अध्यात्मिक गुरु हमारे अध्यात्मिक चेतना के स्तर, चरित्र को, सोंच को इतना ऊचा उठा देता है कि व्यक्ति हर तरफ , हर वस्तु मे , हर व्यक्ति मे ईश्वर को महसुस करता है, उसके ह्रदय मे हर किसी के लिय दिव्य प्रेम और करुणा का भाव उतर जाता है. सारे दोष दुर हो जाते है. ईर्श्या द्वेश , घृणा, क्रोध , लोभ , अपना , पराया , तेरा मेरा का भाव दोष समाप्त हो जाता है. दिव्य गुरु संसारिक वस्तु या संसारिक वस्तु के लिय आशिर्वाद नही देते , और न संसारिक वस्तु मांगना उचित है.
संसारिक वस्तु जैसे - धन , मकान , दुकान , व्यापार नौकरी आदि को पाने कि योग्यता दिलाने , दक्षता , निपुनता दिलाने का काम तो संसारिक शिक्षक का है. उसमे भी एकेडमिक शिक्षा हासिल करने को लिय समय सीमा की आवश्यक्ता है, वर्णा स्कुल कौलेज मे एडमिशन नही होता. संसारिक शिक्षको का काम भी केवल हमको दक्ष बनाना , स्किल तैयार करना ही है . ये शिक्षक भी किसी को व्यापार नही करा सकता, नौकरी नही दिलवा सकता है वे तो केवल ज्ञान दे सकता है. दक्ष बना सकता है. अर्थ के लिय प्रयास, मेहनत, श्रम खुद को करना परता है.
इसलिय संसारी शिक्षक केवल योग्यता प्रदान करता है वो भी जो जीतना ध्यान देकर पढ़ेगा वह उतना दक्ष होगा, निपुन होगा.
किन्तु कोई भी संसारिक शिक्षक या ज्ञानी , कमाय हुय धन से सुख प्राप्त होगा कि नही , इसका लेस मात्र भी उपाय नही बताता या गारंटी नही देता,
इसलिय आज कितनो के पास इतना धन है कि उसको पता ही नही है. प्रन्तु उसके पास सुख, आनन्द विल्कुल नही है, वो तो दुसरे के सामने सुखी दिखने का नाटक करता है दिखावा करता है ताकी लोग उसका सम्मान करे , उसके हुजुरी मे खड़ा रहे. उसके अहम का तुष्टि हो.
इसलिय वास्तविक सुख का उपाय केवल सर्व समर्थ दिव्य अध्यात्मिक गुरु के पास हीं है.
जब किसी व्यक्ति को हरि कृपा से दिव्य गुरु मिलता है और व्यक्ति पुरी निष्ठा से उनके वताए मार्ग पर चलता है तो उसको फकिरी मे भी परम आनन्द का अनुभव होता है जैसा बहुतो को हुआ है (जैसे विवेकानंद आदि . इतिहास भरे परे है ऐसे महान लोगों के कहानियों से,)
क्योकि अध्यात्मिक गुरु दिव्य ज्ञान, दिव्य शक्ति प्रदान कर देते है , किन्तु इसके लिय अपने गुरु पर पुरा विश्वास, पुर्ण समर्पण , पुरी निष्ठा और अक्षरस उनके आदेशो का पालन करना नितातं आवश्यक है वर्णा जितनी मात्रा मे वो पालन करेगा उतनी ही मात्रा मे उसको उतना ही अनुभव होगा.
