Wednesday, 20 September 2023

ईश्वर इतना कठोर क्यों हैं ?

एक व्यक्ति का प्रश्न श्री महाराज जी से , महाराज जी ईश्वर इतना कठोर क्यों हैं ? 

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- न न न यह सब ग़लत बातें हैं , भगवान कठोर नहीं होते हैं , उनसे बड़ा दयालु, उनसे बड़ा कृपालु तो कोई नहीं पुरे ब्रह्यांड में । भक्त के लिए तो भगवान का प्राण भी हाजिर है । जिसके आंखों में भगवान श्री कृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम का आंसू हैं , जो स्वाभाविक रूप से नम्र है , विनम्र है , सहिष्णु है , जिसको अपने धन बल, शरीर बल, रूप बल , ज्ञान बल आदि का अहंकार नहीं , जो स्वयं को वास्तव में दीन मानता है और भगवान कि भक्ति करता है मन से , उसके लिए भगवान से बड़ा दयालु कृपालु तथा कोमल कोई नहीं , भक्त के लिए भगवान का ह्रदय तो एक क्षण में पिघल जाता है , भक्त के लिए वो अपनी भगवत्ता तक भूल जाते हैं , ऊखली में बंध जाते हैं , साटी से मार खाते हैं, घोड़ा तक बन गए ब्रज में , यह सब भगवान कि लीला आप लोग जानते हैं । भक्त के पीछे-पीछे डोलते हैं भगवान । 
निष्काम भक्त के प्रति वो स्वयं को ऋणि मानते हैं , भक्त के लिए वो अपने ही बनाए नियम कानून को त्याग देते हैं और भक्त कि रक्षा करते हैं , जो उसने मांगा भी नहीं वो भी उसे दे देते हैं मैटेरियल वस्तू भी और दिव्य सामान कुछ भी हो , भक्ति में इतनी शक्ति है , सब वो भक्त को देने के लिए आतुर रहते हैं , इसके लिए न वो भक्त का प्रारब्ध देखते हैं और न अगला पिछला कर्म धर्म । भक्त हमेशा सचेत होता है वो अपराध नहीं करता कभी।
जिसके आंखों में ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम का आंसू हैं भगवान उसके मुठ्ठी में है । 

हां भक्त को छोड़ कर वांकी जीवों के लिए भगवान कठोर हैं , जो घोर संसारी है , संसार में लिप्त है , अहंकार से युक्त है , स्वयं को देह मानता है , जिसको अपने ज्ञान , धन, वल , शरीर तथा सामर्थ्य का अहंकार है , उसके लिए भगवान न्यायी है , उसके लिए उनको कठोर बनना पड़ता है क्योंकि न्याय करना है उनको । 
भगवान को इस ब्रह्मांड के प्रत्येक जीवों ( मनुष्यों ) के मन में उठे प्रत्येक क्षण के प्रत्येक संकल्पों को नोट करने का कार्य करना पड़ता है तथा उन संकल्पों के अनुरूप किये गए कर्मों का फल देना पड़ता है , न्याय करना पड़ता है , इस काम को करने के लिए उनको कठोर बनना पड़ता है ,बिना कठोर बने न्याय नहीं हो सकता है , फल नहीं दिया जा सकता । 
संसार में एक मनुष्य ने दुसरे मनुष्य को मार दिया, तो जज को सजा सुनानी पड़ती है , अपराधी को कठोर सजा देनी पड़ती है , मृत्युदंड तक देना पड़ता है , यह काम इतना आसान नहीं होता , जज को न्याय करने के लिए , सजा सुनाने के लिए कठोर बनना पड़ता है । 
इसी प्रकार संसार में लिप्त घोर संसारी जीव को वक्त पर भगवान को भी दंड देना पड़ता है , उसके कर्मों के अनुसार फल देना होता है । 
अब जीव गलत कर्म करता है तो उसको दंड मिलता है , वो भाग भाग के मंदिरों में जाता है , तीर्थों में सिर पटकता है , लेकिन उसको फल के रूप में सजा भोगना पड़ता है, सबको भोगना पड़ता है , पुर्व जन्मो के किए कर्म तथा इस जन्म का उसका किया क्रियामान कर्म, पाप-पुण्य कर्म जब फलीभूत होता है तो वो माफ नहीं होता , चाहे कितना भी कोई संसारी मंदिर मस्जिद, गुरूद्वारा आदि जा कर सिर पटके, और सब करने पर भी जब उसे दंड मिलता है , फल भोगना पड़ता है तो वो समझता है कि भगवान कठोर हैं । 
अरे संसारिक कर्म धर्म के लिए हरेक देश में कायदा कानून हैं, कानून का उलंघन हुआ तो देश के कानून के हिसाब से सजा मिलती है ।
उसी प्रकार ब्रह्यांड के तमाम जीवों के लिए एक कानून हैं भगवान का, वहां से बचना मुश्किल है । नियम का उलंघन हुआ दंड मिलेगा, कोई नहीं बच सकता वहां से चाहे कोई कितना रोये गिड़गिड़ाए , गलत कर्म करते समय क्यों नहीं सोचा तुमने ? 
:- श्री महाराज जी के प्रवचन से ।

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