Monday, 24 May 2021

हमारा जीवन = हमारा लक्ष्य = हमारा कर्म एक सफल इंसान वो होता है जो दुसरों के लिए जिता है

हमारा जीवन = हमारा लक्ष्य = हमारा कर्म 
एक सफल इंसान वो होता है जो दुसरों के लिए जिता है , जो सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए या केवल अपने परिवार के लिए जिता है, जिविका कमाता है, वो परमस्वार्थी होता है और समाज के लिए बोझ होता है एवं असफल जीवन जीने वाला कहलाता है ।

आत्मविश्वास का संबंध सही सही ज्ञान, अनुभव, विवेक से है। सत्य ज्ञान, अनुभव और विवेक आत्मविश्वास पैदा करता है। अव्यवहारिक ज्ञान अहंकार पैदा करता है ।

क्या हम सवाल करते हैं कि कल सूर्य उदय होगा या नहीं? या क्या हमारे आपके लिए साँस लेने के लिए पर्याप्त हवा उपलब्ध होगी या नहीं ? सुबह होगी या नहीं ?
 क्योंकि हम जानते हैं कि ये चीजें कल इसी तरह ही होंगी, जैसा कि वे आज हैं। ऐसी हीं सत्य का अनुभव हमारे स्वभाव में, हमारी देखभाल करने की क्षमताओं में और हमारे द्वारा की गई सैकड़ों अन्य उधमों के प्रति आत्मविश्वास को पैदा करता है। हम जितनी जागरूकता से जानेंगे समझेंगे अनुभव करेंगें किसी बिषय और बस्तु के बारे में उतना आत्मविश्वास पैदा होगा ।

जब हम सब अपना अपना ध्यान अपने शरीर के उन अंगों पर केंद्रित करतें हैं तो हम यह पातें कि हमारे शरीर का प्रत्येक आंतरिक अंग हमारे जानने या हमारे हस्तक्षेप के बिना हमारे लिए कैसे लगातार काम करती रहती है।

 ध्यान से देखें कि श्वसन क्रिया अपने आप से कैसे होती रहती है, हमारी पलके बिना हमारी आज्ञा के कैसे झपकती रहती हैं, हमारा हृदय कैसे अनायास रक्त प्रवाह को बनाए रखता है लगातार ? हमारे चाहे बिना, हमारा शारिरिक प्रक्रिया हमारी देखभाल करती रहती है। चाहे वह खरोंच हो, हमारे शरीर पर , एक कट, एक फोड़ा या फ्रैक्चर हो क्यूं न हो जाए , ध्यान दें कि एक उच्च प्रणाली भगवान का चमत्कार कैसी होती है जो ठीक ठीक काम करती है रहती है जो हमारे हित में आवश्यक कार्रवाई के साथ हमारे शरीर के प्रत्येक अंग को स्वत: कैसे ठीक करती है रहती है । किंतु हम उसमें गलत खान पान , बिचार‌ व्यवहार , सोच से उसमें हीं नहीं वल्कि प्रकृति के कार्य में भी व्यवधान पैदा करते रहते हैं । 

आत्म विश्वास विकसित करने के लिए, हमें भरोसा करने की आवश्यकता है ईश्वर पे , श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरू पे और खुद पे । भरोसा रखें कि हम ठीक होंगे चाहे कैसी भी बाधा हो । फिर हम जीतते हैं । हम खुश हैं, या अवसाद की गहराईयों में हैं। हम सुर्खियों में हैं, या अंधेरे अकेलेपन में हैं। अगर हम जानते हैं कि हम ठीक होंगे तो हम ठीक होते हीं है हमेशा । बस हमें पूर्ण भरोसा करना होगा भगवान पर व अपने सद्गुरू पर, पूर्ण विश्वास करना होगा ।
हमें अपने सुबिधा जनक परिधि से बाहर आने से नहीं डरना होगा । 
जिंदगी की सफलता और सुख , सांसारिक पद् प्रतिष्ठा , पद्वी , पोजिशन , सत्ता और केवल अत्यधिक पैसा कमाने का नाम नहीं है ।
हम अपना लक्ष्य कैसा चुनते हैं इस पर निर्भर करता है ।
धन दौलत की अत्यधिक चाहत और इस चिजों के लिए अगर हम अपना सेहत खो दें और समाज से, देश से सिर्फ और सिर्फ लेने का लक्ष्य को लेकर काम करतें हैं तो हम सफल नहीं घोर स्वार्थी कहलाऐंगें ।
समाज से , देश से हमें उतना हीं लेना चाहिए जितना जीने के लिए जरूरी हैं । 
हमें समाज को , देश को कुछ देने का लक्ष्य भी बना कर काम करना चाहिए । हमारे संविधान में पहले हमारा देश के प्रति मौलिक कर्तव्यों का निरूपण है और आज्ञा है और उसके उपरांत मौलिक अधिकारों का । 
पर दुख इस बात का है कि हम सभी हर जगह केवल अपने अधिकारों के प्रति सचेत होते हैं अपने कर्तव्यों को भुल जातें हैं । 

केवल लेने की सोचना असफलता का मुख्य कारण ह
 हैं । हमें लेने से ज्यादा देने की सोचना और करने की लक्ष्य लेकर चलना होगा , वर्णा समाज , देश समझ जाएगा कि हम सिर्फ स्वार्थी हैं ,‌एवं एक दिन की हम बोझ समझे जाऐंगें , और इस प्रकार हम एक न एक दिन त्याग दिए जाऐंगें । यह त्याग कि प्रक्रिया सबसे पहले अपने पति या पत्नी , फिर बच्चे , फिर समाज और फिर देश के द्वारा की जाती है ।
फिर जीवन में सबकुछ होते हुए हमारा जीवन बोझ लगेगा । निराशा होगी , असफल जीवन लेकर दुनियां से रूखसत होना हम अपने नसीब में खुद लिखेंगें ।

इसलिए दान करना चाहिए , दान केवल धन का हीं नहीं होता , 
दान , श्रम का , तन का , ज्ञान का , बुद्धि का , महत्वपूर्ण होता है । 
जैसे गरीब बच्चों को पढ़ाना , एडल्ट एजूकेशन , समाज में अच्छी चींजों के लिए जागरूकता पैदा करना , सड़क , मुहल्ले आदि के साफ सफाई के लिए काम करना , अन्य जीवों के हितों के लिए काम करना , 
पेंड़ पौधे लगाने का काम , प्रकृति की रक्षा के लिए काम , बेजुवान जानवरों के हित के लिए काम , अनाथ बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य आदि , कुछ भी हम चुन सकतें हैं ।
मेरा आज का लेख - संजीव कुमार 
श्री राधे।।

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