Thursday, 20 July 2023

संसार आसक्तियुक्त जीव या यूं कहें कि संसार के बिषय भोग में लिप्त व्यक्ति चाहे अपने तमाम जीवन में कितना भी जन धन वैभव नाम शोहरत आदि इकठ्ठा कर लिया हो लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में साढे छ: फिट बाई छ: फीट के विस्तर पर वो एक भयभीत कर देने वाला, वेचैन कर देने वाला, निराशा से युक्त, खालीपन से भरा अजीव खोखला जीवन अवश्य महसूस करता है जो उसे फिर से माया के अंतहीन दुखदायक पथ के तरफ पल पल धकेलता रहता है ।

संसार आसक्तियुक्त जीव या यूं कहें कि संसार के बिषय भोग में लिप्त व्यक्ति चाहे अपने तमाम जीवन में कितना भी जन धन वैभव नाम शोहरत आदि इकठ्ठा कर लिया हो लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में साढे छ: फिट बाई छ: फीट के विस्तर पर वो एक भयभीत कर देने वाला, वेचैन कर देने वाला, निराशा से युक्त, खालीपन से भरा अजीव खोखला जीवन अवश्य महसूस करता है जो उसे फिर से माया के अंतहीन दुखदायक पथ के तरफ पल पल धकेलता रहता है । ऐसे जीवों के लिए यह एक ऐसा समय होता है जब न धन काम देता है , न शोहरत , न शरीर , न उनके संबधी और न उनका वैभव, केवल अकेलापन और केवल बस भयानक मौत का पद् चाप सुनाई देता है जो इस बात का आभास उसे करा देता है कि उसने कोई तो ऐसा काम नहीं किया है अपने जीवन में जो उनको तिर्यक योनि में जाने से बचा ले । अत: इनके पास केवल बच जाता है तो एक पश्चाताप तथा अंतहीन सफर और कुछ नहीं । अब इस पश्चाताप का क्या फायदा जब शरीर नहीं बचा भगवद् साधना के लिए, भक्ति के लिए ? 
"अब पछताए क्या होत, जब चिड़ियां चुग गई खेत"

वही भक्ति मार्ग का जीव, साधक भले इस जन्म में अपने लक्ष्य को न पाया हो लेकिन वो अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अपने गुरू के कृपा बल से भगवद् तुल्य असीम संतोष , असीम आनंद ,, सकुन, अतुल्य सुख और एक दिव्य आशाओं से भरा पुरा परिपूर्ण जीवन जरूर जीता है जो हर समय उसे इस बात का एहसास कराता है कि अगला जीवन उसे मनुष्य का ही मिलेगा , साथ साथ उसे गुरू कृपा के परिणामस्वरूप भक्ति और प्रेम तथा साधना का विल्कूल अनुकूल माहौल भी मिलेगा जिसमें वो अपने वांकि बचे साधना को पुरा करके अपने लक्ष्य को अवश्य हासिल हर लेगा । 
यही अंतर है संसार आसक्त जीव तथा भक्ति एवं भगवद् प्रेम आसक्त जीवों के जीने में ।। ( मैंने इसे कोरा अनुमान के आधार पर नहीं लिखा है, यह अनुभव है कुछ उन अति बुजुर्ग तथा सिरियस साधकों का जो उन्होंने मुझसे शेयर किया है बातचित के दरम्यान ) 
 श्री राधे । :- गुरू प्रेरणा से संजीव कुमार

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