जो लोग कान फूंकते हैं, इनसे पूछो पहले कि आप कान में क्या देना चाहते हैं? तो वो कहेंगे- मंत्र। किसका मंत्र ? भगवान का। उस मंत्र का क्या मतलब है? हे भगवान ! हम आपकी शरण में हैं। हे भगवान! आपको नमस्कार है। ये दो अर्थ वाले सारे मंत्र हैं, जितने सम्प्रदाय हैं। तो क्यों जी, अगर हम हिन्दी में कह दें, अंग्रेजी में कह दें, फारसी में कह दें, हे भगवान ! आपको नमस्कार है तो उसको भगवान स्वीकार नहीं करेंगे? आपने जो संस्कृत में हमारे कान में मंत्र दिया या देना चाहते हैं, 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय', 'क्लीं कृष्णाय नमः', 'राम रामाय नमः', 'नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये' इत्यादि मंत्र हैं तो ये कान में जो आप देना चाहते हैं उसको हम हिन्दी में बोलें तो भगवान् स्वीकार नहीं करेंगे? क्या जो राम-राम, श्याम-श्याम लोग कहते हैं। इस राम नाम से आपका मंत्र अधिक महत्व रखता है? वो कहेंगे क्योंकि ये हमारे गुरु-परम्परा से आया है, सिद्ध-मंत्र है। तो तुम्हारे सिद्ध-मंत्र में विशेष बात होगी, चमत्कार होगा कुछ? हाँ, बिल्कुल। तो जब तुम कान में हमें मंत्र दोगे तो हमको कोई चमत्कार की फीलिंग होगी, अगर नहीं हुई तो या तो गुरुजी गलत हैं या मंत्र गलत है। अब गुरु जी कहेंगे, तुम्हारा पात्र खराब होगा तो फीलिंग नहीं होगी, चमत्कार की। तो तुमने ये नहीं सोचा कि अगर पात्र खराब है तो गुरु जी को मंत्र नहीं देना चाहिये। आज कल बारह दिन के बच्चे के भी कान फूंक देते हैं ताकि उसे और कोई शिष्य न बना ले। माइक से मंत्र दे रहे हैं। हजारों लोग चेले हो गये सुन करके। जो शास्त्रवेद का नाम तक नहीं जानता, वो भी गुरु बन जाता है। शिष्यों की लाइन लगाता जाता है और वेद कहता है ' श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् '।जो थ्योरिटिकल मैन भी हो, प्रैक्टिकल मैन भी हो उसी को गुरु बनाना है। वो चेला नहीं बनायेगा, तुमको गुरु बनाना होगा उसको। वो चेला तब बनाएगा जब तुम्हारा अन्तःकरण सेन्ट परसेन्ट शुद्ध हो जाएगा।
अन्तःकरण से सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण चला जाए । काम, क्रोध, लोभ, मोह चला जाए। भक्ति करते-करते जब अन्त:करण पूर्णतया शुद्ध हो जायेगा, एक साल, दो साल, एक जन्म, दो जन्म, दस जन्म में तब गुरु देगा, मंत्र कान में। पहले नहीं देगा। मंत्र देते ही भगवत्प्राप्ति, माया निवृत्ति, सब काम खत्म। जैसे आप अपने घर में पहले सब तारों की फिटिंग कर लेते हैं। पंखे लगा लें, बल्ब लगा लें। अब कहिये पॉवर हाउस से कि हमको बिजली दे दो, इलेक्ट्रिसिटी दे दो। सब फिटिंग होने के पश्चात् पॉवर हाउस आपको बिजली देता है। अब आपने घर में कुछ लगाया ही नहीं और आप पॉवर हाउस से कहते हैं, बिजली दे दो तो पॉवर हाउस बिजली कहाँ देगा? दीक्षा से तात्पर्य है- दिव्य प्रेम दान। जब तक अन्त:करण का बर्तन ही तैयार नहीं होगा तो गुरु कहाँ प्रेम देगा क्योंकि आपका पात्र मायिक है और प्रेम प्राकृत अन्तःकरण में धारण नहीं हो सकता।
गौरांग महाप्रभु ने कहा-
दीक्षा पुरश्चर्या विधि अपेक्षा न करे।
भगवान का नाम दीक्षा की अपेक्षा नहीं करता।
नो दीक्षां न च सत्क्रियां न च पुरश्चर्यांमनागीक्षते।
(पद्यावली)
