Sunday, 3 September 2023

एकांत रूपध्यान साधना करने का संपूर्ण तरिका गुरूदेव श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा निर्देशित

एकांत रूपध्यान करने का संपूर्ण तरिका गुरूदेव श्री कृपालु जी महाप्रभु द्वारा निर्देशित :- 
आध्यात्मिक जगत को रूपध्यान श्री महाराज जी का अमूल्य उपहार है। उन्होंने ही बार-बार यह कह- कहकर इस बात को सबके मस्तिष्क में भरा है कि बिना रूपध्यान के साधना हो ही नहीं सकती। संसार में भी पहले स्मरण करते हैं, उसके बाद क्रियाएँ होती हैं।

भक्तियोग का प्राण रूपध्यान:- 
श्री महाराज जी कहते हैं- रूपध्यान ही भक्तियोग का प्राण है। भक्ति में रूपध्यान ही सर्वप्रथम महत्त्वपूर्ण चीज है। प्रतिपल अपनी समस्त मानसिक शक्ति को भगवान से जोड़ने का सबसे सुन्दर और सरल उपाय है, 'रूपध्यान'। यह मायिक विचार धारा को दिव्य चिन्तन में रूपान्तरित करने का अद्भुत तरीका है। रूपध्यान के बिना साधना का अभ्यास प्राणहीन शरीर के समान है। मानव मस्तिष्क रूप बनाने का अनादिकाल से अभ्यस्त है। उसकी इसी विशेषता का भगवदीय क्षेत्र में पूर्ण उपयोग व सर्वांगीण विकास ही रूपध्यान है।

अभ्यास अति सरल:-
श्री महाराज जी ने रूपध्यान के अभ्यास का बड़ा ही आसान तरीका बताया है। वे कहते हैं कि हम रूपध्यान में जैसा रूप चाहें, वैसा बनाएँ। जो भी संबंध बनाना चाहें, वह बनाएँ, जैसे-दास्य, वात्सल्य, सख्य, माधुर्य रूपध्यान के समय साधक जिस भी संबंध से मूलत: जुड़कर साधना करता है, वह उससे नीचे की श्रेणी में जाकर साधना कर सकता है। पर ऊपर की श्रेणी में जाकर साधना नहीं कर सकता। सर्वोत्कृष्ट संबंध में अपने इष्ट को प्रियतम माना जाता है। इसे माधुर्य भाव कहते हैं। माधुर्य भाव का यह साधक सख्य, वात्सल्य, दास्य और माधुर्य भाव में जा सकता है। जबकि एक दास्य भाव अवलंबी साधक श्रीराधाकृष्ण की उपासना वात्सल्य, सख्य और माधुर्य भावों में नहीं कर सकता है।

निरन्तर रूपध्यान का उपाय:- 
रूपध्यान के समय मन के संसार में चले जाने पर वापस रूपध्यान से जोड़ने का बहुत सुन्दर उपाय श्री महाराज जी ने बताया है। वे कहते हैं कि मन जहाँ भी जाता है, उसे जाने दो। तुम वहीं श्यामसुन्दर को खड़ा कर दो। वह दिन अवश्य आएगा, जब मन थककर भटकना छोड़ देगा। बार-बार अभ्यास से मन अपने आप मायिक जगत से हटता जाएगा और रूपध्यान सरल होता जाएगा। फिर रूपध्यान बनाना नहीं पड़ेगा, रूपध्यान में डूबे रहना तुम्हारा स्वभाव बन जाएगा।

साधना के नियम:-

श्री महाराज जी का साधकों के लिए निम्नलिखित आदेश हैं-
1.रूपध्यान करते हुए संकीर्तन करो ।
2. निरन्तर मौन व्रत का पालन करो।
3. अत्यन्त दीनभाव उत्पन्न करो।
4. हरि-गुरु के अनुकूल ही चिन्तन करो।
5. अन्य साधकों में सम्मान का भाव करो।
6. भाव प्रकट करने का दंभ कभी न करो।
7. मोक्षपर्यन्त की भी कामना कभी न करो।
8. क्षण-क्षण सर्वत्र सर्वदा हरि स्मरण करो।

