Tuesday, 18 May 2021

अत्यंत महत्वपूर्ण शब्जेक्ट :- गोपनियम गोपनियम गोपनियम , यह तीन शब्द संतों , शास्त्रों ने , महापुरूषों ने जो कहा है उसका समझ मुझे पुज्यनिया मां से पता चला था ।

अत्यंत महत्वपूर्ण शब्जेक्ट :- 
गोपनियम गोपनियम गोपनियम , यह  शब्द तीन बार  संतों , शास्त्रों ने , महापुरूषों ने जो कहा है उसका समझ मुझे पुज्यनिया मां से पता चला था ।

तो यह गोपनियम गोपनियम गोपनियम शब्द के अर्थ का लोग अनर्थ करके दूसरे को ज्ञान देते लोग मिल जाएंगे की भगवान से संत से अपने प्रेम को छुपाओ ।
हां विल्कूल सही है और विल्कूल छुपाना चाहिए ।
कौन से प्रेम को छुपाना चाहिए लोग यह नहीं समझते । इसलिए यह पोस्ट लिखना परा आज ।

तो अब इसको संसारी उदाहरण देकर समझते हैं । सभी संत संसारिक उदाहरण द्वारा ही समझाते हैं ‌। कारण हम लोग दिव्य शब्दों को तो ना सुन पाएंगें और समझना तो दुर की बात है । 
जैसे नीम के किड़े को गुड़ के स्वाद समझाना मुश्किल है क्योंकि वो गुड़ का स्वाद कभी चखा हीं नहीं तो उसको कैसे समझाया जाए,  तो उस किड़े को उसी के खुद के संसार की बातों का उदाहरण देकर समझाते हैं संत आदि की,  हे नीम के किड़े तुमको जो निंब की निबौरी में जो रस मिलता है उसका हजार गुना ज्यादा रस में उस गुड़ में है,  तो फिर वो कुछ कुछ समझ जाता है ।
इसी प्रकार हम लोगों का हाल है बिना संसारिक उदाहरण के हमको दिव्य ज्ञान , आदेश आदि समझ में नहीं आता है और हम उसका कोई और अर्थ लगा लेतें हैं , और यही कारण है कि इतने सालों साल सुनते रहे संतों का , मुंडी भी हिला दी पर उनके एटोमिक वाक्य का कोई और अर्थ लगा लिए ओर गलतफहमी का खुद शिकार रहे और उसी गलत समझ से दुसरे को भी समझाने का अपराध कर बैठते हैं ।
ना शास्त्र की समझ हुई और ना शास्त्र युक्ति में निपुणता ,यानि उसका व्यावहारिक उपयोग भी नहीं जानते , और फिर गलत जगह सही बात और सही जगह गलत बात इस्तेमाल करते पाए जाते है । जैसे  दुध में नमक और दही में सकक्कड़ मिलाना समझ  लिए । और दही में सकक्कड़ तो स्वाभाविक है स्वास्थ्य के लिए सही नहीं और दुध में नमक का उपयोग  तो पागलपन है हीं ।
तो हम संसारिक उदाहरण से ही समझ सकते हैं क्योंकि हम उसी  नीम के किड़े की तरह है  ।

तो उदाहरण - संसार में पति पत्नी को लेते हैं और उसके बीच प्रेम और और गहरा रूप रति क्रिया को लेतें हैं ।
जिस प्रकार पति पत्नी अपनी रति जो पत्नी पति से और पति पत्नी से जो वार्तालाप करती है रति क्रिया करती है उसको संसार में वो गोपनीय रखती है । उसका प्रदर्शन खुले आम नहीं करती और ना करना चाहिए । 

पर वो अपने पति के प्रति बाहर संसार में  अपशब्द का या ऐसा नहीं है कि वो बाहर बोले कि मैं तो आपको जानती नहीं ।
अरे शब्दों में तो वो अपने पति को सम्मानजनक शब्दों के संबोधन का इस्तेमाल अपने बच्चों के सामने या अपने सास ससुर मित्र के सामने करती ही है । और करना भी चाहिए । नहीं तो परिवार के लोग गलत अर्थ लगा लेगें की इसको अपने पति से पटता नहीं । और फिर सभी परिवार के लोग दुखी रहेगें ।
ठीक उसी प्रकार एकांत साधना में हरि गुरू के प्रति असली प्रेम भाव को छुपाने के लिए गोपनियम का आदेश है शास्त्रों में । 
ना की उनके प्रति सम्मान का भावो शब्दों में प्रकट करने को या छुपाने के लिए कहा गया है ।

हम साधकों को अपने साधना में अनुभव अपने अंतरंग अनुभव को छुपाने के लिए कहा गया है ।
ना की उनके प्रति सम्मान प्रेम , को शब्दों में व्यक्त करने , गाने , उसका प्रचार करने से मना किया गया है ।

सामुहिक किर्तन में भी भाव प्रकट करने का दंभ करना पाप कहा गया है । जैसे दुसरो को दिखाने के लिए जबदस्ती आंसु बहाने का एक्टींग करना , जोड़ जोड़ से अठ्ठास करने का झूठा एक्टिंग , दुसरे को दिखाने के लिए झूठ मुठ के दम साध कर बेहोशी का मूर्क्षा का एक्टिंग करना पाप है ।
अष्ट सात्विक भाव भगवान के श्री चरणों में रति की अतिशयता के परिणामस्वरूप स्वरूप शरीर में हुए दिव्य दिव्य परिवर्तन भावावेश का प्रारूप है । जैसे कंप , प्रकंम , जड़ता , अठ्ठाहस , रोमांच , बेचैनी , आंखों में अनवरत बहता आंसु  अतः इन अष्ट सात्विक भाव को छुपाने का " यदा संभव" कोशिश करने के लिए कहा गया है । पर यह भी जब वास्तविक रूप से कंट्रोल से बाहर हो जाए और व्यक्त हो जाए तो पाप नहीं हैं । 
अब कोई भावावेश में सचमुच मूर्क्षित हो जाए तो यह तो किसी के बस में नहीं है कि वो वेहोश क्यों हो गया  । मुर्छा तो उसके बस की बात नहीं कब हो जाए साधना में , रूम में एकांत साधना में या सामुहिक किर्तन में ?
जिस प्रकार एक पति पत्नी  रति क्रिया छुपाती है उसी प्रकार एक साधक को भगवान से दिव्य रति क्रिया ( शारीरिक नहीं , मानसिक ) में उठे शारीरिक भावावेश एवं अनुभव को छुपाने के लिए गोपनियता का फरमुला बतलाया गया हैं ।
देखिए इसलिए बार बार और हजार बार मैंने लिखा है ।
जबतक वास्तविक रूप में हरि गुरू में श्रद्धा और प्रेम नहीं होगा हमारा । उनके दिय तत्वज्ञान को हमलोग रट लेगे पर समझेगें कभी नहीं है ये मेरा भी चैलेंज है और संतों का तो हैं हि है । 
शास्त्रों के शब्दों को रट लेंना और उसका नकल करके यानि कौपी पेस्ट करके लिख देना , याद करके बोल देना किसी दुसरे को बड़ा आसान है पर उसको समझना पहले फिर व्यवहार में सही सही उतारना फिर अनुभव करना  , यह विरले हीं कर पाते हैं ‌ हम जैसे खुद को समझदार समझने के भ्रम में रहने वाले मुर्ख नहीं । :- संजीव कुमार , रांची ।

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