उत्तर :- संसार के हम जैसे पापी पतित लोगों को इस बात का ज्ञान देने के लिए कि
:- श्री कृष्ण हवै: परमो देवता:
ऐ दुनिया के प्रत्येक मनुष्यों जरा देख लो भगवान श्री कृष्ण और कोई नहीं परम पिता परमेश्वर है । समस्त देवी देवताओं का अधिपति हीं नहीं समस्त संसार उनमें समाया हुआ है । उनसे ही समुचे अनंत कोटी ब्रह्मांड का अस्तित्व है ।
उनका विस्तार अनंत हैं, इतना अनंत कि कोई किसी भी साधन से उनके इस विस्तार स्वरूप को न जान सकता है और न देख सकता है । काल भी जिसके विस्तार को देख कर भयभीत हो जाए । भय भी जिसको देख कर थर थर कांपे । वो श्री कृष्ण व्रज में यशोदा के छड़ी से डर रहे हैं । ऊखली में बांध दिय जा रहे हैं , गोपियां जिसको अपने इशारे पर नचाती हैं । ग्वाल बाल जिसे घोड़ा बना कर उसकी सवारी करते हैं । वो श्री कृष्ण और कोई नहीं इस सृष्टि का जन्म दाता , पालक तथा नियामक और संहारक है ।
इनके विराट स्वरूप को देखने के लिए श्री कृष्ण के बराबर ही पावरफुल आंखें ( दिव्य दृष्टि) चाहिए, उनके शरीर से निकल रहे विराट ध्वनि को सुनने के लिए श्री कृष्ण के जैसे ही पावरफुल कान चाहिए ।
आने वाले समय में जीवों को यह ज्ञात हो मेरे माध्यम से कि श्री कृष्ण हीं परम भगवान है , पुर्ण ब्रह्म पुरूषोत्तम भगवान है ।
मुझे इनके विराट स्वरूप को देखने कि कोई आवश्यकता न थी । क्योंकि मैं तो जानता था और मुझे सदा से दृढ़ विश्वास था और है कि श्री कृष्ण ही भगवान है , अनंत शक्तियों के स्वामी हैं , अनंत ज्ञान के स्वामी हैं । अनंत सूर्य का प्रकाशक है ।
हे विश्व के जीवों मैंने तो तुमको जनाने के लिए इनसे सत्तरह अध्याय तक परिप्रश्न किया ताकि तुम सभी जान लो तत्वज्ञान ।
यूं तो तत्वज्ञान ही काफी होना चाहिए श्रद्धावान जीवों के लिए जो हरि गुरू से मिलता है , अपने ईष्ट , अपने स्वामी को जानने के लिए , पहचानने के लिए कि वो कौन है ? और तुम कौन हो ? यह ब्रह्मांड क्या है ? फिर भी हे कलयुग के जीवों , तुम सब इतने पतित होंगे कि केवल तत्वज्ञान से तुममे़ से 99.9% को विश्वास हीं नहीं होगा कि श्री कृष्ण सचमुच में भगवान है ! यह शंका होगी , इसलिए मैंने इनको अपना विराट स्वरूप को देखने के लिए इनसे दिव्य दृष्टि मांगी ।
अन्यथा एक भक्त जिसको गुरू के द्वारा दिए गए तत्वज्ञान, सिद्धांत ज्ञान पर अटुट श्रद्धा तथा दृढ़ विश्वास होगा उसे भला उनके विराट स्वरूप को देखने कि कोई आवश्यकता नहीं होती है ।
भक्त तो गुरू के एक एक वाणी पर भरोसा करता है, गुरू द्वारा दिया ज्ञान हीं दिव्य दृष्टि है उसके लिए । गुरू के बुद्धि से अपनी बुद्धि जोड़ कर शिष्य सब जान लेता है । प्रमाण कि आवश्यकता तो केवल उसको होती है जो गुरू के द्वारा ज्ञान दिए जाने पर भी पूर्ण भरोसा न करें और कहे कि हमको भी अर्जुन कि तरह दिव्य दृष्टि दो ताकि उनके विराट स्वरूप को देखने के बाद ही विश्वास करूंगा कि वो भगवान है ।
भक्त तो भगवान और गुरू के सौम्य रूप को ही अपने ह्रदय में बसा कर , गुरू द्वारा दिया गया दिव्य ज्ञान ( तत्वज्ञान ) पर दृढ़ विश्वास करके सदा के लिए उनका शरणागत हो कर आनंद में रमन रहने वाला जीव बन जाता है ।
इसलिए भगवद् मार्गी जीव के लिए केवल तत्वज्ञान हीं काफी है , सबसे महत्वपूर्ण है और प्रमुख है। हमेशा भगवान को , गुरू को अपने ह्रदय में महसूस करना हीं 99% भगवद् प्राप्ति है ।
असली भक्त , शरणागत भक्त डाउट नहीं करता की नहीं सब तो आप बता दिए और मैंने मान भी लिया " लेकिन " एक बार अपना स्वरूप दिखा हीं दो जैसे अर्जुन को दिखाया था !
लगा दिया " लेकिन " ।
जब "लेकिन" लगा दिया, इसका मतलव उसे अभी भी डाउट है इसलिए वो अपनी आंखों से दिखाने का प्रमाण मांग रहा है । अत: वो तो संसारी है, घोर नास्तिक, वो शिष्य नहीं है ।
शिष्य को केवल गुरू पर पूर्ण भरोसा , उनके बातों पर दृढ़ विश्वास होता है उसे प्रमाण का दर्शन करने के लिए दिव्य दृष्टि कि कोई आवश्यकता नहीं , कोई डिमांड नहीं । गुरू जो समझे उचित वो करें , न करें , हमें तो एक गुरू सो काम ।
एक श्याम से काम , वो भी उनके ऐसे रूप से जिनके साथ हम खेल सके , जिनका संग कर सकें जिनकी हम सेवा कर सकें ।
उनका वो विराट स्वरूप देखने कि हमें कोई आवश्यकता नहीं है ।
अरे अर्जुन कह रहा है कि मैं डर गया , थर थर कांप रहा था उनके विराट स्वरूप को देख कर , नहीं सहन कर पा रहा था । तो आग्रह किया कि आप अपने मधुर स्वरूप में लौट आइए । हमें तो आपका मधुर स्वरूप हीं अच्छा लगता है ।
जय जय श्री राधे । :- संजीव कुमार ।
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