Thursday, 20 July 2023

भगवान को भक्त के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने कि आवश्यकता क्यों हैं ?

प्रश्न :- भगवान को भक्त के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने कि आवश्यकता क्यों हैं ?
 आपके प्रश्न का उत्तर :- भगवान को भी अपने भोले भाले ऐश्वर्य रहित, ज्ञान रहित भक्तों के निष्काम प्रेम रस को पीने कि इच्छा बनी रहती है सदा । 
भाव भक्ति के इसी रस के पान के लिए वो मानव शरीर धर कर पृथ्वी पर अपने निष्काम भोले भाले भक्तों के बीच आते रहते हैं । 

उदाहरण :- जैसे संसार में प्रत्येक मां बाप को भी अपने भोले भाले शिशु के शैशव काल के भोले भाले स्वाभाविक प्रेम को प्राप्त करने तथा अपने शिशु को अपने मातृत्व का सुख देने कि अभिलाषा होती है हमेशा । जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है तो वो पढलिख कर भौतिक ज्ञान ऐश्वर्य से युक्त हो जाता है , वो शिशु के समान भोला नहीं रहता । 
अत: मां बाप से उसे वैसा भोलापन युक्त प्रेम नहीं रहता जैसे उसके शैशव काल में था । तोतली बोली , कोमलता , मृदु स्वभाव , भोलापन आदि नहीं रहता । 

उसी प्रकार भगवान में भी अपने अंश रूपी मानव भक्तो के निष्काम प्रेम को प्राप्त करने कि प्यास वलवती हो जाती है जिसे परकिया भाव का प्रेम कहते हैं , यह प्रेम उन्हें उनके दिव्य लोक में नहीं मिल सकता है । 
क्योंकि वहां जो जीव पहुंच जाता है वो दिव्य ज्ञान , दिव्य ऐश्वर्य तथा दिव्य भाव से भर जाता है प्रेम का स्वरूप दिव्य हो जाता है । 
लेकिन जो जीव माया लोक में गुरू कृपा द्वारा भगवान से प्रेम करने के लिए प्रेरित होता है तो वो भगवान को अच्छा लगता है क्योंकि यह दीनता , नम्रता , अहंकार शून्यता , ऐश्वर्य रहित, ज्ञान रहित तथा भक्तों के भोला पन युक्त प्रेम भाव से भरा होता है ।
अत: ऐसे ही भाव भक्ति पूर्ण भोला भाले भक्तों के प्रेम भाव युक्त रस को पाने के लिए तथा अपना प्रेम देने के लिए भगवान नर देह धारण करके आते हैं धरा धाम पर । 

 पृथ्वी पर आकर भगवान योग माया द्वारा अपने भगवत्ता को भुला देते हैं और भक्त भी उनको भगवान न मान कर अपना पुत्र तो सखा या अनेकों संबंध से जानता है‌, ( अगर यशोदा मईया जान जाती कि यह भगवान हैं तो वो‌ वात्सल्य सुख पाने‌ तथा उन्हें मातृत्व सुख प्रदान करने से वंचित हो जाती ) इस प्रकार वो किसी भक्त का पुत्र तो किसी का सखा किसी का प्रेमास्पद् तो किसी का दास बन उनको वात्सल्य सुख , मित्र सुख आनंद , किसी को अपना गुरू बना कर उसे शिष्य सुख प्रदान करते हैं और उनसे वैसा ही मातृत्व सुख हासिल करते हैं । जैसे यशोदा और नंद बाबा से मां बाप का मातृत्व सुख , गोपियों से निष्काम प्रेमिका वाला सुख , गुरू से उनका अनुयायी वाले भाव का सुख , मनसुख सुदामा आदि से मित्रता वाला सुख आदि प्राप्ति करते हैं ।‌ ऐसा सुख उनको गोलक में नहीं मिल सकता , इसलिए वो नर देह में आते हैं अपने अंशो के बीच धरा धाम पर । श्री राधे ।
भगवान का अवतार राक्षसों के विनाश के लिए नहीं होता, वल्कि उनका अवतार अपने भक्तों के उद्धार के लिए होता है । प्रेमी जनों के प्रेम को स्वीकार करने तथा उन्हे अपना प्रेम देने के लिए भगवान का नर देह में अवतार होता है इस धरा धाम पर , और इसी क्रम में राक्षसों का विनाश भी हो जाता है लगे हाथों उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके रहते , क्योंकि भगवान सभी प्रकार के निर्दोष जीवों का, निराबलम्बी जीवों का भी अवलंब होते हैं । अत: उनके कष्टों का निवारण भी वो करते हैं अपने प्रेमी जनों के साथ साथ ।

