श्री महाराज जी के इस निर्देशन को पढ़ने के साथ साथ ही श्री कृष्ण का रूपध्यान बनने लगेगा , तथा रूपध्यान के तरीके संबंधित अन्य कंफ्यूज भी दुर हो जाएगा :-
बंधन और मौक्ष का , कारण मनहि बखान ।
याते कौनिउ भक्ति करू, करू मन ते ध्यान।।
:- श्री कृपालु जी महाप्रभु।
'यहाँ 'हरिध्यान' से श्री महाराज जी का तात्पर्य स्मरण भक्ति से है जिसके लिए उन्होंने मन द्वारा रूपध्यान साधना किए जाने पर बल दिया है। ताकि ध्यान करते समय मन भगवान के रूप, गुण, लीला, धाम के चिंतन में लगा रहे। चिंतन में निरंतर परम शुद्ध भगवान का सान्निध्य मिलने पर अनादि काल से मन पर जमा कलुष साफ होने लगता है और हम भगवान के निकट पहुँचने लगते हैं।
श्री महाराज जी ने कभी भिलाई नगर के सत्संगियों के मध्य रूपध्यान साधना की पद्धति बतलाई थी। देखिए, साधना में सर्वप्रथम कुछ बातें आवश्यक हैं। पहले तो आपको यह मानकर चलना है कि मैं युगल उपासक हूँ। मैं केवल कृष्ण उपासक नहीं हूँ। युगल उपासक होने के कारण मैं दोनों की साधना करता हूँ। वे मेरे माता-पिता हैं। वे मेरे स्वामी- स्वामिनी जू हैं, इस भाव को लेकर चलना है। आप तिलक लगाते हैं! पहले लम्बा तिलक लगाते हैं, फिर गोल बिंदी लगाते हैं। जो लम्बा तिलक लगाते हैं, वे केवल कृष्ण उपासक हैं। जो लम्बा और गोल लगाते हैं, वे युगल उपासक हैं। ऊपर का तिलक कृष्ण का, नीचे की बिंदी राधारानी की! आपके तिलक से ही लोग समझ जाएँगे कि आप युगल उपासक हैं। पर यह नहीं जान पाएँगे कि आप राधाकृष्ण के उपासक हैं या सीताराम के। लेकिन, यह समझ जाएँगे कि युगल उपासक हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आपको युगल उपासना करनी है।
दूसरी बात, साधना में ऐसा कोई जरूरी नहीं है। कि दोनों को सदा साथ रखना है। मान लीजिए कि आप श्रीकृष्ण माधुरी का पद गा रहे है। आपको इस समय श्रीकृष्ण का ध्यान करने की इच्छा है, आप अपने सामने श्रीकृष्ण को खड़ा कीजिए। किसी समय आपको स्वामिनी जू का ध्यान करने की इच्छा है, तो राधारानी को खड़ा कीजिए। कभी आपको युगल उपासना करने की इच्छा है, तो दोनों को खड़ा कीजिए। परन्तु हमेशा हमें यह याद रखना है कि यदि उन्हें हम सर्वस्व मानेंगे तो जब चाहें जिस भाव में आ पाएँगे। लेकिन यदि आप दास्य भाव में भक्ति करेंगे तो फिर सखा नहीं मान सकेंगे। इसलिए टॉप की साधना कीजिए। कभी इच्छा हो रही है श्रीकृष्ण को प्रियतम मानने की, तो उसी भाव से उपासना करें। और पुरुष भी साधना करते समय यह न सोचें कि वे श्रीकृष्ण को कैसे प्रियतम मानेंगे! आपका शरीर पुरुष का है, पर हर कोई कई बार पुरुष या स्त्री दोनों हो चुका है। यह तो शरीर का सिर्फ नाम है।
उपासना मन से होती है। आपका जो भाव देह बनता है, वह मुख्य है। भगवान आपके शरीर को
