में । फिर यही अवचेतन मन का डर , भय मनुष्य के मन में अकारण बिचारों के रूप प्रवाहित होता रहता है , चुके अवचेतन मन को तर्क की कोई क्षमता नहीं होती , चेतन मन को तर्क करने की क्षमता होती है पर अवचेतन को नहीं , अत: अवचेतन मन का यही डर ओवर फ्लोटिंग होकर बिचार के प्रवाह के माध्यम से चेतन मन में आता रहता है तो मनुष्य समझ नहीं पाता कि आखिर इस डर का वास्तविक कारण क्या है ?
और जैसे हीं यह डर चेतन मन में निगेटिव बिचार बन के उभरता है वैसे हीं मनुष्य के शरीर का सभी ग्रंथि अस्त व्यस्त हो जाता है, अंदर ही अंदर डिस्टर्ब हो जाता है , जैसे ह्रदय का धड़कन बढ़ जाना , blood pressure अनियंत्रित हो जाना या बढ़ जाना , शरीर में हार्मोन का असंतुलन हो जाना , डाइजेस्टिव सिस्टम अनियंत्रित हो जाना , आमासय में गैस बनना । मस्तिष्क के हार्मोन जैसे सिरोटोनिन डोपामान , ईंडोरफिन , आक्सीटोसीन आदि का असंतुलन पैदा होना आदि बहुत से प्रभाव पड़ता है मानव मन तथा शरीर पर । यही कारण है कि अज्ञात भय , भविष्य के प्रति अनजाने डर पैदा होता रहता है मन में । और कभी कभी तो यह डर सच भी हो जाता है क्योंकि मनुष्य का कर्म भी उसी डर के प्रभाव के कारण वैसा हीं हो जाता है जिससे वो डरता है। जैसा वो सोचता है वैसा हीं घटना को निमंत्रण मिल जाता है फिर वही सोच हावी होकर वैसा हीं कर्म करवा देता है जो उस डर को भय को प्रैक्टिकल रूप से बुला लेता है ।
अत: जितना हो सके निगेटिव वातावरण , गंदे गंदे फिल्म, जलन घृणा वाला फिल्म , गंदे गाने , गंदा खान पान ( मांसाहार की अधिकता, शराब का सेवन की अधिकता, मादक पदार्थों का सेवन ) निगेटिव लोग , निगेटिव सोंच वाले मनुष्य , ईर्ष्या जलन द्वेष घृणा की अधिकता वाले मनुष्य से दुर रहना चाहिए और वास्तविक महापुरुषों से तत्वज्ञान अधिक से अधिक हासिल करना चाहिए। बार बार रिविजन , चिंतन मनन , भगवान का चिंतन मनन भगवान का तथा गुरू देव का रूपध्यान अधिक से अधिक करना चाहिए, जिससे हमारे अवचेतन मन में अच्छी बातें स्टोर होगी और गंदी बातें , निगेटिव बातें ओवरफ्लो होकर बाहर निकल जाएगी , ठीक वैसे हीं जैसे एक गंदे पानी के वर्तन को शुद्ध जल के नल के निचे रख कर नल को खोल दे तो कुछ समय बाद गंदा पानी ओवर फ्लो होकर बाहर निकल जाता है और बर्तन में केवल शुद्ध जल बचता है । नहीं तो उसमें और निगेटिव या कुसंग रूपी गंदा जल डालेंगे तो रही सही आत्म बल , सेल्फ स्टीम समाप्त हो जाती है और जीव गहरा डिप्रेशन का शिकार हो जाता है कोई कोई तो आत्महत्या कर लेता है । तो निगेटिव लोगों से , अति स्वार्थी जीव से नागेटिभ वातावरण , क्रोधी , लालची , ईर्ष्यालु का संग त्याग कर केवल वास्तविक महापुरुषों का सत्संग सुनना चाहिए, वास्तविक साधक से , भगवद् प्रेमी जनों से भगवान का गुरू का चर्चा करना चाहिए और कोई ना मिले तो खुद उनका पुस्तक पढ़ कर अधिक से अधिक उनका रूपध्यान चिंतन मनन करना चाहिए। जिससे अवचेतन मन साफ हो जाएगा , शुद्ध हो जाएगा । फिर शुद्ध बिचारों का प्रवाह होने लगेगा मन में , जीवन आनंदमय होने लगेगा ।
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