कुछ ऐसे नास्तिक मनुष्य जिनको सनातन वैदिक धर्म, सनातन भगवान में, उनके संतो में श्रद्धा का आभाव है , संशय है , वो अक्सर पुछते है कि भगवान गलत कर्म करने वाले लोगों के मुखिया को , सरदार को, लीडर को , यानि जो नास्तिकों का मुखिया होता है , जो खुद तो गलत करता है और दुसरे को भी गलत करने के लिए प्रेरित करता है उसका विनाश क्यों नहीं करते अगर है तो ?
क्यों छोटे छोटे अपराध करने वाले का सबसे पहले सफाया हो जाता है पर गलती के सरदार को , नंबरी गुंडा का सफाया सबसे अंत में होता है ?
इसका मतलब भगवान अन्यायी है ! ऐसे प्रश्न होते हैं कुछ लोगों का ।
तो सबसे पहले मैं उनको यह कहना चाहुंगा कि शास्त्र कहता है -
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। (भागवत )
यानि अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य नष्ट हो जाता है, उनमें भी संशयी जीव के लिये न यह लोक है, न परलोक और न दोनों लोकों का सुख अत: उनका नाश निश्चित है वो भी बुरी तरह से ।।
भगवान के बहुत से लीला आदि साधारण लोगों के समझ से परे होता है ।
मैं तो केवल बस उस ओर उनकी दृष्टि ले जाने चाहता हुं कि इसका क्या मूल कारण है , आप खुद ही जान जाएंगे ।
तो सुनिय , यही प्रश्न एक बार भईया बलभद्र श्री कृष्ण से पुछ बैठे थे , कि तुम हर बार युद्ध में जरासंध का साथ देने वाले सभी राजाओं को तथा उसकी सेना का सफाया कर देते हो, पर जरासंघ को छोड़ देते हो ऐसा क्यों ? सभी दुष्टों के इस सरदार को क्यों छोड़ देते हो तुम । यह बार बार फिर हमसे युद्ध करने आ जाता है दुसरे दुष्ट राजाओं को साथ लेकर , दुसरे के साथ गठबंधन करके , उससे दोस्ती करके ?
हमें हर बार इससे युद्ध करना पड़ता है , आज सत्रहवां बार तुम उसको छोड़ दिये हो , और जब इसका बद्ध करने की बारी आती है , रण छोड़ कर तुम भाग जाते हो ?
भगवान श्री कृष्ण ने ज़बाब दिया भईया । अगर इसको सबसे पहले मार दुंगा तो फिर वांकी छोटे छोटे राक्षसों का , दुष्ट मनुष्यों का , पापियों का विनाश नहीं हो पायेगा ।
इसको इसलिए छोड़ देता हुं ताकि यह अधिक से अधिक संशयात्मा को इकट्ठा करके, छोटे छोटे अपराधियों को , दुष्टों के जमात को इकट्ठा कर , भगवद् विश्वास रहित जीव , सनातन धर्म विरोधी जीवों को इकट्ठा करें और सबसे पहले उसका विनाश हो सके ।
संशयात्मा एक ऐसा बीज है जो कई गुणा अधिक गलत लोगों के समुह को खड़ा कर देता है समाज में , जो भोले भाले श्रद्धावान लोगों को सताता है , समाज में व्यभिचार का वाहक होता है ।
ऐसा जीव जो खुद पर और ईश्वर पर भरोसा ना करें और दुसरे गलत लोगों के बहकावे में आ जाए , उसके पास भगवान के प्रति ना श्रद्धा हो और ना विश्वास हो , जो दुष्कर्म करने वाले अन्याय , अत्याचारी के बहकावे में झट से आ जाए उनका मानव जीवन व्यर्थ है । अत: उसका मानव शरीर भी व्यर्थ है , इसलिए उससे सबसे पहले ऐसे जीवों का मानव शरीर में छीन लेता हुं किसी अन्य को माध्यम बना कर और सबसे अंत में उस दुष्ट सरदारों का सफाया करवाता हुं यह मेरी रणनिति है ।
भइया अगर मैं सबसे पहले रावण , कुंभकर्ण , कंस आदि को मार देता तो छोटे छोटे राक्षसों का विनाश कैसे हो पाता , वो तो बच जाते , छुप जाते । पृथ्वी का भार इन दुष्टों से कैसे कम होता भला ?
इसलिए मै जरासंध को सत्रह बार छोड़ दिया ।अगली बार भीम भईया से इसको समाप्त करवा दुंगा । अगर स्वयं मारूंगा तो मुझे इनको अपना लोक देना पड़ेगा । इसलिए इनको मारने के लिए मैं स्वयं नहीं आता । इनको मारने के लिए मैं अन्य माध्यमों का इस्तेमाल करता हूं ।
तो इससे हमें शिक्षा मिलती है कि कोई अगर किसी को भगवान के खिलाफ करता है, असली महापुरूषों से, संतों के खिलाफ भड़कता है , उनसे दुर करने का कुकृत्य करता है तो भड़काने वाले को सबसे अंत में भगवान सजा देते हैं और भड़कने वाले जीव का सफाया सबसे पहले होता है ।
:- संजीव कुमार , रांची । 🙏❤️🙏
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