किसी व्यक्ति,वस्तु,या बिषय से आसक्ति ही उससे अपेक्षा को जन्म देती है, अपेक्षा पुरी होने पर उससे आसक्ति और भी बढ़ जाती है, आसक्ति और बढ़ने से अपेक्षाएं और भी बलबती होती है, और पुरी नहीं होने पर उस बिषय , व्यक्ति , वस्तु या सामान से दुख मिलता है, जब दुख मिलता है तो या तो क्रोध कि उत्पत्ति होती है या द्वेष बढ़ता है , और जब क्रोध या द्वेष से भी काम नहीं बनता तब अपेक्षाएं कम होती है , और जब बार बार अपेक्षाएं खंडित होती है तो उससे आसक्ति समाप्त हो जाती है, जीव उससे उदासीन हो जाता है ।
इस प्रकार आसक्ति समाप्त होने पर उस बिषय , वस्तु , व्यक्ति तथा सामान से मोह समाप्त हो जाता है , इसी को वैराग्य कहते हैं या दुसरे शब्दों में संसार का छीन जाना कहते हैं । मोह पुरी तरह से समाप्त हो जाने पर ही वैराग्य कि उत्पत्ति होती है । अत: वैराग्य के लिए मन से उस बिषय , वस्तु , व्यक्ति तथा सामान से अपेक्षाओं का मिटना परमावश्यक है ।
भगवान और गुरू यही कार्य करते हैं । अपने शरणागत शिष्यों की आसक्ति को संसार से मिटाने के लिए अपेक्षित फल के विपरित फल देते हैं , यानि अनापेक्षित फल देते हैं, अर्थात उल्टा परिणाम देते हैं ताकि शरणागत शिष्य संसार से निराश होकर भगवान में मन लगाने का कार्य करें , यानि किसी भी बिषय वस्तु व्यक्ति तथा सामान से अपेक्षाएं समाप्त कर लें और केवल हरि और गुरू से मानसिक स्तर पर अटैच्ड हो जाए ।
संसार से सारी अपेक्षाएं मिटते ही वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य होते ही मन भगवान तथा गुरू में सेंट पर्सेंट लग जाता है , जीव को भगवद् दर्शन होता है , इसी को भगवद् प्राप्ति कहते है ।
जब तक मन के किसी एक भी कोने में किसी भी प्रकार के मायिक बिषय वस्तु व्यक्ति या सामान से सुख की अपेक्षाएं हैं, भगवद् प्राप्ति नहीं हो सकती । :-
श्री महाराज जी का सिद्धांत पूज्यनीय रासेश्वरी देवी जी के शब्दों का सार ।
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