आप सभी को भगवान बुद्ध जयंती की शुभकामनाएं ।
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भगवान बुद्ध के बारे में जरूरी जानकारी :-
भगवान बु्द्ध , भगवान राम के हीं वंशज थे । वो भगवान राम के पुत्र कुश के वंश में आगे जन्म लिए । यह बहुत कम लोग हीं जानते हैं । इसलिए सारे धर्म की जननी सनातन धर्म हीं है । सारे धार्मिक विचार धारा सनातन धर्म की हीं शाखा है । शाखा का अस्तित्व अपने मुल तना से होता है । और मुल तना का आधार बृक्ष का मुल होता है । डिटेल्स के लिए पढ़ीए :-
श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णुपुराण में हमें शाक्यों की वंशावली के बारे में उल्लेख पढ़ने को मिलता है। कहते हैं कि राम के 2 पुत्रों लव और कुश में से कुश का वंश ही आगे चल पाया। कुश के वंश में ही आगे चलकर शल्य हुए, जो कि कुश की 50वीं पीढ़ी में महाभारत काल में उपस्थित थे। इन्हीं शल्य की लगभग 25वीं पीढ़ी में ही गौतम बुद्ध हुए थे। इसका क्रम इस प्रकार बताया गया है।
शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अंतरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन और फिर सिद्धार्थ हुए, जो आगे चलकर गौतम बुद्ध कहलाए। इन्हीं सिद्धार्थ के पुत्र राहुल थे। राहुल को कहीं-कहीं लांगल लिखा गया है। राहुल के बाद प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। इस तरह का उल्लेख शाक्यवंशी समाज की पुस्तकों में मिलता है। शाक्यवार समाज भी ऐसा ही मानता है।
बुद्ध के प्रमुख गुरु गुरु विश्वामित्र, अलारा, कलम, उद्दाका रामापुत्त थे जबकि बुद्ध के प्रमुख दस शिष्य- आनंद, अनिरुद्ध (अनुरुद्धा), महाकश्यप, रानी खेमा (महिला), महाप्रजापति (महिला), भद्रिका, भृगु, किम्बाल, देवदत्त, और उपाली (नाई) थे। दूसरी ओर बौद्ध धर्म के प्रचारकों में प्रमुख रूप से अंगुलिमाल, मिलिंद (यूनानी सम्राट), सम्राट अशोक, ह्वेन त्सांग, फा श्येन, ई जिंग, हे चो, बोधिसत्व या बोधिधर्मा, विमल मित्र, वैंदा (स्त्री), उपगुप्त (अशोक के गुरु), वज्रबोधि, अश्वघोष, नागार्जुन, चंद्रकीर्ति, मैत्रेयनाथ, आर्य असंग, वसुबंधु, स्थिरमति, दिग्नाग, धर्मकीर्ति, शांतरक्षित, कमलशील, सौत्रांत्रिक, आम्रपाली, संघमित्रा आदि का नाम लिया जाता है।
भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं के आग्रह पर उन्हें वचन दिया था कि मैं 'मैत्रेय' से पुन: जन्म लूंगा। तब से अब तक 2500 साल से अधिक समय बीत गया। कहते हैं कि बुद्ध ने इस बीच कई बार जन्म लेने का प्रयास किया लेकिन कुछ कारण ऐसे बने कि वे जन्म नहीं ले पाए। अंतत: थियोसॉफिकल सोसाइटी ने जे. कृष्णमूर्ति के भीतर उन्हें अवतरित होने के लिए सारे इंतजाम किए थे, लेकिन वह प्रयास भी असफल सिद्ध हुआ। अंतत: ओशो रजनीश ने उन्हें अपने शरीर में अवतरित होने की अनुमति दे दी थी। उस दौरान जोरबा दी बुद्धा नाम से प्रवचन माला ओशो के कही थी । देह छोड़ने के पूर्व बुद्ध के अंतिम वचन थे 'अप्प दिपो भव:...सम्मासती। अपने दीये खुद बनो...स्मरण करो कि तुम भी एक बुद्ध हो।
बुद्ध अनेक हो चुके हैं। वाल्मीकि रामायण में भी बुद्ध का उल्लेख मिलता है, वाल्मीकि जी भगवान राम के समकालिन एक महान ऋषि थे, जिन्होने रामावतार से पहले हीं रामायण लिख दिया था। अत: बुद्धत्व एक दिव्य सिद्धा अवस्था का नाम है जो समय समय पर अनेकों महामानवों में उत्पन्न हुआ।
अंतिम पुर्ण बुद्धत्व सिद्धार्थ में प्रकट हुआ जो भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज हीं थे।
भगवान गौतम बुद्ध का सम्यक दर्शन अवैदिक था । इन्होंने सामयिक परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध दर्शन का प्रतिपादन और प्रचार किया था ।
भगवान गौतम बुद्ध का सम्यक दर्शन अवैदिक था । इन्होंने सामयिक परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध दर्शन का प्रतिपादन और प्रचार किया था ।
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