Tuesday, 29 August 2023

शरणागति कैसे होती है । शरणागति किसको कहते हैं?

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹श्री कृपालु महाप्रभु जी के श्री मुख से -शरणागति कैसे होती है । शरणागति किसको कहते हैं? most most most important :- 
हमेशा हरि गुरू के अनुकूल चिन्तन हीं शरणागति है -

आनुकूल्यस्य संकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्। (भक्ति र.सि.)

इसमें भी एक पॉइन्ट सबसे इम्पॉर्टन्ट 'आनुकूल्यस्य संकल्पः' अपने शरण्य के अनुकूल ही सोचना। (ध्यान दो।) बस यही एक शरणागति का लक्षण है। अपने शरण्य के, भगवान् के गुरु के अनुकूल ही सोचना। करना बोलना ये सब नहीं। सोचना। 'आनुकूल्यस्य संकल्पः ।' ‘आनुकूल्यस्य संकल्पः।' आप सोचते कुछ और हैं क्रिया करते हैं शरणागति की। ये नहीं मानी जायगी शरणागति ।

भगवान् के यहाँ क्रिया नहीं देखी जाती, मन देखा जाता है, बुद्धि देखी जाती है। वो शरणागत है कि नहीं। तो अनुकूल ही चिन्तन करेगा, बस। ऐसा करो। क्यों ? क्यों नहीं बोलना, बस करो। तुम नहीं जानते अपना भविष्य मैं जानता हूँ। मैंने जो आज्ञा दी उसका पालन करो।

वाल्मीकि से उनके गुरु ने कहा मरा मरा बोलते जाओ जब तक मैं लौट कर न आऊँ। उसने नहीं पूछा आप कब लौट कर आयेंगे ? किस तारीख को आयेंगे ? आखिर हम कब तक मरा मरा बोलते जायें। कोई क्वेश्चन नहीं, बस आज्ञा पालन । 

"आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा ।"

आज्ञा पालन ही सेवा है, आज्ञा पालन ही शरणागति है। अपनी बुद्धि नहीं लगाना है। यही 'आनुकूल्यस्य संकल्पः ' का सेन्स है और यही शरणागति है। अनुकूल ही सोचना।

लक्ष्मण! मेरे साथ चलो। भरत लौट जाओ। एक भाई को साथ ले लिया और हमको कहते हैं कि तुम जाओ, वापिस । ये कैसे भैया हैं! बड़े भैया, इनकी दो आँख है। आजकल के लोग यों बोलते। उनकी इच्छा में इच्छा रखना है। उनको सुख देना है। वो हमारे स्वामी हैं न भगवान् और गुरु सेव्य हैं। तो सेव्य का मतलब सेवा करने योग्य, सेवा के पात्र और हम हैं सेवक ।

तो सेवक को सदा सेव्य की इच्छानुसार चलना चाहिये। यही शरणागति है। यही हम नहीं कर सके अनादिकाल से अब तक। सोचते तो हैं हम लोग, ऐं हम तो शरणागत हैं। वाह ! तुम्हारे मिथ्या अहंकार से थोड़े ही शरणागति हो जायगी। प्रतिक्षण रहनी चाहिये, निरंतर शरणागति जैसे कोई ब्रह्मचारी है तो सदा ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये। ऐसे नहीं कि हम बाइस घंटे ब्रह्मचारी हैं। सत्यवादी है हरिश्चन्द्र तो सदा सत्यवादी हैं। तो उसी प्रकार शरणागत है कोई तो सदा शरणागत रहे, चौबीस घंटे। एक रस। हर वस्तु भगवान् की आनन्द ग्राह्य, विभोर होकर ग्रहण करना। गौरांग महाप्रभु ने इतनी पिटाई कर दी एक बूढ़े आदमी की और वो विभोर हो रहा है। बलिहारी है ! बलिहारी है।

