उत्तर - मनुष्य एक भोग योनि के साथ साथ कर्मप्रधान योनि हैं ।
ईश्वर ने कृपा करके हमें मानव शरीर दिया है और इस शरीर द्वारा हमें कर्म करने कि स्वतंत्रता प्रदान की है । हम पुरूषार्थ करके अपने खड़ाब प्रारब्ध के तीव्रता को कम कर सकतें हैं और अपने नए प्रारब्ध का निर्माण भी करतें रहतें हैं ।
हमारे अनंत जीवन के संचित कर्मों के फलों का एक हिस्सा हमारा प्रारब्ध कहलाता है । साथ साथ क्रियामान कर्म भी हमारे साथ हैं ।
अत: हमारे खड़ाब तथा अच्छे प्रारब्ध एवं इस जन्म का क्रियामान कर्म का मिक्सचर हीं हमें हमारे इस जीवन के भौतिक सुख के साथ साथ आध्यात्मिक सुख को भी प्रभावित करता है ।
भौतिक सुख ,लौकिक जगत का सुख और दुख हमारे अपने कर्मों का हीं फल है ।
आध्यात्मिक सुख लाभ के लिए स्वस्थ मानव शरीर परमावश्यक है। नहीं तो हम भक्ति ठीक से नहीं कर पाएंगें ।
जब हमारा खड़ाब प्रारब्ध आता है तो जीवन काफी संघर्ष मय हो जाता है ।
अत: संसारिक सुख या अनुकूल परिस्थिति जब भी हो तो हमें उच्छृंखल नहीं होना चाहिए , संयमित रहना चाहिए, इस अनुकूल समय में , सुख के समय हमें संयमित होकर हरिगुरू का ध्यान , मनन , स्मरण जरूर करना चाहिए ।
हरि गुरू हीं हमारे है और उनका सुख हीं हमारा सुख है यह हमेशा ध्यान होना चाहिए ।
और जब भी विपरित परिस्थितियां आए तो हमें धैर्य से काम लेना चाहिए , विचलित नहीं होना चाहिए । ऐसे समय में भी हरिगुरू को अपना संरक्षक मानकर हमें हर हाल में हरि गुरू पर अटूट श्रध्दा और विश्वास करके अपने खड़ाब प्रारब्ध को , प्रतिकूल समय को धैर्य के साथ काटना चाहिए ।
अत: लौकिक सुख दु:ख , में अनुकूल या प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में हमें संयमित और धैर्यवान होकर हरिगुरू में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखकर जीवन जीना चाहिए । अच्छा समय और बुरा समय हमारे अपने प्रारब्ध और क्रियामान कर्म का फल हैं । और दोनों समय स्थाई नहीं हैं ।
अत: खड़ाब प्रारब्ध जब भी आय तो बिना विचलित हुए हमें अपने क्रियामान कर्म को अच्छा रखना चाहिए ।
जिससे यह समय भी निकल जाऐगा ।
और अच्छा समय आय तो दैविय गुणों को , अध्यात्मिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए । संयमित होकर हरिगुरू का ध्यान करते हुए हर हाल में अच्छे सोंच के साथ अच्छे कर्म करना चाहिए । अहंकार विल्कूल नहीं करना चाहिए । जिससे प्रतिकूल समय की तीव्रता विल्कूल कम हो जाती है या टल भी जाती है, ए पक्का है ।
"दु:ख में सुमिरन सब करे ,। सुख में करे न कोई ।
ज्यो सुख में सुमिरन करे , तो दु:ख काहे को होई ।।"
किसी से झूठ बोलना , गलत काम करना , किसी से ईश्या , द्वेश करना , किसी को तकलिफें देना , बुरा सोचना, गलत कर्म हीं खड़ाब प्रारब्ध के साथ मिलकर जीवन में कठीन और प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण करती है ।
अत: हमें गलत कर्म नहीं करना चाहिए , अच्छे कर्मों से खड़ाब प्रारब्ध की तीव्रता काफी कम हो जाती है ।
और सबसे अच्छा कर्म है हरिगुरू की शरणागति , उनकी सेवा , उनका चिंतन और मनन के साथ साथ हम अपना संसारिक कर्म करतें रहे़ं। गलत काम कभी ना करें ।
घबराय नहीं । अनुकूल और प्रतिकूल, दोनों परिस्थितियां हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाते हैं ।
एक अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण के लिए अच्छे कर्म आवश्यक हैं , हरिगुरू पर अटूट श्रद्धा और पूर्ण विश्वास आवस्यक है । :- संजीव कुमार ।
श्री राधे ।
श्री राधे ।
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