रूपध्यान की प्रारम्भिक तैयारी:- 

1. अपने इष्ट श्रीराधाकृष्ण की मनभाई तस्वीर या मूर्ति चुनें।

2. अपनी साधना का स्थान को तैयार करें। आप वहाँ अपने इष्ट श्रीराधाकृष्ण और सद्गुरु को आसीन करें। ध्यान रहे कि आपकी साधना का स्थान एकान्त में हो।

3. अपनी साधना के लिए निश्चित समय निर्धारण करें।

4. जब आप साधना करने के लिए बैठें तो ऐसा अनुभव करें कि आप समस्त संसार से दूर केवल अपने हरि-गुरु के साथ हैं।

5. आँखें बन्द करें। अपना एक भाव शरीर बनाए, उस भाव शरीर से या तो गोलोक जाएं, या गुरूधाम , गोलोक या गुरूधाम में प्रवेश करने के अनुमति के लिए गुरू से याचना करें । फिर अनुभव करें, आपको अनुमति मिल गई है और आप गोलोक या दिव्य गुरू धाम मनगढ़ के साधना हौल मे प्रवेश कर चुके हैं तथा आप अब हरि- गुरु के समक्ष उपस्थित हैं। चारो तरफ से शीतल तथा सुगंधित पवन बह रही है, हजारो प्रकार के दिव्य पुष्प खिली हुई है, दिव्य तथा रंग विरंगे प्रकाश चारो तरफ विखड़ा हुआ है, गुरूदेव और श्री राधाकृष्ण सिंहासन पर विराजमान है, उनके शरीर से दिव्य प्रकाश हर दिशा को प्रकाशित कर रहा है , हजारो गोप गोपिंया स्तूति कर रहीं हैं, भवन के पास ही यमुना जी अठखेलियां कर रही हैं । गुरू देव और श्री राधाकृष्ण आपको ममता तथा स्नेह की दृष्टि से देख रहे है , आप आगे बढ़ कर उनके चरण कमल को स्पर्श कर रहे हैं तथा उनको दिव्य माला पहना रहे है, अब उनकी रूपमाधुरी का पान करें । 

6. उनकी सेवा करें, जैसे- श्रीचरणकमल पखारना,
पंखा झलना, भोग अर्पित करना आदि-आदि।

7. इस भाव को दृढ़तर करते जाएँ कि आप उनके और वे आपके हैं।

8. एकाग्रचित्त हो जाएँ। अब साधना आरम्भ करें। सर्वप्रथम भावयुक्त हो प्रार्थना करें। फिर आर्त पुकार करते हुए हरि-गुरु की आरती करें। 
( नोट :- याद रखें यहां आप भाव शरीर में है, इसलिए फिजिकल रूप से आरती के लिए खड़ा होने कि कोई आवश्यकता नही है , आप भाव शरीर में वहां दिव्य दरवार में रूपध्यान में खडे हैं , रूपध्यान वाले आपके भाव शरीर के हाथो में दिव्य आरती कि थाली भी है और उसी भाव शरीर से आप उनके समक्ष खडे होकर आरती कर रहे है , इसलिए आरती के लिए इस भौतिक शरीर से खडे होने की कोई आवश्यकता नही है ) 

9. आरती के बाद अब भाव शरीर से वहां आसन पर बैठ जाए , अब उनके नाम, गुण, लीला, धाम का रूपध्यान करते हुए अश्रु बहाकर कीर्तन स्वयं गाएँ या सीडी लगा कर साधना करें।

10. बड़े प्रेम से भोग -गीत गाते हुए उन्हें भोग अर्पित करें और उन्हें ग्रहण करते देखकर आनन्द से रोमाञ्चित हों।

11. साधना की समाप्ति के बाद यह रूपध्यान करें कि आपके हृदय में हरि-गुरु विराजित हैं और प्रतिपल आपके साथ हैं। अपना संसारी कर्तव्य निभाते समय भी बार-बार अपने हृदय में विराजित हरि-गुरु के दर्शन करते रहें। हर पल हर क्षण अपने गुरु को अपने साथ महसूस करने का अभ्यास करें।

