रफ्ता—रफ्ता यह जमाने का सितम होता है,
एक दिन रोज मेरी उम्र से कम होता है ।
बाग रोता है असीराने—कफस को शायद
दामने—सज्जा—ओ—गुल सुबह को नम होता है।
हजार तरह तखथ्युल ने करवटें बदलीं
कफस—कफस ही रहा, फिर भी आशिया न हुआ
रंगे—निशात देख मगर मुत्मइन न हो,
शायद कि यह भी हो कोई सूरत मलाल की,
गुलशन बहार पर है, हंसो ऐं गुलो हंसों,
जब तक खबर न हो तुम्हे अपने मआल की,
अहसास अब नही है मगर इतना याद है,
शक्लें जुदा—जुदा थीं उरूजो—जवाल की
हुआ अहसास पैदा मेरे दिल में तकें—दुनिया का,
मगर कब, जब कि दुनिया को जरूरत ही न थी मेरी ।।
अर्थ -रफ्ता—रफ्ता यह जमाने का सितम होता है
एक दिन रोज मेरी उम्र से कम होता है
मनुष्य सोचता है कि वो जीवन जी रहा है, लेकिन सच्चाई कुछ और है दोस्तों ; जन्म के साथ ही हम रोज मर रहे हैं। यह प्रक्रिया, जिसे हम जीवन कहते हैं, मृत्यु की प्रक्रिया है। जिस दिन हम जन्मे उसी दिन से हमारा उम्र आहिस्ता आहिस्ता घटना शुरु हो जाता है। रोज एक—एक दिन चुकता जाता, प्रतिपल जीवन क्षीण होता जा रहा है । घट खाली हो रहा है, भर नहीं रहा है। और बूंद—बूंद खाली हो तो सागर भी खाली हो जाता है। और हम तो केवल गागर हैं।
बाग रोता है असीराने—कफस को शायद
दामने—सज्जा—ओ—गुल सुबह को नम होता है।
असीराने- कफस मतलव -पिंजड़ों में बंद कैदी , यह दुनिया भगवान का बनाया हुआ जेल खाना है । पिंजड़ों में बंद पक्षी तो हमारे आंखों से दिखाई देता है — पर आदमी भी कैद है एक अदृश्य पिंजड़े में , हम आंखों से पिंजड़ों में बंद दिखाई नहीं पड़ते; क्योंकि हमारे पिंजड़े सूक्ष्म हैं, अदृश्य हैं। अत: हम भी बंद है। हम भी कैदी है।
और इसलिए शायद बगीचा भी हमारे लिए रोता है, इसिलिए रोज सुबह बाग में फूलों के, पत्तियों के कोर—किनारे गीले होते हैं। लेकिन हमें होश नहीं, हम दौड़े चले जाते हैं अपनी बेहोशी में। हम वही किए चले जाते हैं जो हमने कल किया था, परसों किया था, जो हमने पिछले जन्मों में अनंत बार किया है। बस खाना पीना मौज मस्ती करना हर मानव जन्म , इसे ही जिंदगी समझ लिया है ।
हजार तरह तखथ्युल ने करवटें बदलीं
कफस—कफस ही रहा, फिर भी आशिया न हुआ
कैद तो कैद ही रहेगी, घर नहीं बन सकती। मनुष्य की कल्पनाएं कितनी ही करवटें बदलें— और यही हमने किया है जन्मों—जन्मों में। शरीरे बदली , चौरासी लाख प्रकार के शरीर में घुम रहे हैं हम । कभी यह थे तो वह होना चाहा, कभी वह थे तो यह होना चाहा— ऐसे हमने चौरासी लाख योनियों में यात्रा की है। कल्पनाओं की करवटें हैं, और कुछ भी नहीं।
गरीब अमीर होना चाहता है और अमीर सोचता है, और अमीर बनें तब सुख मिलेगा ! शथ्या है सुंदर तो क्या होगा और भी महंगा विस्तर चाहिए, तब नींद आएगी , भवन है सुंदर तो क्या हो गया इसमें सुख नही , भवन और बढ़िया चाहिए — इसी चक्कर में नींद तो खो गई है! भोजन है स्वादिष्ट तो क्या करूं, भूख तो खो गई है! जो जहां है वहीं अतृप्त है। जिनके पास धन है उनकी चिंता का अंत नहीं। और जिनके पास धन नहीं है उनकी एक ही चिंता है कि धन कैसे हो। जिनके पास है वे डरे हैं कि कहीं खो न जाए, जिनके पास नहीं है वे पीड़ित हैं कि कब होगा,? जिनके पास है वे चाहते हैं कि और हो। तृप्ति कहीं भी नहीं है। आपा— धापी है, असंतोष है, अतृप्ति है।
ये सब हमारे पिंजड़े हैं जिनमें हम बंद हैं। ये अदृश्य हैं पिंजड़े। इसलिए हम चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं; फिर भी हम पिंजड़ों में बंद हैं। ठीक से समझो तो शरीर भी पिंजड़ा है, मन भी पिंजड़ा है। शरीर है हड्डी—मांस—मज्जा से बना पिंजड़ा । बेचारी आत्मा तो कैद है ।।
रंगे—निशात देख मगर मुत्मइन न हो,
शायद कि यह भी हो कोई सूरत मलाल की ।।
यानि - जब जीवन में चारों तरफ उल्लास, उत्सव, तमाशे—शहनाइयां बज रही हो , बांसुरिया बज रही हों, खुशी के गीत गाए जा रहे हों नाच हो रहे हों । तो देखो सब, मगर आश्वस्त मत हो जाना, मुत्मइन मत हो जाना मनुष्यों , यह मान मत लेना कि यह सब सच है!
