आज का हालात त्रेता युग के उस काल से जिसमें भगवान को रावण बद्ध करना पड़ा और द्वापर के अंतिम काल से भी काफी नीचे गिर गया है , दूषित हो गया है जिसमें रावन जैसा पंडित , ज्ञानी भी भगवान राम के उपदेशों को नहीं समझ सका , और दुर्योधन और उनके पिता धृतराष्ट्र को भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं समझाया ,शांति प्रस्ताव लेकर गए स्वयं भगवान ।
जरा सोचिए की स्वयं भगवान शांती संदेश लेकर गए , और दुर्योधन के धृष्टता पर अपना चक्र दिखा कर , तमाम सभा में अपने मुल स्वरूप का एक झलक भी दिखाया , ताकी शांती संदेश का प्रस्ताव स्वीकार हो डर के मारे भी और युद्ध टल जाए पर कोई प्रभाव नहीं हुआ । और अंत में एक युद्ध का विकल्प हीं बचा दोनों काल में ।
आज उससे भी बदतर स्थिति है ।
सनातन धर्म में वेद में इसलिए साम , दाम , दंड, भेद का भी विधान है ।
सनातन पहले तो शांति पसंद करता है । नहीं मानने पर दाम से शांती कायम करना चाहता है । फिर भी नहीं तो भेद , विभेद द्वारा विरोधी को खंडित करके शांती स्थापित करता है और फिर भी नहीं समझा तो फिर धर्मयुद्ध द्वारा दुष्टों को दंड देने का विधान है ।
अतः अब आजकल जो दुष्ट लोग , देश , समाज शांती का पाठ नहीं समझता और उस पर साम ,दाम एवं भेद का भी कोई असर नहीं होता है , उसको धर्मयुद्ध द्वारा दंड देने का अंतिम विकल्प हीं शेष बचता है ।
:- जय जय जय श्री राम ।
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