यानी शरणागति का अभिप्राय है अनुकूल ही सोचना, उनकी इच्छा में इच्छा रखना। इसीलिये ये बड़ा कठिन है। बड़े अभ्यास से हर समय सावधान रहे तभी कर सकता है कोई। इसीलिये हम लोग नहीं कर पाये। थोड़ी देर को थोड़ा हो भी जाते हैं। फिर गड़बड़ हो जाता है। ये बुद्धि देवी फिर आ जाती हैं। अपना कमाल दिखा देती हैं। ये तो ठीक है लेकिन ऐसा क्यों? ऐसा क्यों! तुमको सोचने का अधिकार किसने दिया ? वेदों ने, शास्त्रों ने, पुराणों ने ? उच्छृंखल हो, तो वो शरणागत नहीं हो सकता। अनन्त बार भगवान् को हमने देखा, संतों से मिले अनन्त जन्म में, कहीं शरणागत नहीं हुये। हुये, कुछ मात्रा में और कुछ फिर, कुछ अपनी बुद्धि लगा दी। किसी को वियोग देने में कृपा है, किसी को संयोग देने में कृपा है। किसी की ओर देखने में कृपा है। किसी की ओर न देखना भी कृपा है। ये सब भगवान् और महापुरुष किसका किसमें कल्याण है ये सोचकर के उसके अनुसार आज्ञा देता है। और हम अपनी बुद्धि लगा देते हैं। उसको तो ऐसा किया हमको ऐसा कर रहे हैं। बस हो गया नामापराध। शरणागति से च्युत हो गये हम।

तो अनुकूल ही चिन्तन करना यही है सर्व समर्पण। फिर गड़बड़ कभी कर ही नहीं सकता वो। उससे गड़बड़ी कोई
हो ही नहीं सकती। क्योंकि प्रतिकूल सोचेगा नहीं। और जब प्रतिकूल सोचेगा नहीं तो प्रतिकूल वर्क नहीं होगा।

मन बुद्धि की शरणागति वर्क की कोई इम्पॉर्टन्स है ही नहीं भगवान् के यहाँ । आप बड़े जोर से दण्डवत करें मन्दिर में गुरु को, चरण धोकर के पीयें। ठीक है नथिंग से समथिंग अच्छा है। थोड़ी बहुत दीनता आ जायगी लेकिन ये शरणागति नहीं। शरणागति तो मन, बुद्धि की असली है। ये जो दण्ड के समान शरीर गिरता है गुरु के चरण में। दण्डवत प्रणाम कहते हैं उसको। दण्डे की तरह उसका मतलब क्या है ? उसका मतलब ये नहीं है कि हम चमड़े का सिर पैर पर रख देते हैं वो नमस्कार नहीं है। दण्डवत प्रणाम का मतलब मेरा सब कुछ आपके चरणों में अर्पित है। सब कुछ। अब सब कुछ में सब कुछ आ गया। अब कोई भी चीज ऐसी नहीं है जो आपकी प्राइवेट हो। 

और हम लोग। सोचो सब लोग अपने-अपने मन में। ए! महाराज जी से न बताना, ए! महाराज जी न जानें, फिर
आधा घंटे बाद महाराज जी तो सब जानते हैं। ये क्या है जी? ये क्या नाटक कर रही है तुम्हारी बुद्धि ? थोड़ी देर में कुछ मान लेती है थोड़ी देर में कुछ मान लेती है। और शरणागति का दावा भी करते हो। ये गड़बड़ हमने अनन्त जन्मों में की और पता नहीं आगे कब तक करेंगे। ये तो हमारे ऊपर निर्भर है। हम चाहे एक सेकिण्ड में शरणागत हो जायें और चाहे अनन्त युग बीत गये और आगे ऐसे ही बितावें। चौरासी लाख में घूमें।

तो भगवान् का दर्शन हो, चाहे भगवत्प्रेम हो चाहे मोक्ष हो ये जितनी चीजें अलौकिक हैं, दिव्य हैं, इनको पाने के लिये बस एक मार्ग है, शरणागति ।
:- श्री कृपालु महाप्रभु जी ( प्रवचन 1980) गीता भवन मुंबई।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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