हममें से जिनको जिनको ये अहंकार है कि हमसे बड़ा साधक या भक्त नही कोई , हमसे बढ़िया व्यक्ति कोई नहीं , उन्हें इस तत्वज्ञान को जरूर एक बार पढ़ना चाहिए:-
बड़े बड़े महापुरूष, भगवद् प्राप्त संत स्वयं को पतित खल कामी मानते हैं ।
लेकिन हम साधारण मनुष्य जिसका ह्रदय गंदा है, अंत:करण गंदा है, बुद्धि भ्रमित है, स्वयं का अभी ठिकाना नहीं कि हम अगले जन्म में कुत्ता बिल्ली गद्हा घोड़ा बनेंगे या मनुष्य शरीर ही मिलेगा ! लेकिन घोर आश्चर्य कि बात की तमाम तत्वज्ञान सुनने, जानने और समझने के बाबजूद हम स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान, बुद्धिमान और सबसे ऊंचा तथा अच्छा मानते हैं, और दुसरे को छोटा समझते हैं , दुसरे को अधम , पतित नीच तथा गंदा समझते हैं, यही पहचान है कि हमारा अंत:करण कितना गन्दा है, कितना हमने कमाया है और कितना गंवाया है आज तक । फिर भला हमारे जैसे सोंच बाले जीव का कल्याण कैसे हो सकता है ?
स्वयं को बड़ा समझना और वांकि संसार के लोगों को झूठा समझना , नीच समझना यह सिद्ध करता है कि हमारा मन कितना गन्दा है , अंतःकरण कितना गन्दा है ? यह सबसे बड़ा पहचान है स्वयं के नीच होने का ।
भगवद् प्राप्त महापुरुष तुलसीदास , मीरा , तुकाराम सुरदास आदि स्वयं को सबसे छोटा मानते हैं , अधम तथा पतित कहते हैं खूद को :-
मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥ :- सुरदास
भक्ति कि महारानी, भक्ति महादेवी की प्रति मूर्ति सबरी कहती हैं राम से :-
"अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥"
सबरी कहती हैं "हे राम, भला मुझसे अधिक अधम मतिमंद कौन है इस जग में " ?
दास भाव भक्ति में श्रेष्ठ श्री हनुमानजी ने विभीषण से कहा -
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबही विधि हीना।।
यानी, कहो विभिषण जी, मैं कौन सा परम कुलीन हूं, मैं तो बंदर हूं, चंचल हूं और सब प्रकार से हीन हूं !
अस मैं अधम सखा सुनूं, मोहूं पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिर गुन, भरे विलोचन नीर।।
हे सखा सुनो, मैं ऐसा अधम हूं फिर भी रघुबीर ने मुझपर कृपा की है। इस प्रकार भगवान राम के गुणों का वर्णन करके हनुमानजी की आंखें डबडबा जाती हैं।
अरे भक्तों में श्रेष्ठ , भगवान शंकर श्री राम से प्रार्थना करते हैं और स्वयं को दीन स्वीकार करते हुए कहते हैं :-
गुण सील कृपा परमायतनं। प्रणमामि निरंतर श्रीरमनं॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं॥
जय राम रमा रमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनम॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ :- भगवान शंकर ।
भावार्थ:-
हे राम आप गुण, शील और कृपा के पराकाष्ठा हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए। हे जीवों का पालन करने वाले राजन, मुझ दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥10॥ :- भगवान शंकर ।
भक्तों में श्रेष्ठ श्री भरत कह रहे हैं :-
मोहि समान को पाप निवासू।
जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा।
बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥2॥
भावार्थ:-भरत कह रहे हैं कि मेरे समान पापों का घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्री रामजी का वनवास हुआ? राजा ने श्री रामजी को वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्ग को गमन किया॥2॥
फिर भरत जी कह रहे हैं :-
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू।
बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिन रघुबीर बिलोकि अबासू।
रहे प्रान सहि जग उपहासू॥3॥
भावार्थ:-और मैं दुष्ट, जो अनर्थों का कारण हूँ, होश-हवास में बैठा सब बातें सुन रहा हूँ। श्री रघुनाथजी से रहित घर को देखकर और जगत् का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥3॥
गौरांग महाप्रभु जी ने स्वयं को दीन हीन पतित कहा :-
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥ - शिक्षाष्टकम्।
गौरांग महाप्रभु कहते हैं कि हे प्रभु आपने अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥ :- शिक्षाष्टकम्
हमारे गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी ने अपने पदों में अनेकों जगह स्वयं के लिए " कृपालुमतिमंद " जैसे शब्दों का प्रयोग किया है ।
कबीरदास जी ने कहा है :-
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय ॥
लेकिन हम है कि हमें दुसरे में दोष हीं दोष नजर आता है । यही सबसे बड़ा अहंकार है ।
जिसका मन बुद्धि चित्त अहंकार जितना गंदा होता है उसको दुसरे में उतना ही दोष नजर आता है । वो स्वयं को सबसे अच्छा और दुसरे को बुरा समझता है , इससे बड़ी मुर्खता कुछ भी नहीं ।
ऐसा जीव कभी भगवद् मार्ग का अधिकारी नहीं हो सकता । चाहे कितना भी सिर पटक ले महापुरुषों के चरण में ।
भगवद् मार्ग पर चलने वाले पथिक के लिए सबसे पहली कक्षा का पहला Lession है कि स्वयं को भगवद् प्राप्ति के पहले तक सबसे बड़ा गुणहगार , सबविधि दोषी, सबसे छोटा , अधमों में सबसे बड़ा अधम , अति पतित , अति दीन तथा भिखाड़ी समझना और दुसरे हरेक को अपने से उच्च मानना, चाहे कोई घोर संसारी हीं क्यों न हो ।
दुसरा Lession है स्वयं के लिए सम्मान न चाहे और हर किसी को सम्मान दे , दुसरे को अपने से ऊंचा माने वही भगवद् प्रेम मार्ग में सफल हो सकता है ।
जिसको यह अभिमान है कि हम बड़े अच्छे हैं और दुनियां के वांकि लोग हमारे सामने कुछ भी नहीं वो सबसे बड़ा गद्हा है । बला का मुर्ख है वो ।
हमे भगवद् प्राप्ति के पहले सेकंड तक स्वयं को सबसे बड़ा पतित मानना चाहिए। नहीं तो गए , पतन निश्चित है ।
लेकिन हम है कि उल्टा सोंचते है , हम दुनिया को झूठा , मक्कार और फरेबी मानते हैं और स्वयं को महापुरुषों का दादा मानते हैं । यह हमारे अहंकार का पहचान है । यह सिद्ध करता है कि हमें कोई तत्वज्ञान नहीं । हमने गुरू से कुछ सिखा ही नहीं । कुछ भी ग्रहण नहीं किया ।
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