प्रश्न :- क्या जीव का प्रार्बध केवल कर्म फल को प्रभावित करता है या केवल कर्म को या कर्म तथा फल दोनों को? उदाहरण के साथ उत्तर दें।
उत्तर :- अच्छा प्रार्बध जीव के कर्म में सहयोग करता है , इसी को समय बलवान कहा गया है । खड़ाब प्रारब्ध आने पर जीव का मन विचलित होता है ।
इसी को शास्त्रों ने , संतो ने कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि,
इसी कारण फिर कहा है जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है ।
खड़ाब प्रारब्ध आदमी के मति को खड़ाब कर देता है , जीव भगवान और संत में भी शंका उत्पन्न करता है और कल्याण पथ से विचलित हो जाता है । श्री महाराज जी ने भी कहा है कि खड़ाब प्रारब्ध पहाड़ पर चढ़ने जैसा है , इस समय जीव को विवेक यानि तत्वज्ञान को मजबूती से पकड़ कर मन को समझाना चाहिए और प्रायस जारी रखना चाहिए। अच्छा प्रार्बध आने पर यानि बलवान समय आने पर जीव सही मार्ग पर बड़ी तेजी से बढ़ता है ।
अत: खड़ाब समय आने पर क्रियामाण कर्म प्रभावित होता है और जब कर्म प्रभावित होगा तो फल तो प्रभावित होगा हीं । अत: साबित हुआ कि प्रारब्ध जीव के कर्म के साथ साथ उसके फल को यानि दोनों को प्रभावित करता है । अत: बुरे वक्त में तत्वज्ञान को कस कर पकड़ कर रखना चाहिए। यही तत्वज्ञान विवेक का काम करता है ।
इसलिए संसार में नियति किसी जीव को बुरा फल प्रदान करने के लिए एक खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को निमित्त बनाता है और किसी को अच्छा फल देने के लिए एक अच्छे प्रार्बध वाले जीव को निमित्त बनाता है ।
उदाहरण :- एक जीव का मृत्यू का समय आ गया , नियती ने तय किया उसकी हत्या होगी और हत्या के कारण मृत्यु होनी है ।
यानि मृत्यु फल है उस जीव के लिए ।
अब नियती एक खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को निमित्त बना कर उसकी इह् लीला समाप्त करा कर एक को फल दिया दुसरे को हत्या जैसी जघन्य पाप करवा कर फांसी कि सजा या उम्र कैद कर फल दे दिया ।
दुसरा उदाहरण :- एक जीव का प्रार्बध खड़ाब आया , यानि समय खड़ाब आया , नियती ने तय किया कि उसके पुर्व के गलत कर्म के कारण उसके धन कि हानी होगी फलाने समय में ।
अब नियती ने एक और खड़ाब प्रारब्ध वाले जीव को चुना पहले वाले जीव को फल देने के लिए माध्यम बना लिया ।
दुसरे जीव का बुद्धि भ्रष्ट कर दिया नियती ने और उसने पहले वाले जीव के हीरे का हार चुरा लिया ।
अत: खड़ाब प्रारब्ध ने दुसरे जीव से गलत कर्म करा लिया क्योंकि दुसरे जीव को उसके पुर्व गलत कर्म से उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दिया और उस जीव ने पहले वाले जीव को नूकसान कर दिया । जो नियती ने हीं फल के रूप में उसके भाग्य में पहले से लिख रखा था ।
आगे दुसरे जीव को भी चोरी के कर्म कि सजा फल के रूप आगे किसी और से दिलवा देगी नियती वक्त आने पर ।
अत: खड़ाब प्रारब्ध आए तो जबरदस्ती जीव को भगवान में और अधिक मन लगाना चाहिए।
विधाता के इस रहस्य को जो समझ जाता है वो पाप करने से बच जाता है और जो नहीं समझता वो फंस जाता है ।
अत: जो जीव साक्षात ब्रह्म स्वरूप श्री कृपालु महाप्रभु जी के कृपा के फलस्वरूप उनको अपना गुरू मान कर परम ब्रह्म श्री कृष्ण और राधा रानी को ईष्ट मान कर उनकी साधना करता है उसका कल्याण सुनिश्चित है । यह एक अति भाग्यशाली दिव्य योग तथा कृपा है , बहुत बढ़िया प्रारब्ध का परिणाम है । जीव को ऐसे दिव्य योग को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।
श्री राधे ।
जीव को शास्त्रों और तत्वज्ञान को पढ़ने और रटने कि जगह अपने गुरू पर श्रद्धा और विश्वास करके तत्वज्ञान को समझ कर मस्तिष्क में बैठाने और उसका उपयोग अपने जीवन में जरूर करना चाहिए, तभी लाभ निश्चित है , नहीं तो जीव तत्वज्ञान के बाबजूद भटक सकता है । तवज्ञान जानने और समझ लेने में बहुत अंतर होता है । तत्वज्ञान सुनना कृपा है और समझ कर उपयोग करना गुरू का विशेष कृपा का परिणाम ।
अत: विशेष कृपा के लिए "हमें गुरू कि सेवा और साधना भक्ति करनी पड़ेगी , चाहे इसी जन्म में करें या दस जन्म लगे , करना तो पड़ेगा - श्री महाराज जी कि हीं वाणी है यह ।
तभी जीव अहंकार से मुक्त होकर दिव्य कृपा का अधिकारी बन सकता है और फिर नियती के कर्म और फलबंधन चक्र से सदा के लिए मुक्त हो सकता है, उनको पा सकता है , अन्यथा नहीं ।
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