लेकिन जब उनका आना नहीं होता है इस धरा धाम पर तो उस समय भी वो दुष्टों का , अत्याचारियों का तथा छल बल वाले एवं राक्षस प्रवृत्ति वाले जीवों के अतिशय अत्याचार को समाप्त करने के लिए एवं पृथ्वी पर संतुलन बनाए रखने के लिए वे किसी भी जीव चाहे वो राक्षस हो या मनुष्य या तो पशु हो या बृक्ष हो , असाध्य रोग या प्राकृतिक आपदा , या अकस्मात दुर्घटना आदि के माध्यम का उपयोग करते रहते हैं समय समय पर ।

यानि जब जब धर्म कि हानि होती है तब तब वो अनेकों अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं दुष्टों के संहार के लिए पृथ्वी पर , जरूरी नहीं कि वो स्वयं आ हीं जाए । वो तो सत्य संकल्प हैं किसी न किसी माध्यम से या किसी को भी माध्यम बना कर वो दुष्टों का संहार कर हीं देते हैं । जिसे समझना हम साधारण लोगों के वश कि बात नहीं है। 

उनको मनुष्यों के द्वारा बनाए गए किसी भी देशों के संविधान से कोई मतलव नहीं है । 
मनुष्यों के द्वारा बनाया गया संविधान दोष रहित नहीं होता , न ही पुंदोष और ना ही निष्कलंक होता है और न निष्पक्ष । 
मनुष्यों के द्वारा बनाए गए संविधान में तो अनेकों त्रूटियां , पक्षपातपूर्ण कानून तथा कुछ लोगो के द्वारा बहुमत से अपने सुविधा के अनुसार बदल लेने वाला एक अक्षम अस्थाई अपूर्ण व्यवस्था है । 

लेकिन भगवान का विधान ( वेद- शास्त्र उपनिषद आदि) तो सनातन है , पुंदोष है तथा निष्कलंक एवं निष्पक्ष है सदा से । 

अत: मनुष्य को पाप करते समय , निर्दोषों को सताने वाले, अन्याय करने वाले जीव को एवं अन्य किसी भी संसारिक सत्ता तथा बल के नशे में अंधे हो चुके दुराचारी मनुष्य को ही नहीं वल्कि इनका सहभागी जीव को एवं इनका पक्ष लेने वाले को भी कभी यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्यों के द्वारा बनाए गए किसी भी देश के संविधान के त्रूटियों का सहारा लेकर , नजायज फायदा उठा कर वो थोड़ी देर के लिए बच सकतें है लेकिन भगवान के बनाए संविधान से वो नहीं बच सकते है कभी , अंतत्वोगत्वा फैसला उपर से हो हीं जाता है । 

क्योंकि आखिरी और सबसे बड़ा अंतिम फैसला तो भगवान के संविधान से हीं होता है जीवों का । इस बात का रियलाईजेशन जिस मनुष्य को हो गया वो फिर कभी कोई पाप नहीं करेगा धरा धाम पर । 
अन्यथा केवल पुजा पाठ यज्ञ जप तप उपवास गंगा स्नान आदि से पाप नहीं मिटते कभी , भगवान खुश नहीं होते कभी। 

जीव का आचरण कैसा है यह बहुत महत्वपूर्ण है । जीव का आचरण , व्यवहार, चरित्र, सोंच , संकल्प तथा मन की शूद्धता परमावश्यक है । 
अन्यथा जप तप व्रत उपवास पुजा यज्ञ तीर्थ विरथ गंगा स्नान जप दान आदि से कभी कोई लाभ नहीं होता कलयुग में । 
अंत करण की शूद्धि परमावश्यक है । 
जो मनुष्य इन बातों को या तो जानते नहीं या जानने के बाद भी स्वीकार करके अपने संकल्प और आचरण को नहीं बदलते , भगवान के विधान के अनुकूल नहीं होते वो अपने ही मन के दुष्टता , दुर्वलता , ईर्ष्या, द्वेष घृणा के अग्नि में जल कर नष्ट हो जाते हैं यह भगवान का विधान है । 
श्री राधे ।  
श्री राधे । श्री राधे।
:- गुरू प्रदत तत्वज्ञान से ।- संजीव कुमार

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