मैने अपने एम वी ए [ SIBM] के एक फैकेल्टी से पढ़ा था कि - " सेना मे जब किसी का सैलेक्सन होता है तब उसका ट्रेनिगं होता है और ट्रेनिंग के दौरान उसके पुराने आदतो को, सोंच को पहले तोड़ा जाता है , जिसमे उस व्यक्ति को शुरु शुरु मे अति कष्ट होता है क्योकि वह अपने स्टुडेन्ट लाइफ मे आरामतलभी होता है बिना डिसीप्लिन के होता है , और उसका सोच भी (९९% का) देश सेवा की नही होकर केवल पद प्रतिष्ठा , नौकरी और धन प्राप्त करने की होती है जिसको लेकर वह सेना मे भर्ती होता है , प्रन्तु वहां जाकर ऐसा ट्रेनिगं होता है कि उसके अंदर देश सेवा प्रार्थमिक हो जाता है या युँ कहु की देश सेवा ही केवल उद्धेश्य रह जाता है , वाँकी की लालसा वह भुल जाता है या छोड़ देता है या यु कहे की धन , पद, प्रतिष्ठा की चाह समाप्त हो जाती है या सेकेण्डरी हो जाता है और देश पर मर मिटने की इक्छा सर्बोपरि हो जाता है. इसिलिए तो सैनिक देश के लिय शहिद हो जाते हैं उनको पद, धन परिवार की चिन्ता समाप्त हो जाती है , यह सब तो उसको मिलता ही मिलता रहता है , यह देश का कानुन है कि मरने के बाद भी शहिदो को सम्मान , अर्थ इज्जत , सोहरत , परम वीर चक्र सब मिले .
अत: सैनिको के इस ट्रेनिगं पद्धती का नाम है " unfreezing and refreezing,
इस ट्रेनिगं मे युवा के पुराने गलत संस्कारो को तोड़ा जाता है unfreez किया जाता है जिसमे बहुत तकलिफ होता है पर ट्रेनिगं देने बाले को दया नही करके ट्रेनिगं देना परता है नही तो पुराने संस्कार ,आदते नही टुटेगें और जबतक पुराने संस्कार , आदत सोंच नही टुटेगे तबतक नए नही समाहीत होगें ,अत: नए संसकार को समाहीत करने के प्रोसेस को refreezing कहते है . इस ट्रेनिगं मे बहुत कष्ट होता है , कइयक तो ट्रेनिगं छोड़ कर भाग जाता है फिर से और अवारा वन कर धुमता है समाज मे.
उसी प्रकार दिव्य गुरु अपने शिष्य के पुराने , गलत ज्ञान , गलत आदत , गलत संस्कार को तोड़ता है , जिसमे व्यक्ति को कष्ट का अनुभव होता है क्योकि वह संसार मे इतना आसक्त होता है कि वह इसी को अपना सर्वस्व मानता है. जबकी वह न तो सच्चा हितैषी खुद का होता है न देश का न समाज का न बाल बच्चे का और न परिवार का , उसे तो केवल सच्चा हितैषी होने का भ्रम मात्र होता रहता है. जो सबसे बड़ा दोष है भ्रम है.
अत: हमे अगर अध्यात्मिक मार्ग मे कष्ट मिले तो समझ लो कि हमारा unfreezing हो रहा है और तुम्हारा गुरु दिव्य ज्ञान रुपी हथौड़ी से तुम्हारे गलत संस्कारो को तोड़ रहे है और अब refreezing होने ही वाला है जिससे हमे, उस सैनिक की तरह ( जो देश प्रेमी हो गया ट्रेनिगं के बाद) हरिप्रेम मिलने वाला है और जिसको हरिप्रेम मिल गया तो दोनो दुनिया की सारी खुशी भी उसको मिल जाएगी , देश के कानुन की तरह और उससे बड़ा हरि का कानुन है , जिसका निर्माता हरि और दातार गुरु है .
यही तो हुआ था भक्त ध्रुव के साथ , वह वालक गया तो था तपस्या करने पिता से भी बड़े राज्य पाने के लिय किन्तु जब उसका unfreezing and refreezing हुआ तो वह संसार न मांग कर हरि से हरि को मांग बैठा और हरि को पा गया , साथ मे हरि आदेश को प्राप्त कर १००००० बर्ष शासन किया और विन चाहे विन मांगे वो मिल गया (हरि प्रेम) जो सोचा भी नही था , क्योकि यह हरि गुरु का कानुन है इश्वर का कानुन है कि उसको जो गुरु का प्रेम पा लेता है वह सब कुछ पा जाता है मांगने की लालसा नही रहती .
No comments:
Post a Comment