और आश्चर्य कि बात तो ये कि वो सोचते हैं कि हमारा तो लाभ नहीं हो रहा है , हम दुख भोग रहे हैं , आभाव ग्रस्त हैं ।
तो आपको भला लाभ कैसे हो ? आप एक तरफ तो अपने गुरू का अनुयायी होने का नाटक कर रहे हैं तथा दुसरी ओर आप उनके सिद्धांतों के प्रतिकूल बातों का भी समर्थन कर रहे हैं ?
जरा सोंचना चाहिए कि यह तो समर्पण और शरणागति के खिलाफ बात है । अगर हम अपने गुरू के अनुयायी है तो उनके 100% बातों को न केवल मानना होगा वल्कि 100% उनके बतलाए सिद्धांतों को अपना कर उस पर चलना होगा , तब जाकर अनन्यता का शर्त पुरा होगा । फिर लाभ होगा ।
नहीं तो मन ही मन हां हां ए बात श्री महाराज जी बहुत बढ़िया बतलाए हैं लेकिन ये जो दुसरा बात वो किए है वो मुझे नहीं जंचता , इस मामले में चलो दुसरा बाबा जी जो बोला है वो बढ़िया है, उसको अपनाते हैं ! तो लगा दिए न अपनी दो कौड़ी का बुद्धि यहां पर ?
दुसरे के पास भी जाते हैं और उसका भी जय जयकार कर आते हैं ?
तो यही कारण है कि हमारा ईष्ट और गुरू हमसे उदासीन हो जाते हैं । हमको उनसे कोई लाभ नहीं मिलता ।
सोंच लिजिए श्री राधा रानी को और श्री महाराज जी को यही बातें विल्कूल पसंद नहीं है । श्री राधा रानी और श्री महाराज जी ऐसे जीव के तरफ देखते भी नहीं जो अपने प्रियतम के सिद्धांतों के एक भी बात के विपरित जाए लेकिन यह आशा करें कि हरि और गुरू उनका योगक्षेम वहन करें , उनको श्री कृष्ण प्रेम दें , सुख दें , कष्ट दुर हो ! श्री राधा अवढ़र दानी जरूर है लेकिन केवल उनके लिए जो श्री राधा रानी को छोड़ कर , वृन्दावन के कानून को छोड़ कर कहीं और न भटके ।
वृंदावन का कानून है संसार से आसक्ति न रखें, ऐश्वर्य सुख भोग कि कामनाओं का त्याग करें । संसार का उपभोग केवल अपने शरीर के लिए करें , क्योंकि भौतिक शरीर भक्ति के लिए बहुत आवश्यक है । अगर अनन्य भक्ति के लिए आपके पास संसार का कुछ आभाव है , शरीर में कमी है तो राधा रानी तथा श्री महाराज जी जब देखते हैं परीक्षा लेकर कि यह दुख में परा है फिर भी कहीं दुसरे जगह नहीं जा रहा है , प्रारब्ध वश इतने दुख के बाद भी इसका ईमान , धर्म , विश्वास तथा श्रद्धा पूर्ण रूप से पक्का है मेरे प्रति , तो वो अवढ़र दानी है, वो इन कमियों को एक नजर देखने मात्र से ही पुरा कर देतीं है । यह बहुतों का अनुभव है और मेरा भी अनुभव स्पष्ट रूप से हैं । पुरे ह्रदय से बोल रहा हूं, रोंगटे खड़े हो जाएंगे अगर मैं खुल के बता दूं तो ! हमारा तो सबकुछ वहीं सम्भालती हैं हमेशा वर्णा आज मैं होता नहीं दुनियां में , इतना भयानक घटना दुर्घटना हुआ कि बचना मुश्किल था । कई बार प्रारब्ध वश मैं उजड़ा, मेरा आशियाना उजड़ा और हर बार राधा रानी और श्री महाराज जी हीं हमारी रक्षा किए और पहले से भी कहीं अधिक बेहतर बना कर वसाए मुझे । क्या नहीं करते हैं दोनों मेरे लिए, मैं तो लाख बार जन्म भी लूं तो तथा अरबों मुखों से इनका गुण गाऊं तो भी असंभव है इन दोनों का आभार व्यक्त करना । क्या नहीं दिया मुझे श्री राधा रानी तथा श्री महाराज जी ने , चाहे अध्यात्मिक सुख हो , ज्ञान हो, प्रेम हो या भौतिक जरूरत की बस्तुऐं !😭😭😭
राधा रानी जब देखती है कि:- " यह मेरा बच्चा है , यह हर बात के लिए केवल मेरे उपर ही निर्भर है बेचारा । किसी चीज के आभाव के बाबजूद भी यह किसी और के तरफ नहीं देखता कभी भूल से भी या सपने में भी और न मुझसे या किसी से कुछ मांगता है कभी मन के भीतर से भी तो इसका हर तरह से ख्याल रखना केवल मेरी हीं जिम्मेदारी है "
तो राधा रानी ( श्री महाराज जी ) से नहीं रहा जाता , वो दौड़ कर उसके पास चली आती है और चुप चाप उसके सभी कष्ट को हर लेती है एवं जो नहीं है उसके पास उसे देती है तथा जो है उसकी रक्षा करती है । फिजिकल भी, ( मैटेरियल सामान भी ) और आध्यात्मिक दोनों आभावों को वो पुरा करती रहती हैं , यानि योगक्षेम वहन करती है चुपचाप ।
लेकिन जो जीव श्री राधा रानी , श्री महाराज जी के अलावा अन्य के मतों को भी मानता है , दुसरे का भी जयकार करता है उसके तरफ से वो विल्कूल उदासीन हो जाते हैं और देखते तक भी नहीं ।
अरे संसार में भी जब आपके डौक्टर को यह पता चल जाता है कि आप उसका बतलाया दवा के साथ साथ दुसरे डौक्टर के वतलाय दवा को भी खा रहे हैं , दुसरे से भी इलाज करा रहे हैं तो वो नाराज़ होकर कहता है कि आपका ठीक नहीं हो सकता है कभी इस प्रकार मेरा भी नाम खराव होगा आपका इलाज करके ।
तो , या तो आप उसी से जाकर अपना ईलाज कराओ , या केवल मेरी बात मानो । नहीं तो मैं आपका इलाज नहीं करूंगा ।
तो इस प्रकार संसार में एक डौक्टर भी अनन्यता चाहता है कि जब तक उसके इलाज में हो केवल उसकी बात मानों , धैर्य के साथ उसके बतलाए दवा का हीं सेवन करो तब जाकर लाभ होगा ।
तो जब संसार में ऐसी बातें हैं तो वो तो अवढ़र दानी है , भगवान है ।
वृंदावन में गोपियां दुसरे बाबा जी को देख कर यहां तक कि ब्रह्मा विष्णु शंकर को देख कर भी घुंघट कर लेती थी ।
यह लीला वृंदावन का हमें अनन्यता के सिद्धांतों का पाठ पढ़ाने के लिए ही हैं ।
श्री राधे :- श्री गुरूदेव के सिद्धांतो के आधार पर मेरा लेख , संजीव कुमार
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