जिनके चरणों के दिदार मात्र से रोम रोम पुलकित हो जाता है ।
जिनकी वाणी सुनने मात्र से शरीर में रोमांच उत्पन्न हो जाता हैं , जिनके चरण रज को ह्रदय में लागाने मात्र से एक अद्भुद् आनंद की अनुभुति होती है ।
जिनके चरण जल पीने मात्र से समस्त कुसंस्कार भष्म होकर आत्मा को अद्भुद आनंद प्राप्त होता है और श्री युगल सरकार में मन रमने लगता है । प्रेम का आंसु अपने आप बहने लगता है , ह्रदय प्रेम भाव से भर जाता है ।
जिनके सत्संग मात्र से समस्त भयों का नाश होता है । जिनको गुरू रूप में प्राप्त कर जीव धन्य हो जाता है । जिनके दर्शन मात्र से मन का हरण हो जाता है और युगल सरकार के चरणों को प्राप्त होता है । मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । और पंचक्लेश , पंचकोश , त्रिविधताप , त्रिगुण , त्रिदोष का समन हो जाता है ।
ऐसे दिव्य परम निधि को पा कर कौन इनके शरण में नहीं आना चाहेगा भला । ऐ खुद युगल सरकार का एकरूप हैं । आपके चरणों में कोटी कोटी कोटी प्रणाम गुरूदेव ।
"कृपालु कृपा दरबार " यह महादिव्य दरबार हैं । यह अंतिम और परम पावन दरबार हैं । एक ऐसा दरबार जहां हम पतितों को सम्मान दिया जाता हैं । कृपा कि जाती है । अनाधिकारी जीवों को भी अधिकारी बनाया जाता है ।
बने बने को सब जगह पुछा जाता है, पर ए तो वो दरबार हैं जहां जग से ठुकराया गया और शरण में आए जीवों पर कृपा की बरसात होती है ।
यह महा महा दरबार है ।
एक ऐसा दरबार जहां स्वयं युगल सरकार, श्री कृपालु सरकार में आसक्त जीवों पर कृपा लुटाते हैं , हमेशा के लिए अपना लेतें हैं ,उसका योगक्षेम वहन करतें हैं ।
महागुरू का दरबार , सर्वसमर्थ गुरूदेव का दरबार, आनंद दरवार , प्रेम दया और करूणा का भंडार है ।
हरि गूरू के दरबार में सजदा करने वाले कितने सौभाग्यशाली हैं इसकी कल्पना हम जीवों के लिए नामुमकिन है । यह तो उसी को अनुभव होता हैं जो मन से अपने गुरूवर को प्यार करतें है ।
बड़े बड़े ज्ञानी , ध्यानी ,योगी को यहां प्रवेश नहीं जबतक वो भी कर्म धर्म ज्ञान योग छोड़ कर इनके शरण में न आ जाए । वो भी जब गुरू कृपा से आते हैं यहां तो अपना सब ज्ञान भूल जाते हैं , सोचिए ऐसे परम दुर्लभ प्रशनैलटी के छत्र छाया में हैं हम लोग ! जब भी उनके कृपा का एहसास होता है कि ऐसे परम रसिक प्रसनैलिटी के छत्र छाया में हैं हम लोग जिनके पीछे पीछे श्रीकृष्ण स्वयं चलते हैं और इनके साधको पर कृपा करतें हैं तो रोम रोम पुलकित हो जाता है । हे महाप्रभु आपके तसवीर को ह्रदय से लगाने मात्र से एक दुर्लभ आनंद का अनुभव होता है तो आगे का आनंद का अनुमान लगाना नामुमकिन हीं है ।
:- आपका संजीव ।
No comments:
Post a Comment