नहीं देखते। आपके मन से जो भावना बनायी जाती है, उसी का भावदेह बनता है। भावदेह से आपने भगवान का जैसा रूपध्यान किया है, आपको उनके वैसे ही साक्षात् दर्शन होंगे। इसलिए यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि मैं पुरुष हूँ। महत्वपूर्ण यह है कि मैं आत्मा हूँ और आत्मा स्त्रीलिंग होती है।
परमात्मा आत्मा को ग्रहण करता है और आत्मा स्त्रीलिंग होती है। इसलिए मीरा ने जीव गोस्वामी से कहा था, अब तक तो मैंने जाना था कि पूरे ब्रह्माण्ड में एक ही पुरुष है और बाकी सब नारियाँ हैं। वह एक ही प्रियतम है। तुम एक दूसरे पुरुष कहाँ से आ गये ? - तो अब स्पष्ट है कि हम सब आत्माएँ हैं । आत्माओं के प्रियतम परम पुरुष श्रीकृष्ण हैं। दंडकारण्य के ऋषि-मुनि आत्माएँ हैं। तभी तो वे ऋषि-मुनि होकर भी राम को देखकर प्रियतम भाव से आकृष्ट हो रहे हैं। ये ऋषि-मुनि जोगी हैं, वैरागी हैं। काम उनको छू नहीं सकता, किंतु राम को देखकर कामुक हो गए! - आश्चर्य नहीं लगता? इसलिए उनको प्रियतम भाव से प्रेम करना है । पुरुष-स्त्री सभी आत्माएँ हैं और श्रीकृष्ण सबके प्रियतम हैं।
तीसरी बात, जब आप रूपध्यान करने बैठें तो आपको उनके साथ संबंध बनाना है, वे मेरे क्या लगते हैं! उनके साथ आपके सारे रिश्ते हैं! वे आपके सर्वस्व हैं! अब मन की भूमिका आरंभ
होती है क्योंकि ध्यान मन से होता है, आपका शरीर ध्यान नहीं करता । शरीर स्थूल है। इससे आपको कुछ नहीं करना। सारा काम मन का है। मन को काम देना है। अब आप मन को क्या काम देंगे? आप एकांत में बैठेंगे: श्री महाराज जी का पद लेंगे। मान लीजिए, आपने दैन्य माधुरी का पद लिया या आपने श्रीकृष्ण माधुरी का पद लिया। जो पद है, उसी पद के अनुसार आपको साधना करनी है। यदि आपने दैन्य माधुरी का पद लिया है तो उसमें जो वर्णन है तदनुसार आप सावधान होकर बैठेंगे। फिर अपने इस स्थूल शरीर को भी छोड़ देंगे । मन से इसको छोड़ दीजिए। नहीं है मेरा यह शरीर इस समय ! मैं हूँ. मेरे प्रभु हैं, जो मेरे हैं। मैं हूँ, मेरे गुरु हैं। बस ! मैं, गुरु और भगवान हम तीन ही हैं, और कुछ नहीं। सर्वत्र समुद्र-ही-समुद्र है, किसी से कोई लेना- देना नहीं ।
कोई नाता ही नहीं है मेरा किसी से! उस समय कुछ याद न रहे। केवल मैं, गुरु और भगवान! अब मन से अपना भाव देह बनाइए। भाव देह बहुत महत्वपूर्ण है। आपके मानसिक चिंतन से जो भाव देह बनता है, यही परिपक्व होता है। इसी भावदेह से आप श्यामाश्याम के दर्शन करेंगे । जिसने जिस क्लास का चिंतन किया होगा, उसका उसी भाव में भाव देह परिपक्व होगा। मान लीजिए आपने दास्य भाव में उनका चिंतन किया है तो आपको प्रभु दास्य भाव में ही मिलेंगे। - तो भाव देह बनाना है और उस भाव देह को दिव्य धाम गोलोक में ले जाना है। अपने भाव देह से देखना है कि मैं इस समय कहाँ हूँ। पृथ्वी पर । पृथ्वी के नीचे सात लोक। ऊपर सात लोक और चौदह भुवन । इसको फोड़ कर जाना है। 'यहाँ नहीं हैं मेरे प्रभु! मुझे गोलोक जाना है' यह आपको चिंतन करना है। इस चिंतन में बड़ी शक्ति है।
