Thursday, 14 September 2023

आज के युग मे हमसब कैसे हैं किस तरह का हमारी समझदारी है , कैसी हमारी सोंच है ! एक काम कि कहानी ।

बहुत ही काम की कहानी - आज के युग मे हमसब कैसे हैं किस तरह का हमारी समझदारी है , कैसी हमारी सोंच है ! किसी चीज , व्यक्ति , घटना , उसके बात को समझने का अंदाज क्या है! यह किसी एक महापुरुष व्यक्ति ने भगवान शंकर और माता पार्वती जी को पात्र बना कर हमें समझाने की कोशिशें कि हैं । पर है यह बहुत उपयोगी । समझने कि जरुरत है कि हम सब याथार्थ में कैसे हैं और दुसरे के बिषय में साधारणत: हमारी क्या राय होती हैं ?

कथा इस प्रकार है - एक बार इस कलयुग में भगवान शंकर जी और माता पार्वती भेष बदल कर संसार में भ्रमण पर निकले , उनके साथ उनका भक्त नंदी भी एक साधारण वैल के रुप में साथ साथ चल रहे थे । भगवान शंकर और माता पार्वती आगे आगे और नंदी एक साधारण वैल के रुप में पीछे पीछे एक गांव से गुजर रहे थे, इतने में कुछ लोग उसी रास्ते से आ रहे थे । लोगों ने देखा की एक प्रौढ पुरुष और स्त्री पैदल चल रहा है और साथ में हट्टाकठ्ठा वैल पीछे पीछे है। यह देख कर एक आदमी ने कौमेंट करते हूए कहा कि " देखो तो कैसा पागल है साथ मे वाहन है , ये पागल व्यक्ति लगता है कि बहुत दुर से आ रहा है फिर भी अपनी फुल सी कोमल पत्नी को भी पैदल ही चला रहा है, ये नही की अपनी पत्नी को वाहन पर हीं वैठा ले और फिर रास्ता तय करें । जबकी वाहन साथ में है"
 यह कहकर वो आगे बढ़ गया , अब भगवान् शंकर जी ने पार्वती जी को कहा की
 " सब सुना न आपने ! अब आप कृप्या वैल पर बैठ जाये ताकी लोग बातें नही बनावें " 
पार्वती जी फिर वैल पर बैठ गई और आगे बढ़ने लगे सभी । इतने फिर आगे एक और आदमी का झुंड आया । उसमे से एक व्यक्ति ने खिल्ली उडाते हुये कहा की ये महारानी जी लगती तो हैं पतिव्रता पर देखो तो कितने ठाठ से खुद वैल पर वैठी है और पति महोदय वेचारे पैदल रास्ता नाप रहें है । कैसा जमाना आ गया आजकल तो धर्म वर्म कुछ रहा ही नही, छी छी छी ।"

यह सुनकर पार्वती जी तत्क्षण नीचे उतर गई और जिद् करके भगवान् शंकर को वैल पर वैठा कर खुद पैदल चलने लगीं । 
 
आगे एक और आदमी का झुंड आया तो उसमें से एक ने कहा की "कमाल है खुद वाहन पर वैठा है , ये नही की पत्नी को भी वैठा लें , वैल तो हट्टाकठ्ठा है अगर दोनो वाहन पर वैठ कर रास्ता तय करे तो क्या हर्ज है भला ! हमारे पास वाहन हो और हम कष्ट करे ये कितना हास्यस्पद् है भला ।" 

अब यह सुन कर दोनो वैल पर बैठ गये और चलने लगे तो आगे फिर तीसरे आदमी का झुंड आया , उसमें से सब देखा फिर कहने लगा की " राम राम राम क्या जुल्म है कितना कसाई है दोनो देखो तो , दोनो बेचारे वैल पर बैठा है। एक बेजुवान जानवर पर जुल्म कर रहा है छि छि छि , क्या घोर कलयुग हैं ।"

भगवान ने कहा चलो अब वापस आज के कलयुग का प्रभाव है । किसी में गुजारा नही हैं ।हर चीज को , घटना को , व्यक्ति को , उसके बात को गलत समझने की आदत है लोगों की , सोंच है लोगों की , चाहे वह व्यक्ति माहान से महान गुरु का संग ही क्यों नही करता दिखे पर फिर भी उसके बिचार मे, सोंच मे, समझने के तरीके में , समझदारी मे, किसी दुसरे को देखने के दृष्टिकोण मे, किसी मे दोष देखने में कोई अंतर नही आया है । 
पार्वती जी ने भगवान से पुछा की "हे प्रभु इस कलयुग में ऐसा क्यों है ? क्यों संतो का महापुरुषों का प्रभाव नही पर रहा हैं लोगों पर या क्यों किसी की अच्छी बाते भी बुरी लगती है, ऐसा क्यों ? 
तो भगवान ने कहा की आज कलयुग में ज्यादातर लोग पुरइन के पत्ते पर जल रुपी शिष्य की तरह है । रहता तो है गुरु के साथ , गाता भी है गुरु ज्ञान और महीमा भगवान का और गुरु का परंतु वास्तव मे गुरु तो क्या आध्यत्म से कोसों दुर है । इनको नही समझाया जा सकता कभी । कभी नही । कमल के पत्ते पर पड़ा जल के बुंद के सामान ही रहेगा और दुसरे को गलत दृष्टि से देखता रहेगा आध्यात्मिक जीवन मे भी । संसारी बिषय की बात तो संसारी ही हैं । आज किसी मे, गुजारा नही है । लोग हमेशा किसी को गलत ही समझेगें तबतक जब तक वो खुद को नही बदले गुरु ज्ञान के बाद भी । 

हमे दुसरे को दोष युक्त बुद्धि से देखने की आदत छोड़नी चाहिये , खुद में दोष देखना चाहिये । ये महाराज जी ने तो सबसे पहले समझाया है फिर भी हमारी आदत नही बदलती । क्योंकि गुरु में श्रद्धा और विस्वास लेस मात्र भी नही । इनके तर्क , कुतर्क , वितर्क से बड़े बड़े जगद्गुरु भी हार जाते हैं ! हम आप किस खेत की मूली हैं ? 
हरि बोल हरि बोल ।

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