तीसरा प्रश्न :- हम संसार में क्यों भेजे गए हैं ? मानव जीवन का असली उद्देश्य क्या है ?
उत्तर - मानव जीवन का असली उद्देश्य आनंद की प्राप्ति हैं । यह आनंद भगवान को , उनके प्रेम को प्राप्त किए बिना हांसील नहीं हो सकता ।
हम दुनियां में कर्म करने के लिए भेजे गए हैं। मनुष्य मात्र एक कर्म योनि है और साथ साथ भोग योनि भी हैं। लेकिन मनुष्य कर्मप्रधान योनि हैं। हमारा कर्म शरीर को स्वस्थ रखते हुए ईश्वर, यानि भगवद् प्रेम प्राप्ति के लिए होना चाहिए।
शरीर का सुख वास्तविक सुख नहीं है। हम शरीर नहीं हैं। हम आत्मा है। यह शरीर मनुष्य को मिला है परमात्मा के प्रेम को प्राप्त करने के लिए।
यह शरीर नश्वर है, एक कपड़े की तरह है। जो बदलता रहता है। शरीर के माता पिता एक शरीर हीं है जो बदलते रहतें हैं हर जनम। पर हमारे वास्तविक माता पिता भगवान श्री कृष्ण हैं।
केवल और केवल वही हमारे साश्वत और सनातन माता पिता, भ्राता, सखा, आदि सबकुछ हैं।
हम भुल जातें हैं कि हम आत्मा हैं, हम शरीर को हीं 'मैं' मान लेतें हैं जो एक बड़ा धोखा है।
इस संसार में हमें शरीर मिला है इसका सदुपयोग करके भगवान को पाना, सगुन साकार श्री कृष्ण से साक्षात मिलन हीं हर जीव का अंतिम और आखरी लक्ष्य है।
पर हम खुद को एक शरीर मान कर तमाम मानव जीवन गमा देतें हैं भोग और विलाश में, जो गलत हैं।
शरीर एक साधन है भगवान श्रीकृष्ण को पाने के लिए, लेकिन हम भौतिक सुख को हीं सुख मान कर जीतें हैं और दु:ख पाते हैं।
प्रत्येक जीव आनंद हीं चाहता है लेकिन हम आनंद संसार की बस्तुओं में, भौतिक बस्तुओं की प्राप्ति और उपभोग में ढुंढतें रहते हैं और अंत में दु:ख हीं पातें हैं।
इसलिए आज तमाम लोग जो शिखर पर हैं वो भी अंतत्वोगत्वा दु:खी हैं।
क्योंकि वास्तविक सुख क्या है यह जाना हीं नहीं हैं।
वास्तविक सुख आत्मा का सुख है। आत्मा का सुख परमात्मा की प्राप्ति में हैं।
वास्तविक सुख वह होता है जो प्रति क्षण बढ़ता जाए कभी समाप्त ना हो, नित नित बढ़ता जाए सुख अनंत काल तक, अनंत मात्रा का सुख वही सुख वास्तविक सुख हैं।
यह सुख संसार में नहीं हैं। यह आध्यात्मिक सुख हीं वास्तविक सुख है।
संसार का सुख प्रतिक्षण घटमान हैं, समाप्त होने वाला फिर अंत में दुख देने वाला हैं।
उदाहरण- एक व्यक्ति को रसगुल्ला बहुत पसंद हैं, कई दिनों से वह रसगुल्ला नहीं खाया, अब उसको रसगुल्ला खिलाइए।
पहले रसगुल्ले में उसे बहुत सुख मिलेगा, दुसरे में उससे कम, अब एक समय ऐसा आएगा की उसे रसगुल्ला जबरदस्ती खिलाऐंगें तो वो मारने दौड़ेगा।
कहां गया सुख? इस लिए संसार के किसी बस्तु में सुख नहीं हैं और ना हीं दु:ख है।
संसारी सुख और दु:ख हमारे अज्ञानी दिमाग और मन का भाव है, भ्रम है , धोखा है ।
किंन्तु आत्मा का सुख वास्तविक सुख है।
और वह है ईश्वर की प्राप्ति। यह सुख हीं मानव जीवन का लक्ष्य या उद्देश्य हैं।
संसार से प्रेम करोगे दु:ख पाओगे हीं। अत: श्री हरि, श्री कृष्ण से प्रेम करोगे तो अनंत मात्रा का सुख पाओगे।
जैसे इसी कलयुग में तमाम महापुरूषों ने पाया है। सगुण साकार भगवान को देखा है, छुआ है, उनसे बातें की हैं। उनका आलिंगन किया है और आज भी हमारे भारत में ऐसे वास्तविक संत और महापुरूष हैं जो उनको देखतें हैं सुनतें हैं।
इसी कलयुग में तुलसी, सूर, मीरा, नरहरि, कबीर, रै दास, रवि दास, कालीदास, विवेकानंद, तुकाराम, नरसी मेहता, विद्यापति आदि भक्त हुए हैं जिन्होने सगुन साकार भगवान को अपनी आंखों से देखा हैं अंगुली से छुआ हैं उनका दर्शन किया और अनंत मात्रा का वास्तविक सुख को पाया है। और हमारे देश में अभी तक पांच मूल जगद्गुरू हुए हैं वो तो स्वयं और कोई नहीं , श्री हरि हीं हैं , जैसे हमारे गुरूदेव , ' श्री महाप्रभु कृपालु " जो पंचम मूल जगद्गुरू उत्तमई हैं स्वयं श्रीराधाकृष्ण के युगल अवतार हैं ।
भगवान सत् चित् आनंद , सच्चिदानंद हैं। यहीं सत्चित्आनंद की प्राप्ति वास्तविक सुख है। लेकिन हम मनुष्य अपने शरीर को मैं मान कर व्यर्थ मानव शरीर गमा देतें हैं और दु:ख के भागी बनतें हैं।
श्री राधे।:- संजीव कुमार ।
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