आपने माया का लोक छोड़ा और आपको विरजा नदी मिली। यह विरजा नदी दिव्य नदी है। भगवान ही है यह! इसे भगवान के द्वारा प्रकटित मानिए या मानिए कि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही है, जहाँ माया नहीं है। गोलोक में हर चीज़ श्रीकृष्ण ही बने हैं। यह विरजा नदी लक्ष्मण रेखा है। इस नदी के नीचे माया के लोक हैं और ऊपर दिव्य लोक। आपका भाव देह माया के लोक को फोड़कर विरजा नदी के पास पहुँचा। आपने इस भाव देह से विरजा नदी में स्नान किया। स्नान करते ही यह भाव देह दिव्य हो गया, प्रकाशयुक्त हो गया! अब यह गोलोक जाएगा। रास्ते में कई लोक पड़ेंगे। जितने अवतार हैं, उनका भी अपना-अपना लोक है, जैसे नरसिंहादि का लोक। ये सब परव्योम में आ जाते हैं। इन सबसे हमारा कोई काम नहीं है। हम उन्हें प्रणाम करते हुए चलते जाएँगे। सबसे पहले ज्ञानियों का सिद्ध लोक मिलेगा। फिर शिवलोक है। ऊपर उठिए। अब परव्योम लोक वैकुण्ठ है, यहाँ महाविष्णु हैं।
अब साकेत है। हर एक का अपना-अपना लोक है। बस, आप चलते जाइए। हमको गोलोक जाना है। सबसे ऊपर अन्तिम है गोलोक ! उसके बाद कुछ नहीं । गोलोक पहुँचना है। पहुँच गए.... बाहर से हम देख रहे हैं कि गोलोक गोलाकार है। कमल के रूप का बड़ा सुंदर! वह दिव्य प्रकाश । आप गोलोक में प्रविष्ट होते हैं गोलोक के मध्य जो श्रीकृष्ण का अंतःपुर है, वह कमल के रूप का है और कमल की जो पंखुड़ियाँ हैं, वह गोपकुमार का निवास स्थान है! कमल के मध्य जहाँ कर्णिकाएँ हैं, यहाँ श्रीकृष्ण का महल है और इस महल में सदा किशोर अवस्था में श्रीराधाकृष्ण विराजित हैं! हमारे स्वामी स्वामिनी जू माता- पिता के रूप में सदा विद्यमान होकर अपनी सृष्टि को देखते रहते हैं! सृष्टि के चर-अचर सभी जीवों की खबर उनके पास है! उसी गोलोक में वृंदावन भी है। दिव्य वृंदावन....! दिव्य वृंदावन में ही भगवान की नित्य लीलाएँ होती हैं। तो यह वृंदावन जो गोलोक में है, वहाँ पर चार भाव के रस हैं, जिसका आस्वादन भगवान अपने परिकरों के, अपने जनों के साथ करते हैं! वहाँ कोई मायाबद्ध नहीं जा सकता। जितने उनके अपने जन, सन्त, नित्य पार्षद और नित्य परिकर हैं, उनके साथ ये लीलाएँ चलती रहती हैं चाहे वे दास्य भाव की हों, चाहे सख्य भाव की हों, चाहे वात्सल्य भाव की हो या माधुर्य भाव की हों । लेकिन गोलोक में ये जितने भी हैं, जिस भाव में भी रहें, ये सब निष्काम प्रेम करते हैं और सदा राधाकृष्ण की सेवा के लिए आतुर व्याकुल रहते हैं। इसलिए प्रभु को इनके साथ रसास्वादन में बड़ा सुख मिलता है।
