सन्यासियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए संक्षिप्त लेख ।
सन्यासियों के प्रकार :-
नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार कूल छः प्रकार के सन्यासी होते हैं जो निम्नलिखित हैं -
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साधारण सन्यासी कुटिचक होते हैं जो मंत्रादि की साधना भी करते है लेकिन मन भगवान में ही स्थित यानि ध्यान मग्न होतें है यानि अधिकतर समय साधना में लगाते हैं । ये शिखा और यज्ञोपवीत ( सूत्र) भी धारण करतें है त्रिदण्ड, कमण्डलु , कौपीन ( लंगोटी ) और कन्था ( कथरी ) धारण करतें है । झोली और पात्र भी रखतें है। ये मिट्टी खोदने वाला खनती भी अपने पास रखते हैं। ये पराविज्ञानी नहीं होते अर्थात अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठ नहीं होते। ये श्वेत ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाते हैं।
ये गुरु के अलावा माता पिता की भी सेवा कर सकते हैं।
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बहुदक सन्यासी - जनेऊ, चोटी( शिखा ), दण्ड कमण्डलु लंगोटी, और कथरी के अलावा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं।ये उत्तम सज्जन लोगों से ही आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं । एक ग्रास उतना ही होता है जो शान्ति से मुख में रखकर चबा सकें न कि बड़ा कौर। ये अपने मन को भगवान में ध्यानस्थ कर कठिन साधना करते हैं
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हंस :- ये जब चाहे मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में चले जाएं और पूर्ण जागृत अवस्था में भी भगवान में मन को स्थित रख कर संसार में कर्मयोग करते हैं , ये भिक्षु किसी गांव में एक रात , नगर में पाँच रात और तीर्थ क्षेत्र में अधिक से अधिक सात रात निवास कर सकते हैं वे अपने आपमें ही मगन रहते हैं और स्वागत सत्कार से दूर रहते हैं। ये जटा जूट धारण करते हैं। ये एक जगह अड़के नहीं बैठते इनको भोजन या आश्रम की सुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता। नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार ये मधुकरी ( भिक्षा) से ही शरीर का पोषण करते हैं।
ये तीनों यानि कुटिचक , बहुदक तथा हंस क्रमशः घासफूस के आश्रम वाले होते हैं प्रायः गृहस्थ जीवन काटकर फिर वानप्रस्थ स्वीकार करते हैं तदोपरान्त ही अपनी अवस्था के अनुसार कुटिचक या बहुदक अथवा हंस हो पाते हैं।
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परम हंस :- ये हर क्षण मानसिक स्तर पर भगवान के ध्यान में स्थित होते हैं और शारिरिक और से शिखा और यज्ञोपवीत धारण नहीं करते ये मात्र 5 घरों से अन्न पाकर एक ही बार पाते हैं दूसरे समय नहीं पाते। ये बांस का दण्ड पास में रखते हैं। ये सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण करते हैं यही इनका वस्त्र है पर ये दिगम्बर हो भी सकते हैं नहीं भी तो एक लंगोटी और एक चादर अपने शरीर पर ओढ़ कर भी रख सकते हैं। परम हंस नामक संन्यासी वृक्ष के मूल अथवा श्मशान में रहते हैं। यज्ञशाला, नदीतट, गड्ढा, झोंपड़ी में भी रह सकते हैं।
इनको लाभ या अलाभ से कोई संबंध नहीं होता। इनको कोई स्वर्ण भी दे तो उसे मिट्टी या नाशवान समझकर स्वीकार नहीं करते । इनको शुद्ध द्वैत या अशुद्ध द्वैत से कोई भी मतलब नहीं होता ये पूर्णतः आत्माराम होते हैं ये ब्रह्म से अभिन्न होते हैं किसी भी नियम या कर्मकांड आदि से इनको कुछ भी संबध नहीं होता ये सदा ब्रह्मानंद से युक्त होते हैं। ये चाहे चाण्डाल के घर प्राण त्याग करें या काशी या मथुरा में ये मुक्त ही होने से परम निर्वाण को ही पाते हैं।
जड़भरत , श्वेतकेतु व शुकदेव लीलावश परमहंस हैं।और ये सभी वर्णों से भिक्षा ले सकते हैं इनको ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं दिखता स्वयं भी सर्वमय भी। मात्र देह के लिए ही ये किसी से भी भिक्षा ले सकते हैं।
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तुरीयातीत सन्यासी - यह कभी किसी से कुछ भी नहीं मांगते। यदि स्वेच्छापूर्वक कोई दे दे तो ग्रहण कर सकतें है अथवा ये देह के लिए मात्र तीन घरों से अन्नाहार मांग भी सकते हैं पर धन , वस्त्र और वस्तु नहीं मांगते। यह नग्न होते हैं। और हर क्षण भीतर से , मानसिक स्तर पर साधना में निमग्न रहते हैं ।
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अवधूत सन्यासी - ये अजगर वृत्ति से जीवित रहते हैं ये बंधन को मिथ्या मानते हैं इनके अनुसार तुमको किसी ने बंधन में नहीं डाला तुम तो मुक्त ही हो अपने अज्ञान के कारण ही तुम मुक्ति चाहते हो वास्तव में जो मुक्त है उसे किस प्रकार की मुक्ति चाहिए बस अज्ञान का नाश कर ले यही मुक्ति है। ये मंत्र और उपासना से रहित सोऽहम् भाव में ( इससे भी अतीत) स्थित होते हैं । :- नारद परिव्राजक उपनिषद । ( संजीव कुमार )
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