भगवान् के नाम में भगवान् की शक्ति भरी है। राम राम राम, बस इतना काफी है। श्याम श्याम श्याम, राधे राधे राधे, बस। वो संस्कृत, गुजराती, मराठी, बंगाली, किसी भाषा में हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अरे, यशोदा मैया ने तो कभी राम राम, श्याम श्याम भी नहीं कहा। ऐ कनुआ! इधर आ। 'कनुआ', ये कौन शास्त्र में नाम है, कनुआ। कृष्ण का नाम कनुआ, बलराम का नाम बलुआ। ए 'बलुआ'! इधर आ। क, ख, ग, घ हर एक नाम है, भगवान का। वेद कहता है कं ब्रह्म, खं ब्रह्म, अकारो वासुदेवः ।' अ' माने श्रीकृष्ण, 'उ' माने शंकर जी, भगवान के सभी नाम हैं, हर नाम में भगवान की भावना होनी चाहिये, उसका लाभ मिलेगा। मंत्र देते ही यानी दीक्षा देते ही माया का अत्यन्ताभाव हो जाएगा और अनन्त आनन्द मिलेगा। त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिदोष, पंचक्लेश, पंचकोश सबसे सदा को छुट्टी मिल जायेगी। हमको जब गुरु मंत्र देता है, तो हमारे ऊपर उसका असर होना चाहिये, मामूली-सा बिजली का करेन्ट छू जाता है तो कितना असर होता है और वो इतनी बड़ी स्प्रिचुअल पावर दे रहा है, उस मंत्र में डाल के और कोई असर नहीं हुआ। तत्काल माया निवृत्ति, भगवत प्राप्ति, दु:ख-निवृत्ति, आनन्द प्राप्ति का लक्ष्य परिपूर्ण हो जाना चाहिए और अगर नहीं हुआ, इसका मतलब तो गुरु ने धोखा दिया। वो चार सौ बीस है, गुरु नहीं है। वो व्यापार कर रहा है अपना, लोगों को कान फूँक-फूँक करके, चेला बना-बना करके उनसे स्वार्थ-सिद्धि कर रहा है। आखिर उसने क्या किया? उसने दिया- 'राम रामाय नमः', 'ऊँ नमो वासुदेवाय ', 'श्री कृष्णाय नमः। अरे! ये क्या है? अगर हम खाली राम कहें, श्याम कहें तो उस मंत्र में, उस नाम में कुछ कमी है ?
भगवान के नाम में समस्त शक्तियां विद्यमान हैं। जिस दिन किसी जीव को यह विश्वास हो जायेगा कि भगवान और उनका नाम दो नहीं है, एक ही है, तुरन्त भगवत्प्राप्ति हो जायेगी। इसलिये आप लोग उन बाबाओं के चक्कर में न पड़ना। पहले अन्तःकरण शुद्ध करो, बर्तन बनाओ, फिर कोई गुरु दे देगा, आपको सामान। जो असली गुरु हैं वो ढूँढ़ते रहते हैं, कोई पात्र मिल जाए। ऐसा नहीं होता कपड़ा रँगा लिया, बाल रखा लिया, तिलक लगा लिया और अण्ड-बण्ड बोलना सीख लिया, एक मंत्र, और कहते चले गये- आओ, सब लोग चेला बन जाओ। हम तुम्हारे गुरु हैं, हमारे चरण धोकर पियो और गोलोक में हम मिलेंगे ऐसे गुरु की क्या गति होगी, मरने के बाद वह कहाँ जायेगा। नरक जायेगा और तुम्हें गोलोक का टिकट दे रहा है। इतना बड़ा धोखा हमारे देश में चल रहा है।
गौरांग महाप्रभु से प्रश्न किया लोगों ने कि मंत्र अगर लिया भी जाय तो ब्राह्मण गुरु से लिया जाय या किसी भी जाति वाले से लिया जाय।
गौरांग महाप्रभु ने उत्तर दिया-
जेइ कृष्ण तत्ववेत्ता सेइ गुरु हय
चाहे ब्राह्मण हो, चाहे संन्यासी हो, चाहे शूद्र हो, चाण्डाल हो, अगर उसने भगवत्प्राप्ति किया है तो उसकी शरण में चले जाओ, डरो मत। जाति मत देखो।
चांडाल से भी भगवान सम्बन्धी तत्त्वज्ञान प्राप्त करो। जाति मत देखो। ये तो शरीर का धर्म है। वर्णाश्रम धर्म जो है, ये तो शरीर का धर्म है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यह सब तो तुम्हारा शरीर है, तुम तो आत्मा हो। सभी जीव भगवान के दास हैं और सब एक-सी आत्मायें हैं। जब सृष्टि हुई तो ब्रह्मा प्रकट हुये, ब्रह्मा के बाद फिर सृष्टि चली तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सबके पूर्वज ब्रह्मा ही तो हैं। तो ब्रह्मा को ब्राह्मण कहोगे कि क्षत्रिय कहोगे कि वैश्य कहोगे कि शूद्र कहोगे। भागवत कहती
है-
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः स्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥
(भाग. ३-३३-७)
वो चाण्डाल परम पूज्य है जो भगवान् का भक्त है।
न मे प्रियश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः स्मृतः।
भगवान कहते हैं- मुझे चारों वेद का विद्वान ब्राह्मण प्रिय नहीं है, जो मेरा भक्त है वो चाण्डाल भी प्रिय है।
रैदास चमार हो, चाहे कोई हो। जिसने भगवान को पा लिया अब उसको क्या पाना बाकी है, उससे बड़ा और कौन होगा?
ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः।(भाग. ३-२९-३१)
भागवत कहती है- ब्राह्मणों में वो ब्राह्मण श्रेष्ठ है जो चारों वेदों का विद्वान हो और चारों वेदों के विद्वान ब्राह्मणों में भी वो श्रेष्ठ है जो वेद-शास्त्र का अर्थ जानता हो और उन वेद-शास्त्र के अर्थ जानने वाले ब्राह्मणों में भी वो श्रेष्ठ है जो दूसरे को समझा सके, और उस ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ वो है जो श्रीकृष्ण का भक्त हो।
विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्द नाभपादारविन्दविमुखाच्छ्व्पचं वरिष्ठम्।
मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥
(भाग, ७-९-१०)
बारह गुणों से युक्त ब्राह्मण भी पूजनीय नहीं है और एक चाण्डाल पूज्य है, अगर वह श्रीकृष्ण भक्त है। अत: जो भगवत्प्राप्ति कर चुका, वह किसी भी जाति का हो, वह गुरु बन सकता है। वह मंत्र दे या न दे, उसकी इच्छा है। मंत्रदान द्वारा भी दीक्षा दे सकता है या अन्य किसी प्रकार से भी दे सकता है। प्रेमदान करना है, जैसे भी करे। तो जाति-पाँति से कोई मतलब नहीं है। अगर वो सिद्ध महापुरुष नहीं है और आपने उससे मंत्र लिया है तो दोनों नरक जायेंगे।
अवैष्णवोपदिष्टेन मंत्रेण निरयं ब्रजेत्।
दोनों को नरक मिलेगा? अजी, हमें क्यों मिलेगा? हम क्या जानें, ये महात्मा है कि नहीं, पूरा-पूरा? जानना चाहिये, ये तुम्हारी ड्यूटी है। इससे छुट्टी नहीं मिलेगी कि हमको धोखे में डाला, इस बाबा ने। क्यों धोखे में पड़े? तुम्हारी भी गलती है और उसकी तो है ही है, वो तो जायेगा ही नरक। मंत्र देने का मतलब है, मंत्र में दिव्य शक्ति देता है गुरु। मंत्र दीक्षा के द्वारा जो दिव्य शक्ति देता है गुरु, उसको सहन करने की शक्ति होनी चाहिये आप में, नहीं तो ये शरीर भस्म हो जायेगा, राख भी नहीं मिलेगी। देखो, संसार में भी जब किसी को कोई बड़ा आनंद मिलता है, जैसे- किसी भिखारी की लॉटरी खुल गई, एक करोड़ की, तो उसका हार्ट फेल हो जाता है या किसी आदमी का एक दम जवान लड़का मर जाय, उसका हार्ट फेल हो जाता है। यानी अधिक आनन्द, अधिक दुःख से हम शरीर छोड़ देते हैं, सहन नहीं कर सकते।
तो अनन्त आनन्द भगवान का अगर देगा गुरु तो उसे सहन करने का बर्तन भी होना चाहिये अर्थात् अन्तःकरण दिव्य होना चाहिये। इसलिये गुरु पहले आपको बर्तन बनाने का साधन बतायेगा, तत्त्वज्ञान देकर साधना करायेगा। साधना करते-करते जब अन्तःकरण शुद्ध होगा तो वह स्वरूप शक्ति से अन्त:करण को दिव्य बना देगा। तब तुम्हारी इन्द्रियाँ, तुम्हारा मन, तुम्हारी बुद्धि, सब दिव्य हो जायेंगे। उस दिव्य इन्द्रिय, मन, बुद्धि में फिर ये शक्ति है कि भगवान का दिव्यानन्द सह लो। मंत्र दान से तात्पर्य है भगवत्प्राप्ति। जैसे- जब आपने घर में सब फिटिंग कर लिया बिजली की, पंखे भी लगा लिये, टयूब-बल्ब सब लगा लिये तब पावर हाउस से तार जोड़ते हैं, अब लाइट भी जल गई, पंखे भी सब चलने लगे। अगर आपने कोई फिटिंग की ही नहीं है तो तार कहाँ जोड़ोगे, पावर हाउस से।
तो जब अन्तःकरण का बर्तन दिव्य हो जायगा, तब महापुरुष भगवान की दिव्य शक्ति देगा। और बस उसी क्षण भगवत्प्राप्ति, उसी क्षण माया-निवृत्ति, त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिताप, पंचक्लेश-निवृत्ति, पंचकोष-निवृत्ति, सब काम समाप्त।
भक्तियोगरसावतार_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।।
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