गुलशन बहार पर है, हंसो ऐं गुलो हंसों,
जब तक खबर न हो तुम्हे अपने मआल की,
यानि जब तक तुम्हें अपने भविष्य का कुछ पता नहीं है, हंस लो। देर नहीं है पतझड़ के आने में। सुबह खिला फूल सांझ गिर जाएगा। जो पत्ता अभी हरा है, जल्दी ही पीला पड़ जाएगा। जो अभी ऐसा गरूर से भरा था, जो अभी ऐसा मगरूर था, हवाओं से जूझता था, कि सूरज की किरणों से टक्कर लेने की सामर्थ्य समझता था, कि पक्षियों के गीत के साथ नाच रहा था— उसे पता भी नहीं कि सूरज ढल भी न पाएगा और जिंदगी ढल जाएगी! सुबह जो खिला था वह सांझ मुरझा जाएगा।
हकीकत तो यह है कि हरेक संसारिक सुख में बहुत बड़ा भयानक दुख छुपा होता है , इसलिए अपने जीवन में आस्वस्त न हो जाना ।
इसलिए यह भी हो कोई सूरत मआल की यानि दुख कि ।
अहसास अब नही है मगर इतना याद है,
शक्लें जुदा—जुदा थीं उरूजो—जवाल की ।।
यानि हमेंशा खयाल रहे कि विधाता का यह भी एक तरीका है , ढंग है इंसान को परखने का । इसलिए जब सुख आए तो उछलो मत ।( ऊरूजओ-जवाल) यानि संसारिक सुख - दुख कि शक्ले अलग अलग होती है अतः संसारिक सुख भी एक दुख ही है उसी का रूप है । इसमें धोखा मत खाओ ।
राजा दशरथ ने राम को पुत्र रूप में प्राप्त करके बहुत उत्सव मनाया , पुत्र सुख को पाकर आश्वस्त हो गए लेकिन यह सुख गंभीर दूख का कारण बनने में देर न लगाया । विचारे पुत्र शोक में ही अपार दुख में दम तौर दिया ।
संसार के हरेक सुख में आने वाले दुख का संकेत होता है पर हम नहीं समझे और सुख आने पर उछलने लगते हैं , दिखावा करते हैं । जो स्थित प्रज्ञ है वहीं सुखी है ।
हुआ अहसास पैदा मेरे दिल में तकें—दुनिया का,
मगर कब, जब कि दुनिया को जरूरत ही न थी मेरी ।।
ए मनुष्य अगर हमारी उपर वाली सभी बात तेरे समझ में फिर भी नहीं आई तो फिर वक्त तो जरूर तुमको समझा देगा , इस बात का एहसास करा देगा जब बुढ़ापा आएगा उस समय अफसोस करोगे , लोगों के व्यवहार को देखोगे , अपने ही परिवार के लोगों का व्यवहार देखोगे अपने प्रति , नजारा बदला बदला रहेगा । लोग तेरे पास बैठने से भी कतराएंगे । उस समय तुम सोचोगे और अफसोस करोगे की जिस जिंदगी के लिए धन कमाने में हमने पुरा उम्र खपा दिया , रिस्तों को जोड़ने में हमने पुरा उम्र गवां दिया , हीरा जन्म जैसा अनमोल समुचा मानव जीवन गवां दिया अब उसकी जरूरत इस दुनियां को नहीं रही ।
और जब इस बात का अहसास होगा तब तक चड़िया खेत चुग चुकी होगी । तुम गोविंद को भजने लायक भी नहीं रहोगे । मन शरीर और मानसिक संताप में डूब चुकी होगी ।
इसलिए अभी से समय रहते भज गोविंदम भजगोविंदम , भज गोविंदम मुढ़मते ।।
श्री राधे :- संजीव कुमार
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