एक संगोष्ठी में मुझसे पुछे गए प्रश्नो का मेरा उत्तर।
प्रश्न - आधुनिकता के साथ अपराध क्यों बढ़ रहा हैं ?
उत्तर - आधुनिक समय में लोग, केवल भौतिक विकास का हीं पक्षधर होते जा रहें हैं । हम लोग खुद को आत्मा ना मानकर शरीर मानने लगें हैं । भगवान पर विश्वास धीरे धीरे समाप्त हो रहा हैं, लोग उच्छृंखल हो रहें हैं इस लिए अपराध बढ़ रहा है ।
आध्यात्मिक विकास आधार है भौतिक विकास का , लेकिन लोग आध्यात्म से दुर हो रहें हैं धीरे धीरे और भौतिक समृद्धि को ही सफलता का प्रतिक मानने लगे हैं । इसलिए किसी भी उपाय से धन कमाना है और भौतिक सामान इकट्ठा करना चाहते हैं । उनको लगता है कि सुख और आनंद भौतिक संसाधनों में हीं है । इसलिए अपराध करने में भी नहीं हिचकिचाते ।
उदाहरण - चाकु भौतिक विकास का परिचायक है तो उसका सही उपयोग अध्यात्मिक विकास का प्रतिफल है ।
अब एक आध्यात्मिक व्यक्ति जो आत्मा और परमात्मा में विश्वास करता है वो चाकु से सब्जी काटेगा । निर्माणकारी काम करेगा । वहीं अध्यात्म से दूर व्यक्ति चाकु का इस्तेमाल कत्ल , लुट , मार , डकैती के लिए करता हैं ।
अत: आध्यात्म से दूर व्यक्ति अपराध के तरफ बढ़ता हैं और अपने भौतिक समृद्धि का दुरुपयोग करके अपराध करता रहता है ।
कुछ लोग, अध्यात्म के आर में भी गलत काम कर रहें हैं , हकिकत यह है कि वो अध्यात्मिक हैं नहीं । वो अध्यात्म को स्वीकार करना तो दुर , अध्यात्म क्या है यह जानतें तक नहीं । लोग पुजा पाठ , मंदीर मस्जिद ,चर्च गुरूद्वारा गंगा स्नान , तिरथ आदि करने वाले को आध्यात्मिक मानते हैं ।
संक्षिप्त और सरल परिभाषा है अध्यात्मिकता का :-
जो लोग खुद को आत्मा मानतें हैं , शरीर नहीं , और साथ साथ यह पक्का रियलाइज करतें हैं कि भगवान हमारे अंदर बैठे हैं हमारे साथ ,वही अध्यात्मिक हैं ।
वह अपराध कभी नहीं करेगा ।
लेकिन जो इस भौतिक शरीर को हीं "मैं " मानता हैं वो दरअसल केवल भौतिकबादि होता है और वह अपराध हीं करेगा ।अपराध छोड़कर कुछ कर हीं नहीं सकता ।
अपनी आत्मा और अपने अंशी भगवान , जीव एवं माया का शासक परमात्मा पर पक्का विश्वास हीं अध्यात्मिक होना हैं ।
जिसमें करूणा , त्याग , दया , क्षमा , दान ( चाहे धन का है , ज्ञान का हो या श्रम का दान हो दुसरे के हित के लिए ) न्याय आदि दैविक गुण है वहीं आध्यात्मिक है ।
इसके उलट जिसके मन में ईष्या , द्वेष , घृणा , पक्षपात , छल, कपट , काम, क्रोध आदि माइक दुर्गुणें है तथा जिसको वास्तविक संतो , महापुरूषों पर भी आस्था और विश्वास नहीं है ऐसा जीव कभी आध्यात्मिक हो ही नहीं सकता । चाहे बड़ा से बड़ा यज्ञ या धर्म कर्म करलें ।
श्री राधे ।
:-संजीव कुमार ।
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