यही भगवान श्रीकृष्ण सातवें मन्वंतर की अट्ठाइसवीं चतुर्युगी के अंत में द्वापर में आते हैं। भगवान गोलोक का वृंदावन भी लेकर आ जाते हैं जो इस स्थूल वृंदावन में लीन हो जाता है और इस प्रकार वे अपने लोगों को लेकर उस रस का आस्वादन इस मृत्युलोक में भी करते हैं। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व जो श्रीकृष्ण आए थे, वे स्वयं गोलोक बिहारी थे । द्वापर तो हमेशा होगा लेकिन हमेशा गोलोक बिहारी नहीं आएँगे, युगावतार आएँगे जो श्रीकृष्ण के अंश हैं- प्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष, तृतीय पुरुष ! तो प्रथम पुरुष हैं कारणार्णवशायी जो महाविष्णु हैं। द्वितीय पुरुष हैं गर्भोदशायी जिनकी नाभि से ब्रहमा, विष्णु, शंकर पैदा होते हैं और तृतीय पुरुष हैं क्षीरोदशायी जो सभी जीवों के हृदय में रहते हैं। हम बड़े सौभाग्यशाली हैं कि हमने जिनकी लीलाएँ सुनी हैं, वे स्वयं गोलोक बिहारी श्रीकृष्ण हैं, जो 5000 वर्ष पूर्व इस जगत में आए थे। इसलिए हम जो रूपध्यान करेंगे, वह गोलोक बिहारी श्रीकृष्ण का होगा। तो गोलोक चलना है। फिर गोलोक में हम अंतःपुर में जाएँगे। अंतःपुर में राधाकृष्ण के दर्शन करेंगे। अब हमें यदि भावों में प्रविष्ट होना है, तो फिर वृंदावन जाएँगे । हमें अपने भावदेह को दिव्य वृंदावन में ले जाना है। गोलोक में भी वृंदावन है! अब वृंदावन में आपको देखना है कि मैं कुंज में जाऊँ या यमुना जी के किनारे जाऊं ! कहाँ जाऊँ, यह भाव देह निर्धारित करेगा। मैं कुंज में जाऊँगा आप कुंज में जा रहे हैं। निकुंज में तो मैं जा नहीं सकता! अधिकारी नहीं । निकुंज में तो केवल अष्ट सखियाँ और राधारानी सहित श्रीकृष्ण ! निभृतनिकुंज में केवल राधाकृष्ण !! तो हम न तो निकुंज में और न ही निभृत निकुंज में जा सकते हैं, हम कुंज तक जा सकते हैं। तो कुंज में जा रहे हैं! अब आप कुंज में पहुँच गए हैं, कुंज में कुंजबिहारी श्रीकृष्ण शिला पर बैठे हैं और आप भाव देह से उनके दर्शन कर रहे हैं और आप पद गा रहे हैं, 'प्राण धन, जीवन कुंजबिहारी' -यह महाराज जी द्वारा रचित पद है !
पद गाते समय यही ध्यान करना है कि आप गोलोक पहुँच गए। गोलोक में वृंदावन का कुंज! और कुंज में मैं कुंज बिहारी को बैठे देख रहा हूँ। उसके बाद पद अनुसार आप विनती कीजिए। गोलोक बिहारी के समक्ष । देखिए, मन को कितना काम मिल गया। कहाँ जाएगा मन! वह तो कुंजबिहारी में अटक ही जाएगा। इधर-उधर कैसे भागेगा ! अब आप कुंजबिहारी से कह रहे हैं। कि आप मेरे प्राणधन हैं! इसी मन से कुंजबिहारी के प्रत्येक अंग पर शोभित शृंगार को देखिए! शीश से शुरू करके चरणों तक जाइए या चरणों से शुरू करके शीश तक जाइए। शीश पर मोर पुच्छ सुशोभित है। इसके आगे ? उसके आगे मुकुट है। क्या लगा है मुकुट में ? देखिए, देखते जाइए। मुकुट में मणियाँ हैं। मणियों का क्या रंग है ? फिर उस पंक्ति में किस प्रकार की मणियाँ लगी हैं? अच्छा, किनारे में मोतियों की लड़ी भी लगी है। और, माथे पर भी जो