Thursday, 20 July 2023

भक्त वहीं है जो भगवान से भगवान की भक्ति के अलावा कुछ न मांगे ।

भक्त वहीं है जो भगवान से भगवान की भक्ति के अलावा कुछ न मांगे । 
गुरू से गुरू कि भक्ति तथा प्रेम के अलावा कभी कुछ नहीं मांगना चाहिए, नहीं तो ठगा जाएंगे । 
हमें अर्जुन कि तरह बुद्धिमान होना चाहिए। अर्जुन ने विकट परिस्थितियों में भी भगवान से भगवान को हीं मांगा था । उसने न धन मांगा , न सेना मांगा, न आयु मांगा , न शक्ति मांगा । अर्जुन ने तो भगवान से भगवान को हीं मांगा था । 
जहां हरि गुरू हैं वहां विजय है , वहीं सुख है तथा परमानंद है । 
संसारिक सुख का अंतत्वोगत्वा प्रतिफल दुख हीं है । संसार में जिस वस्तू में , बिषय में या व्यक्ति से जितना सुख प्राप्त हुआ जान परता है उसमें अंतत्वोगत्वा उससे भी अधिक दुख है जो हरेक को मिलना तय है एक समय के बाद । संसारिक सुख घटते घटते उसी मात्रा के दुख में परिवर्तित हो जाता है अवस्य एक दिन । और हमें तो सास्वत् सुख तथा आनंद ही चाहिए , एक भी जीव संसार में ऐसा नहीं जो कभी भी दुख चाहता हो ।

हरिगुरू स्वयं आनंद है ये दोनों आनंद का ऐसा भंडार जिसे जितना पाओ उतना ही बढ़ता जाता है । ये धन कभी न समाप्त होने वाला है और न घटने वाला है । इसे तो जितना खर्च करो उसका सौ गुणा बढ़ने वाला धन है । 

भगवान और गुरू आनंद स्वरूप है , प्रकाश स्वरूप है , उनसे उनको मांग लेने का मतलव ही है आगे के तमाम जीवन तथा जन्मों का सभी कष्ट दुखों का सदा के लिए समन हो जाना । जब प्रकाश मिल जाएगा तो तमाम अंधियारा अपने आप भाग ही जाएगा , स्वाभाविक है । 

अत: हम यह क्यों कहे हरि गुरू से कि हमारा कष्ट दुर कर दो, दुख दूर कर दो ? हमें तो सिर्फ यह कहना है कि हे प्रभु हमें तो तुम ही चाहिए, तेरे सिवा और कुछ नहीं चाहिए। 

अत: हमें मांगने में अर्जुन के तरह बुद्धिमान होने कि आवश्यकता है । हमारे गुरूदेव ने हमारी आंखें खोली है । इसलिए इस मामले में हमें सदा होशियार रहना है । 
श्री राधे ।

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