Sunday, 10 September 2023

निराकार ब्रह्म के अनन्य उपासकों को योगी, यानि ज्ञान मार्गी , परमात्मा श्री विष्णु के उपासकों को वैष्णव , शिव के उपासकों को शैव, दुर्गा यानि शक्ति के उपासकों को शाक्त तथा केवल भगवान श्रीराधाकृष्ण के अनन्य उपासकों को भक्त कहते हैं


निराकार ब्रह्म के उपासकों को योगी, यानि ज्ञान मार्गी , परमात्मा श्री विष्णु के उपासकों को वैष्णव , शिव के उपासकों को शैव, दुर्गा यानि शक्ति के उपासकों को शाक्त तथा केवल भगवान श्रीराधाकृष्ण के अनन्य उपासकों को भक्त कहते हैं, श्री महाराज जी ने एक बार कहा था कि हमारे जितने भी सत्संगी है जो केवल मुझमें हीं पूर्ण श्रद्धा और दृढ़ विश्वास करके अनन्य भाव से मेरे हीं बतलाए बातों का अनुसरण करते हुए केवल श्री राधाकृष्ण को हीं भजते हैं , रूपध्यान करते हुए उनका स्मरण तथा चिन्तन करते रहते हैं, केवल इन्हें ही अपना ईष्ट तथा प्रियतम मानते हैं , अन्य किसी भी देवी देवता को कभी नहीं भजते, वो विशूद्ध वैष्णव है और इन सभी के योगक्षेम भगवान श्री राधाकृष्ण वहन करते हैं, इनको किसी प्रकार से कभी कोई चिंता करने कि आवश्यकता नहीं है। 
सकल धर्म को मूल हैं, एक कृष्ण भगवान् ।
 मूल तजे सब शूल हैं, कर्म, योग अरु ज्ञान ॥ ६५ ॥ - भक्तिशतक 

- पूज्यनीयां मां रासेश्वरी देवी जी ।

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