लड़ें हैं, वे भी मोतियों की हैं! मोतियों का रंग कैसा है? घुँघराले केश काँधे तक हैं। भाल पर कस्तूरी तिलक लगा हुआ है ! तिलक का रंग कैसा है ? मेरे कृष्ण के कपोल कैसे हैं ? लम्बे हैं, गोल हैं, कैसे हैं ? आते जाइए नीचे। गले में क्या पहन रखा है ? काँधे पर कौन से रंग का दुपट्टा है ? गले में कौस्तुभ मणि की माला है! साथ ही गले में सुगंधित पुष्पों एवं कमल के फूलों से बनी वनमाला भी सुशोभित है! मेरे श्यामसुंदर की अंगकान्ति नीले रंग की है! अब ये नीले रंग का शरीर, उस पर वनमाला, कहीं सफेद फूल, कहीं कमल का गुलाबी फूल, कहीं हरे रंग का तुलसी दल! आप रूपध्यान कीजिए, कितना सुंदर लग रहा होगा! सुगंध से मतवाले होकर भौंरे आकर माला के पुष्पों पर बैठ जाते हैं और कभी-कभी श्यामसुंदर की दिव्य सुगंध सूँघने के लिए उनके श्रीअंगों पर भी बैठ जाते हैं, फिर उड़ जाते हैं! काँधे पर गुलाबी रंग का दुपट्टा है! नीले श्रीअंग पर दमकती दामिनी के समान पीतांबर सुशोभित है! मंद-मंद हवा चल रही है! मेरे कृष्ण का पीतांबर लहराता हुआ उनके नीले चरणों को चूम रहा है! चरणों पर मणियोंवाली पायल सुशोभित है। और जो नख हैं उनसे निकलनेवाला दिव्य प्रकाश चारों ओर दीपित हो रहा है। नील सरोरुह सदृश हाथों में उन्होंने मणि जटित मुरली थाम रखी है जिसे अधरों से लगाए फूँक-फूँककर बजा रहे हैं और रतनारे नेत्र तो मानो सुधा रस छलका रहे हैं ! श्यामसुंदर अपने तिरछे नेत्रों से मुझे देख भी रहे हैं! अपने भावदेह से जब आपने यह देख लिया कि नेत्रों से वे आपकी ओर देख रहे हैं, आप उनको देख रहे हैं, दोनों के नयन एक-दूसरे से मिल रहे हैं, बस अब आपको उनसे निवेदन करना है! आप उनसे अपने दिल की बात कहेंगे ! आपको यह ध्यान करना है कि मैं जो कह रहा हूँ, सुन रहे हैं। अरे, उन्होंने तो मुरली बजाना बंद कर दिया है, वे ध्यान से मेरी बात सुन रहे हैं! अब तो उन्होंने प्यार से दोनों भुजाएँ भी फैला ली हैं! अरे, वो मेरी ओर चले आ रहे हैं! मेरा आलिंगन कर रहे हैं ! मुझे अपने गले से लगा लिया ! देखो, उनके गले लगते ही मुझे अनंत आनंद मिल रहा है! मैं फूट-फूट कर रो रहा हूँ ! ये सब आपको ध्यान में अनुभव करना होगा । जब आप इस प्रकार से रूपध्यान साधना करेंगे, तो इसमें कोई संदेह ही नहीं है कि आपको मुरली ध्वनि भी सुनाई पड़ेगी! आपको दिव्य स्पर्श की भी अनुभूति होगी! आपको कानों में उनकी मधुर आवाज भी सुनाई पड़ेगी। लेकिन ऐसी ही साधना करनी होगी । श्री महाराज जी द्वारा रचित पदों का प्रत्येक शब्द दिव्य प्रेमरस में निमज्जित है! श्री महाराज जी ने हमें अपने पदों के रूप में जो दिव्य भाव संपदा प्रदान की है, उनका यदि इस प्रकार से साधना करते हुए आप गान करेंगे तो स्वयं देखेंगे कि आपके भीतर कितना परिवर्तन आयेगा!
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