कट्टरपंथी केवल नास्तिक बिचार धारा का होता है, क्योंकि वो ईश्वर के संविधान का खिलाफत करता है , ईश्वर के कानून को अपने हाथ में लेता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक क्रिमिनल देश के संविधान को न मान कर कानून को अपने हाथ में लेता है।
जो व्यक्ति , समाज ईश्वर का आदर करता है , उनमें पुर्ण रूप से भरोसा ,श्रद्धा और विश्वास रखता है वो किसी भी व्यक्ति के उदंडता का फैसला ईश्वर पर छोड़ देता है । वो उनका कानून अपने हाथ में कभी नहीं लेता है , वो किसी के भी धर्म और ईष्ट तथा संतों के प्रति गलत भाषा का प्रयोग कभी नहीं करता ।
किसी भी धर्म के संतों महापुरुषों, अवतारों के बहुत से व्यवहार अटपटे होते हैं । कोई भी जीव उनके व्यवहारों को ठीक से कभी नहीं समझ सकता , जब तक वो उनको प्राप्त न कर लिया हो ।
अगर कोई भी मनुष्य ये दावा करता है कि वो किसी भी धर्म , मजहब , जाति में जन्म या अवतार लिए संतों , महापुरूषों , ईंष्ट के लीला को , ( उनके अवतार काल में किए संसारिक व्यवहार ) को ठीक ठीक समझ गया है तो भला वो व्यक्ति स्वयं महापुरूष क्यों नहीं बन गया ?
अगर वो बन गया है तो फिर उसके दिल में किसी भी मानव तथा सभी जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधे तक के लिए आदर , प्रेम , करूणा तथा दया का भाव जागृत हो जाना चाहिए स्वत: ।
फिर तो उसमें किसी भी धर्म , समाज , जाति , देश के प्रति किसी भी प्रकार का नफरत , धृणा , द्वेष , ईर्ष्या का भाव या बिचार कभी प्रकट नहीं होना चाहिए स्वाभाविक तौर पर ।
किसी के भी प्रति नफरत , द्वेष , घृणा , ईष्या , दुश्मनी का भाव और कट्टरता यह साबित करता है कि वो व्यक्ति , पुर्णत: नास्तिक है वो अपने अपने धर्म के ईष्ट तथा संतों एवं महापुरुषों के प्रति वफादार तथा जिम्मेदार विल्कूल भी नहीं हैं ।
इसलिए सभी को अपने ह्रदय को टटोलना चाहिए कि क्या ईश्वर इजाजत देते हैं किसी को कि वो किसी के उदंडता का खुद ज़बाब दे और उनके आदेशों तथा बनाऐ गए नियम की अवहेलना करें ?
भगवान राम ने अयोध्यावासियों को कभी यह अधिकार नहीं दिये कि वो उस धोवी को दंडित करे जिन्होंने माता सीता, उनकी धर्म पत्नी पर लांक्षण लगाया, इतना बड़ा अपराध किया ?
भगवान कृष्ण ने भरी सभा में शिषु्पाल से सौ गाली सुनने तक उसे माफ किया और उसके बाद वो स्वयं उसे सजा दिये , जबकि उनके अनेकों अनन्य भक्त भी उस सभा में उपस्थित थे , पर किसी ने भगवान का कानून अपने हाथ में नहीं लिया । क्योंकि वो सभी आस्तिक थे और सर्वसत्ता पर भरोसा करते थे ।
भगवान बुद्ध को अंगुलिमाल ने बहुत भला बुरा बोला , वो मुस्कुराते रहे , उनके कुछ अनुयाई भी उनके साथ थे , किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , क्योंकि उनको भगवान बुद्ध पर पुर्ण भरोसा था कि वो न्याय करेंगे , समर्थ है । और भगवान बुद्ध ने प्रेम से उस अंगुलीमाल डाकू को समझाया , अंगुलीमाल ने उनको पेंड़ में बांध कर अपने परिजनो से पुछने गया , कि बुद्ध जो कह रहे हैं वो क्या सही है । फिर वो आकर बुद्ध के चरणों में गिर गया ।
तुकाराम को नदी से स्नान करके बाहर लौटते समय एक जीव ने बार बार पान का पीक उनके अंगवस्त्र पर फेंका । पर वो हर बार स्नान करते रहे , कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , अंत में वो दुष्ट उनके इस सहनशीलता से प्रभावित होकर उनके चरणों पर गिर कर खुद को सरेंडर कर दिया ।
पैगंबर मुहम्मद साहब पर एक यवन महिला ने कुड़ा फेंक दिया करती थी छत से जब रास्ते से गुजरते थे तब , पर वो मुस्कुरा कर उसे माफ कर देते थे , एक दिन वो बिमार हो गई तो पैगंबर मुहम्मद साहब उसके घर पर गए उसका हाल पुछने और बड़े अदब और प्रेम से पेश आए , उन्होंने भी लोगों में आपसी प्रेम का शिक्षा दिय थे ।
संत रूपगोस्वामी जी ने अपने सबसे प्यारे शिष्य जीव गोस्वामी जी का त्याग कर दिये थे जबकि जीव गोस्वामीजी जी का अपराध इतना था कि एक विद्वान ने जब उनके गुरू रूपगोस्वामी जी के पद् पर टिका टिप्पणी किए थे तो जीव गोस्वामी जी ने उनका विनम्रता से हीं विरोध किया था और उनसे शास्त्र के उपर थोड़ा सा बहस किया तथा उनको अपने गुरू से शास्त्रार्थ करने के लिए आवाहन किए थे ।
ईशा मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया पर वो फिर भी प्रेम का संदेश हीं दिय , शिक्षा दिये लोगों को ।
इस प्रकार हरेक धर्म में , जाति में , समाज में ईश्वर के अवतारों ने , संतों ने , महापुरुषों ने प्रेम कि हीं शिक्षा दिय है । कोई नफरत , ईर्ष्या , द्वेष , घृणा का शिक्षा किसी भी धर्म में नहीं है ।
जो जीव इस बात को नहीं समझते या मानते हैं , अज्ञानी है , शास्त्रों का सही जानकारी नहीं है, अपने ईष्ट को नहीं जानते हैं , भरोसा नहीं है जिनको , वही लोग ईश्वर का कानून अपने हाथ में लेते हैं वो पुर्णत: नास्तिक है , अत: ऐसे भटके हुए लोगों का परित्याग आवश्यक है विश्व शांति के लिए, मानवता के कल्याण के लिए ।:- संजीव कुमार ।
No comments:
Post a Comment