Thursday, 20 July 2023

सीनियर जुनियर का फिलिंग भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है । श्री महाराज जी ने हमें यह आदेश दिया है कि हरेक को सम्मान दो , चाहे कोई उम्र में भी छोटा बड़ा क्यों न हो ।

तीनों दीदी जी से ने भी स्पष्ट रूप से कहिन है कि यह सीनियर जुनियर का फिलिंग भक्ति मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है । 
श्री महाराज जी ने हमें यह आदेश दिया है कि हरेक को सम्मान दो , चाहे कोई उम्र में भी छोटा बड़ा क्यों न हो । 

इसलिए श्री महाराज जी का सिद्धांत है सबकों , भईया तथा दीदी हीं बोलना है वो भी दीनता के साथ , चाहे वो उम्र में हमसे छोटा हीं क्यों न हो । और हम लोग आप लोग‌ सभी लोग इस आदेश को निभाते हैं । 
प्रह्लाद, ध्रूव तो उम्र में छोटा था , इतना छोटा कि उस उम्र का बच्चा इस कलयुग में पहले कक्षा का भी विद्यार्थी नहीं होगा । लेकिन उन्होंने भगवद् प्राप्ति छोटी सी उम्र में ही कर ली । 
तो यह साबित होता है कि भक्ति मार्ग में सीनियर जुनियर का कोई मतलव नहीं । 
एक छोटा बच्चा भी शरणागत होकर गुरू कृपा से एक दिन में वहां पहुंच सकता है या बहुत पहुंचा है , इतिहास गवाह है , जैसे मधुप , जैसे नचिकेता आदि जहां पहुंचना बड़े बड़े के लिए असंभव हो जाता है । तथा भवगद् प्राप्ति तक कर लेता है जीव छोटी सी उम्र में । 

अगर किसी को यह अभिमान हो जाए कि हम तो बहुत दिन श्री महाराज जी के साथ बिताए बचपन से हीं , हमारा उम्र बीत गया उनके साथ रहते और सेवा करते , तो उससे बड़ा नामापराधी कोई नहीं , यह श्री महाराज जी का कहा हुआ है । इसी अहंकार के कारण वो कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है । जहां था वहीं रहता है । 

भक्ति में तो कोई आज भी अभी श्री महाराज जी के चरणों में मन लगा दें , सेंट प्रसेंट शरणागत हो जाए उनका तो वो वहां पहुंच सकता है जहां पहुंचना हमारे लिए मुश्किल है ।‌

दूसरी बात किसी साधक के बाहरी आचरण से हम उसके अंदर कि स्थिति कभी नहीं जान सकते कि वो क्या है, कहां पहुंचा है , क्या पाया है ? इसलिए भी हमें हमेशा सतर्क रहने के लिए श्री महराज जी का आदेश है । 
श्री महाराज जी ने स्वयं कहा है कि महापुरुषों के व्यवहार को देख कर मत यह अनुमान लगाओ कि वो उसकी तरफ देखते हैं , उसके गाल में बहुत प्यार करते हैं , उसके यहां अधिक आते जाते हैं या थे और हमारे यहां नहीं आएं । या हमारी तरफ कभी नहीं देखे तो इसका मतलब वो उस पर अधिक कृपा किए हैं । और हमारे उपर नहीं ।

 महापुरुषों का व्यवहार हमेशा उल्टा होता है। वो देखते हैं किसी और को, और कृपा कर देते हैं दुर गांव और शहर में वैठे ऐसे जीव पर जो वहीं से उनको व्याकूल होकर पुकारता है । वो शरीर से यहां है पर सूक्ष्म रूप में अपने शरणागत के पास तुरंत पहुंच जाते हैं उसके ह्रदय में । 

वो कभी कभी अपने से दुर बैठे शिष्य के तरफ देखते तक नहीं , उसके परीक्षा के लिए कि देखें तो सही इसको इग्नोर करके कि फिर भी इसका प्रेम मेरे प्रति बढ़ता है या मुरझा जाता है ‌। 

वो कहते हैं कि महापुरूष तो देखते हैं इसको और कृपा करते हैं उस पर जिसके तरफ देखते तक नहीं । इसलिए शरणागत को कभी यह नहीं सोंचना चाहिए कि उसके तरफ अधिक देखते हैं और हमारे तरफ नहीं तो वो हमसे प्यार नहीं करते ? 

जिस व्यक्ति को यह फिलिंग या अहंकार हो गया कि मैं श्री महाराज जी का सबसे बड़ा तथा पुराना सेवक तथा नजदीकी रहा हुं , बहुत सेवा किया है , तो वो तो गया उसी क्षण । 
आज से कुछ महीने पहले एक पचपन साल की दीदी थी कोई कानपुर कि वो मुझे भला बुरा इसलिए बोली कि वो श्री महाराज जी के एक ग्रुप में गीता पर लिखा अपना फिलोसॉफी डालना चाहती थी , मैंने मना कर दिया था । वो बहुत फायर हो गई मुझ पर , मुझे बहुत खड़ी खोटी सुनाई , यह बोल के श्री महाराज जी के साथ बचपन से खेली है और श्री महाराज उनके यहां हीं अधिक रहते थे । श्री महाराज जी उनके साथ हीं खेलते थे और उनके माता पिता श्री महाराज जी के लिए सबसे अधिक किए हैं , उनका फेमिली बहुत स्कौलर तथा ऊंचे ऊंचे पदों पर हैं । इसलिए वो मुझे लिखी कि "मैं उनके सामने जीरो हुं । मेरा तो कोई हैसियत नहीं है उस दीदी के परिवार के सामने । जिसे मैं तो स्वीकार दिल से कर लिया कि सचमुच मेरी कोई हैसियत वास्तव में नहीं है । माफी मांग कर अलग हो गया मैं उनसे । 
तब से मैं हैसियत वालों से दुर ही रहना पसंद करता हुं , ऐसे लोगों को हमारे कारण कोई दुख न हो , इसका ध्यान रहता है मुझे हमेशा । बड़े लोगो के सामने हम जैसे लोगों का कोई मोल नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।। क्योंकि यह तो स्वाभाविक है कि हम सम्मान के लायक नहीं है उनके सामने तो भला कोई हमें क्यों सम्मान देगा , देना भी नहीं चाहिए , यह मैं ह्रदय में रियलाईजेशन हमेशा करके रखता हुं । सत्य को स्वीकार करने में देर नहीं करना चाहिए। 
न मेरे पास गला है , न रूप है न ज्ञान , न कोई दैविक गुण है और न कोई संसारिक धन और न दिव्य वस्तू हीं , तो मैं भला अपने निम्न हैसियत को क्यों न स्वीकार कर लूं इमानदारी से ?

खैर हमें स्वयं के भावना को देखना है दुसरा कुछ भी करे , भगवान और श्री महाराज जी सब पर अपना कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं । सब उनके हीं बच्चे हैं । और मां बाप को तो हमारे जैसा गड़बड़ बच्चे की अधिक चिंता रहती है । जो बन गया उनकी कृपा से उस पर उनको अधिक ध्यान देने कि कोई आवश्यकता नहीं परती है । हम लोग तो हर तरीके से गड़बड़ है अंदर से , उनको हमारे उपर अधिक मेहनत करना परता है । काश कि हम उनके लायक जल्दी बन जाते। श्री महाराज जी और राधा रानी का कृपा सदा सबहीं पर । श्री राधे ।।

No comments:

Post a Comment