Thursday, 25 March 2021

तेरहवा प्रश्न - माया बद्ध देवी देवता माया से परे भगवान के लोक में कैसे प्रवेश कर पाते हैं ?

तेरहवा प्रश्न - माया बद्ध देवी देवता माया से परे भगवान के लोक में कैसे प्रवेश कर पाते हैं ? 
उत्तर - स्वर्ग के देवी देवता माया बद्ध होते हुए भी भगवान से मिल लेते हैं , साक्षात उनका दर्शन और वार्तालाप कर लेते हैं , उनसे अपने स्वर्ग लोक की रक्षा के लिए सहायता प्राप्त कर पाते हैं । विरजा नदी पार कर वैकुंठ लोक, भगवान के लोक में जाकर भगवान और श्री विष्णु ,‌शंकर जी आदि से मिल पातें हैं -
पहला कारण - स्वर्ग के देवताओं का शरीर सूक्ष्म है और दिव्य हैं , उनके शरीर में मनुष्यों के शरीर के तरह विकार , दुर्गंध आदि नहीं है। मनुष्य का शरीर पंचभूत का बना है। मनुष्य के शरीर मे़ं कफ-पित-वात , अस्थि, मज्जा, हार , मांस और दुर्गंधयुक्त है । मनुष्य का यह शरीर तो स्वर्ग में प्रवेश के लायक भी नहीं है भगवान के लोक जाने का प्रश्न हीं नहीं उठता है । 
लेकिन देवताओं के शरीर में ये सारे दोष नहीं है , उनका शरीर दिव्य है , सूक्ष्म है , उनके शरीर से दिव्य सुगंधी निकलता रहता है । 

नंम्बर दो और महत्त्वपूर्ण कारण - देवताओं के पास बहुत हीं अधिक मात्रा में उनके संचित पुण्य का भंडार है । और उनके पुण्य बल का तेज है । उनका शरीर तेजमयो हैं , प्रकाशमयों है ,‌दिव्य है । वे प्रकाश के गति से कहीं भी आजा सकतें हैं। ये विशेषाधिकार उनके अपने पुण्य के बल पर उनको मिला है । 

अत: स्वर्ग के देवी देवता अपने अत्याधिक पुण्य और तेज के वल पर विरजा नदी पार करके भगवान व वैकुंठ लोकादी में भ्रमण करते हैं , किसी विशेष कार्य हेतु भगवान के लोक जाकर उनसे मिलते हैं अपनी रक्षा आदि के लिए ।
लेकिन जितनी वार वो अपने पुण्य के तेज के बल से भगवान के लोक जाकर या कहीं भी भगवान का आवाहन कर मिलतें हैं तो हरवार उनके पुण्य का तेज उतनी हीं अधिक मात्रा में समाप्त होते जातें है । खत्म होतें जातें हैं । क्षीण होते जातें हैं ।

देवता अपने दिव्य शरीर , दिव्य इंद्रीयादी,‌ दिव्य ज्ञान, बुद्धि एवं अपने निज सर्वाधिक पुण्य के वल पर भगवान को उनके वास्तविक स्वरूप में देख पातें हैं , बातें कर पातें हैं , उनसे दिव्यास्त्रादी प्राप्त कर पाते हैं , उनके धाम में जा पातें हैं ।
लेकिन वो भगवद् प्रेम प्राप्त नहीं कर पाते क्योकिं वो मनुष्य के तरह कर्म करने का अधिकारी नहीं हैं,‌ देवता एक भोग योनि हैं जो अपने पुण्य के वल से स्वर्ग के सुख को भोगते हैं और जिस दिन उनके सारे पुण्य क्षीण हो जातें हैं तो पुण्य के अत्यंताभाव के कारण अन्य योनि में भेज दिए जातें हैं , उन्हे स्वर्ग से गिरने के बाद मनुष्य का शरीर भी नहीं मिलता । इसलिए स्वर्ग को पाना महान मूर्खता है , और यही कारण है कि स्वर्ग की कामना , भुक्ति की कामना एक महान भुल है । 
 वो देवता हम मनुष्यों के जैसे भक्ति नहीं कर सकते हैं , क्योंकि शरीर है हिं नहीं उनके पास , इसलिए भगवान के प्रेम में या विरह में आंसु नहीं बहा पातें , भगवान के प्रति प्रेम भाव जागृत नहीं कर पाते , और तद्नुसार भगवान भी उनको वो सर्वदुर्लभ अपना निजी धन -भगवद् प्रेम नहीं दे पाते हैं जो मनुष्य के लिए सर्वसुलभ है, मनुष्य भक्ति कर उनसे प्रेम का भीख मांग लेते हैं ,‌लेकिन देवता ऐसा नहीं कर सकते ।
इसलिए हमे भगवान की निष्काम भक्ति करने का पाठ हमारे प्यारे गुरूदेव श्री महाराज जी ने सुझाएं हैं , और निष्काम भक्ति करने का आदेश दिए हैं । 
- पूज्यनियां मां । श्री राधे

1 comment:

  1. Phir vo Bhagwan ki stuti karte hain toh kya voh karma ya bhakti nahin mani jati?

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