आत्म शक्ति का ह्रास किन किन कारणों से होता है ?
१. जरूरत से अधिक बात करने बालों की आत्म शक्ति क्षीण हो जाती है ।
२. निरर्थक बातों से बचना चाहिए ।
३. मिथ्या संभाषण से साधकों को बचना चाहिए।
४. संसार को उतना हीं समय देना चाहिए जितना आवश्यक हो , शेष समय को भगवान और गुरू के रूप गुण लीला धाम के चिंतन में हीं लगाना चाहिए।
५. संसार में अनावश्यक संबंध नहीं बढ़ाना चाहिए ।
६. कम से कम दोस्ती रखो , जितना आवश्यक हो संसार के लिए बस उतना हीं ।
७. साधक जब भी मिलें एक दुसरे से कभी भी , कहीं भी तो आपस में केवल हरि गुरू का हीं रूप गुण लीला और धाम की चर्चा करना चाहिए । अपने अपने संसार की चर्चा विल्कूल नहीं करना चाहिए, नहीं तो इससे हम जितना आगे बढ़ते हैं उससे कई गुणा पीछे चले जाते हैं ।
८. अपने गुरू तथा ईंष्ट को हमेशा अपना रक्षक तथा निरीक्षक मानना चाहिए, हम जो भी सोच रहे हैं , कर रहे हैं वो सभी देख रहें हैं , सुन रहे हैं तथा नोट कर रहें हैं , यह हमेशा याद रहे ।
९. अपने गुरू और ईष्ट के सिद्धांतों के विपरित न सोचना है और न करना है ।
१०. लोक रंजन तथा कुसंग से हमेशा बचना चाहिए ।
११. आध्यात्मिक बातों में किसी से बहस नहीं करना चाहिए, कोई अगर हमारे गुरू के विपरित बात कर रहा हो , प्रतिकूल बात कर रहा हो तो वहां से हट जाना चाहिए, उसके साथ बहस नहीं करना चाहिए, उसे समझाने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए। बहस करने से आत्म शक्ति नष्ट होती है ।
१२. अपने ईष्ट और गुरू के सिद्धातों की चर्चा केवल उन्हीं से करना चाहिए जो सचमुच का जिज्ञासु हो, जो सचमुच में भगवद् बिषय समझना चाहता हो , उसे वास्तव में उत्कंठा हो , श्रद्धा हो । भगवद् लाभ उठाने की भावना लेकर आया हो ।
अनावश्यक बहस करने तथा गुरूदेव के फिलोसॉफी को बताने पर उसको काटने वाले , विरोधी बात करने वाले व्यक्ति से बात करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जबरदस्ती उसे समझाने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए।
१३. इस दुनियां में सबके अपने-अपने , अलग-अलग संस्कार है, अलग-अलग विचार तथा भावना आदि है , अलग-अलग चरित्र है , वो उसी के अनुरूप सोंचता है और करता है । जबतक किसी जीव के पुर्व जन्मों के अच्छे संस्कारों का उदय नही होता वो वास्तविक संत व महापुरुषों के तरफ आकर्षित नहीं होगा । ऐसे जीवों को समझाने में अपनी आत्मशक्ति को नष्ट नहीं करना चाहिए। जिस दिन उसके अच्छे संस्कार जागृत हो जाएंगे वो खुद हीं वास्तविक जिज्ञासु भाव से हमारे गुरू और ईष्ट के तरफ आकर्षित हो जाएगा , फिर उसको बताने पर उसमें श्रद्धा और विश्वास कि उत्पति होगी । और वो फिर श्री महाराज जी को अपना गुरू मान लेगा एवं साधना में जुट जाएगा ।
१४. किसी भी दुसरे मार्गावलंबियों और धर्मावलंबियों के साथ अपने गुरू के सिद्धांतों की चर्चा कभी नहीं करना चाहिए, न हीं उनसे उनके गुरू के सिद्धांतों की चर्चा सुनना चाहिए, सबके अलग-अलग मार्ग है, सिद्धांत हैं , अलग-अलग सोंच है , चिंतन है , अलग-अलग ज्ञान है, अलग-अलग संस्कार है तथा स्तर है । अतः किसी के साथ बाद-विवाद में उलझने से आत्म शक्ति का ह्रास होता है और साधक साधना पथ से भटक जाता है ।
१५. जिस प्रकार स्कूल कौलेज में छात्रों का अलग-अलग स्तर होता है, पढ़ने में मेहनत करने के हिसाब से , श्रम के मात्रा के अनुसार, उसी प्रकार शिष्यों का, साधकों का भी अलग-अलग स्तर होता है , कोई जल्दी-जल्दी आगे बढ़ता है कोई धीरे-धीरे , कोई वहीं पर रूका हुआ है उसी कक्षा में जहां पर वो था । लेकिन हमें किसी के साथ भेद भाव कभी नहीं करना है , न जाने कब कौन अचानक आगे बढ़ने लगे । हम किसी के आंतरिक स्थिति को नहीं जान सकते , अरे हम स्वयं को ठीक से नहीं जान सके अबतक , केवल शाब्दिक ज्ञान है हमें कि हम आत्मा है पर अनुभव नहीं है अभी, तो दुसरे को समझने का प्रयास करना तो हस्यास्पद् हीं है । इसलिए किसी के प्रति कोई दुर्भावना कभी नहीं करना चाहिए, स्वयं को सबसे छोटा मानना चाहिए , तथा प्रत्येक को अपने से आगे ।
इस प्रकार उपर्युक्त बातों को ध्यान में रख कर हम आगे बढ़ेंगे तो बहुत जल्दी लाभ होगा , सफलता मिलेगी साधना भक्ति में ।
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