उत्तर :- माधुर्य भाव के रसिक संतों ने भगवान श्री कृष्ण को गोविंद कहा है ।
राजस्थानी तथा ब्रज मिश्रित भाषा में "बिन्द"
का मतलव होता है ' नाथ' 'स्वामी' 'प्रियतम' तथा ' सदा ह्रदय में रहने वाला एक मात्र प्राण प्रिए' और "बिन्दनी" का मतलव हैं होता है 'दास' 'सेवक' 'बधु' प्रेमिका तथा 'अनन्य भक्त' ।
और "गो" का मतलव होता है गोलोक के गोप गोपी तथा गौ कि आत्मा।
अत: गोविंद का मतलव हुआ गोलोक के गोप गोपी तथा गोलोक कि गायों कि आत्मा रूपी शरणागत दास का स्वामीं ।
मतलव भगवान श्री कृष्ण शरणागत गोप गोपियों तथा गो आत्मा रूपी बिन्दनी अर्थात सदा शरणागत दास के विन्द है अर्थात एक मात्र स्वामी हैं । इसलिए उनको गोविंद कह कर रसिक संत , ब्रज कि गोप गोपियां पुकारती है।
क्योंकि भगवान श्री कृष्ण "गोपबधु जन ह्रदया भरणम" है यानि गोप गोपियों तथा गौ रूपी बिन्दनी के ह्रदय को अपने प्रेम से तृप्त करने वाले एक मात्र बिन्द है । इसलिए वो गोविंद है ।
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