क्रियात्मक साधना का आधार- 'प्रेम रस मदिरा' :- 

श्री महाराज जी ने साधना हेतु अक्षय खजाना दिया है। उसी खजाने का सबसे बेशकीमती हीरा है- 'प्रेम रस मदिरा' | 'प्रेम रस मदिरा' स्वयं श्री महाराज जी का प्रत्यक्ष रूप है। यह अपने आप में एक पूर्ण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में श्री महाराज जी ने अपने आप को स्थापित कर दिया है। श्री महाराज जी का व्यक्तित्व पारलौकिक है। अतः उसी कक्षा का रस इस ग्रंथ में भर रखा है। ये 'प्रेम रस मदिरा' के पदों में स्वयं बैठे हैं। इसलिए जब ये पद गाए जाते हैं तो रोमांच होता है। आँसू आते हैं। गुरु जिस कक्षा के होते हैं उसी कक्षा की शक्ति अपनी रचनाओं में भर देते हैं। श्री महाराज जी ने भावावेश की अवस्था में इस 'प्रेम रस मदिरा' ग्रंथ की रचना की है। इसका प्रत्येक पद अलौकिक हैं। अपनी पूर्ण शक्ति लिए हुए हैं। इसमें समुद्र-सी गहराई है, हमारी साधना हेतु । संसार के परम कल्याण हेतु इन्होंने इसे प्रकट किया है। अपने इस अनुपमेय ग्रंथ में श्री महाराज जी ने अपनी पूरी साधना पद्धति को परत-दर-परत खोलकर रख दिया है। यह वेद-शास्त्र का सार एवं रस शास्त्रों की सर्वोत्कृष्ट अमूल्य निधि है। इसका निरन्तर चिन्तन चित्त के कल्मर्षो का मार्जन करता है और प्रेम-रस-सुधा का पान कराता है।

साधना के विविध चरण निम्नलिखित है :- 

साधना के लिए 'प्रेम रस मदिरा' ग्रंथ को श्री महाराज जी ने विभिन्न माधुरियों में विभाजित कर दिया है। इसी के अनुसार उनके द्वारा प्रशिक्षित किसी प्रचारक के निर्देशन में साधना करनी है।

1. आर्त पुकार:- 
सर्वप्रथम श्री महाराज जी ने 'आरती माधुरी' रखी है। आरती क्यों की जाती है? आरती का अर्थ होता है दीन-हीन अकिंचन साधकों की आर्त पुकार! करुण पुकार !! अपने आपको वास्तव में निराश्रित स्वीकार करना है। साधनहीन स्वीकार करना है। जब वास्तविक आर्त्त पुकार कोई करता है, तो उसकी पुकार भगवान सुनते हैं। उस आर्त्त के लिए वे भागे-भागे आते हैं। 

2. अमोलक गुरु उपकार स्मरण:- 
अपने आपको अपने गुरुदेव का ऋणी मानें, जिन्होंने उन तत्त्वों के रहस्यों का ज्ञान अपनी कृपाशक्ति से आपको करा दिया जिन्हें कोई हजारों जन्मों में वेद-शास्त्रों को पढ़कर भी नहीं जान सकता है, जैसे- श्रीकृष्ण तत्त्व, श्रीराधा तत्त्व, जीव तत्त्व, माया तत्त्व, गुरु तत्त्व आदि। गुरु के उपकारों से ऋणी साधकों को प्रतिदिन आरती के बाद कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए 'सद्गुरु माधुरी' का पद गाना चाहिए।

3. सिद्धांत पुनरावृत्ति:- 
इसके बाद 'सिद्धान्त माधुरी आती है। यह माधुरी
सिद्धान्त की बातों का बारंबार मनन करने के लिए है। सिद्धान्त की बातें मन को शान्त करने के लिए हैं। मन बड़ा चंचल है। अतः उसे सिद्धान्त बताना है। जब मन को सत्य तथ्यों का पता चलेगा तो वह सावधान होगा। जब मन सावधान होगा तो वह बेचैन होगा इस बात को सोचकर कि मुझे क्या करना है और क्या कर रहा हूँ। सिद्धान्त से जब मन को सावधान किया गया कि संसार से विरक्त हो जाओ क्योंकि मृत्यु का पता नहीं, तो मन कहेगा कि यह तो बिल्कुल सत्य है।

