उत्तर - जो जीव को संसार देता है वो गुरू है, और जो संसार छिन कर ( यानी संसार से आसक्ति खत्म कर ) भगवद् प्रेम देता है , हरि उन्मुख कराता है । माया से मुक्त करवाता है वो सदगुरू हैं ।
डिटेल्स :- गुरू वो कहलाते हैं जो भौतिक शिक्षा अपने शिष्यों को देकर संसारिक पदार्थ प्राप्त करने में सहायता करतें हैं । तो माया में आसक्त जीव माया की प्राप्ती के लिए गुरू से ज्ञान हासिल करते हैं । आजकल के विद्धान शिक्षक हीं गुरू हैं । यह माया संबंधित , माया की प्राप्ती करने के लिए माईक शिक्षा देतें हैं ।
जैसे डाक्टर , इंजिनियर , मजिस्ट्रेट , व्यापारी बनने की शिक्षा देने वाले गुरू कहलाते हैं , यह कर्मबंधन की शिक्षा प्रदान करातें हैं । ए गुरू स्वयं माया में आसक्त होते हैं ।
किन्त सद्गुरू वो होते हैं जो स्वयं भगवद् प्राप्त होते हैं माया से परे होते हैं , माया से सदा से अनासक्त होतें हैं । भगवान के प्रेम को प्राप्त किए होते हैं । भगवान का साक्षात दर्शन किए होते हैं । समस्त माईक विकारों जैसे काम , क्रोध , मत ,मातषर्य , ईर्ष्या ,द्वेष , लोभ आदि से मुक्त होतें हैं । भगवदिए ज्ञान का भंडार होतें हैं , भगवान और उनके प्रेम में विभोर होतें हैं । अपने भगवदिए स्वरूप शक्ति में लीन होते हुए , शरणागत जीव को अपनी कृपा से माया से अनासक्त कराकर , संसार से अनासक्त कराकर श्री हरि ओर उन्मुख करातें हैं ।
बहिर्मुख जीव यानी संसार में आसक्त जीव को भगवान और उनके अनंत प्रेम प्राप्त करने का साधन बताकर साधना करवातें हैं , बहिर्मुख जीव यानी भगवान के तरफ पीठ किए जीव जो संसार की ओर उन्मुख है को भगवान की ओर उन्मुख कराते हैं ।
संसार में आसक्त किसी जीव पर जब श्री हरि की कृपा होती है तो जीव को सद्गुरू मिलतें हैं । और जीव जैसे जैसे अपने सद्गुरू पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास करने लगता है तैसे तैसे सर्व समर्थ सदगुरू जो साक्षात भगवद् प्राप्त है, यानी खुद भगवान का स्वरूपशक्ति हैं जीव पर करूणा लुटाते़ हैं , जीव की रक्षा करतें हैं , अपने शरणागत जीव का योगक्षेम बहन करतें हैं और संसार से आसक्ति समाप्त करवाकर जीव को श्रीहरि से मिलवा देते हैं ।
जीव जब माया से विमुख होकर सद्गुरू की कृपा बल से श्री हरि की ओर उन्मुख होता है वैसे हीं प्रारंभीक अवस्था में माया ( काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि माईक राक्षस ) जीव पर हावी होने लगती है । माया का यही अटैक भगवद् प्राप्ती के रास्ते में होने वाला कष्ठ कहलाता है ।
माया यह सोचती है कि यह हमें छोड़ कर भगवान की तरफ जा रहा हैं इसलिए माया अपने माईक गुणों के स्वभावगत जीव की परीक्षा लेनी शुरू कर देती है ।
लेकिन जो जीव सद्गुरू के कृपा बल से इस परीक्षा में पास करते जाता है वो एक दिन माया से परे होकर श्री हरि उन्मुख हो जाता है और परमानंद की प्राप्ती कर आनंदमय हो जाता है ।
अत: भगवद् क्षेत्र में उन्मुख जीव जो सद्गुरू को प्राप्त कर लिया है को आने वाले माईक कष्ट से घबराना नहीं चाहिए । इस समय हरि गुरू पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखकर अपने गुरू का शरणवरण करना चाहिए ।
सदगुरू सब संभाल लेते हैं और जीव माया से उतीर्ण हो जाता है । क्योंकि ऐसे शरणागत जीव का योगक्षेम स्वयं भगवद् अनंत , सर्वभगवदिए गुणों से परिपूर्ण और विभुषित सर्व समर्थ सद्गुरूदेव वहन करतें हैं ।
हमारे कृपालु महाप्रभु ऐसे हीं समस्त भगवदिए शक्तियों से युक्त सद्गुरू हैं ।
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