उत्तर - बाघ ( एक हिंसक जानवर ) एक भोग योनि हैं
उसे कर्म करने की स्वतंत्रता नहीं हैं , उसे संकल्प करने की स्वतंत्रता नहीं हैं , हिंसा उसकी स्वभाविक वृति है पेट भरने के लिए , जब वह भुखा रहता है तभी जीव की हत्या करता है अपने निहित सहज बुद्धि से ।
वह केवल भोग भोगता है , इसलिए भगवान उसके किसी कर्म को नोट नहीं करतें हैं । और जब नोट नहीं करतें हैं तो फल देने का सवाल हीं नहीं हैं । भगवान मनुष्य को छोड़ कर अन्य किसी भी जीव के कर्मों को नोट नहीं करतें , यहां तक कि देवता ( यानि इंद्र, वरूण , कूबेर आदि) का भी नहीं । देवता भी एक भोग योनि हीं है ।
लेकिन एक मनुष्य जो की कर्म प्रधान योनी है । भगवान ने केवल मनुष्य योनि को कर्म करने की स्वतंत्रता और शक्ति प्रदान किए हैं । मनुष्य किसी कर्म का संकल्प करने , डिसिजन लेने में स्वतंत्र है । और उस कर्म को करने में भी स्वतंत्र है , भगवान इंटरफेयर नहीं करते हैं ।
लेकिन फल पाने में स्वतंत्र नहीं हैं । इसलिए भगवान मनुष्य के हर संकल्पों को नोट करतें हैं और उसी का फल प्रदान करतें हैं । इसलिए एक मनुष्य जब किसी भी जीव का नुक़सान करता है तो भगवान उसके इस कर्म को नोट करतें हैं और उसी के अनुसार फल देतें हैं ।
अपवाद - भगवान हरि-गुरू के शरणागत जीव के किसी कर्म को नोट नहीं करतें हैं , वो अपने शरणागत जीव को अपने लोक में अपना पार्षद बना लेतें है । जैसे अर्जून आदि ने भगवान के शरणागत होकर लाखों मडर किए , भगवान उसे नोट नहीं किए और उसे अपना पार्षद बना कर अपना लोक दे दिए । श्री राधे ।
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