4. दैन्य भाव में अवस्थान:- 
सिद्धान्त पाकर मन ने उसे स्वीकारा कि तुरन्त दैन्य 'माधुरी' की सहायता से विनम्र बनाना है। दैन्यमाधुरी का अर्थ है दीनतापूर्वक, विनम्रतापूर्वक व्याकुल होकर भगवान को पुकारना। दैन्यमाधुरी से उत्पन्न चिंतन से मन बिल्कुल शान्त होकर विनम्र हो जाएगा। जब साधक को अपने अपराध दिखाई देने लगेंगे। अब प्रभु के चरणों में बार-बार निवेदन करना है कि कृपा करो। दयनीय दशा का चिंतन हृदय को विगलित कर देता है। फिर आँसुओं के रूप में वह बह कर निकलता है। इन आँसुओं को देखकर भगवान का मन पिघल जाता है। हृदय में जितना अधिक पश्चाताप का भाव आएगा, उतने ही आँसू बहेंगे। हृदय उतना ही इन आँसुओं से स्वच्छ होता जाएगा और भगवान उतनी कृपा करते जाएँगे।

5. नाम-रूप- लीला-धाम-जन गुणगान:- 
जब आप आँसू बहाकर वास्तविक रूप में भगवान के सामने अपने आपको प्रस्तुत कर चुके होंगे तो आपको यह बोध होगा कि प्रभु मुस्कुरा रहे हैं और आपको सान्त्वना दे रहे हैं। उनके वात्सल्य भरे नेत्र आप में कुछ आशा जगा रहे हैं। फिर आप उनकी स्तुति करेंगे। उनके सुन्दर रूप को देखेंगे। उनके शृंगार को देखें गे। उनके गुणों का उत्कंठित होकर गान करेंगे। आप अपने आपको उन्हें दे देना चाहेंगे। आप बराबर उन्हीं का संग चाहेंगे। वे आपको सर्वाधिक प्रिय लगने लगेंगे। यही कारण है कि श्री महाराज जी ने दैन्यमाधुरी के बाद अपने इष्ट का गुनगान किया है। 'श्रीकृष्ण माधुरी', 'श्रीराधा माधुरी', 'धाम माधुरी' आदि माधुरियाँ इसके अन्तर्गत आती हैं। आप रूपध्यान में उनके धाम में जाइए। वृन्दावन के कुंज में बैठकर कुंजबिहारी एवं कुंजबिहारिणी का ध्यान कीजिए। उन्हें पुकारिए ।

6. रुचि के अनुसार विविध माधुरियों का चयन:-

आप अपनी रुचि अनुसार कभी भी किसी माधुरी को लेकर उपासना कर सकते हैं। जैसे- 'युगल माधुरी', 'सखी माधुरी', 'धाम माधुरी', 'मुरली माधुरी', 'प्रकीर्ण माधुरी', 'विरह माधुरी' आदि-आदि।

7. सभी माधुरियों में विरह माधुरी सरताज:-

सभी माधुरियों में 'विरह माधुरी' का अपना विशिष्ट महत्व है। विरह माधुरी गाकर जितना आप उनके वियोग में तड़पेंगे, अश्रु बहाएँगे, उतना ही आपका हृदय स्वच्छ होगा। आत्मा उतनी उज्ज्वल होगी। साधना परिपक्व होगी। सोना जितना तपता है उतना ही उज्ज्वल होता है। उसका रंग निखरता है, सुन्दर होता है । 

:- भक्ति पियुष , पेंज नंबर 30 -33
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अनेको श्रद्धालु तथा जिज्ञासु साधको के आग्रह पर मैने यह लेख बहुत प्रयास के बाद ढूंढ़ कर भक्ति पियुष से लिखा है । आशा है श्री महाराज जी द्वारा दिया गया यह गाइडलाइन आपको एकांत रूपध्यान साधना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा । 
आपका गुरूभाई संजीव कुमार। श्री राधे ।

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