आज हमारा व्यवहार विरोधी है प्रतिकुल है पर इच्छा अपेक्षा , कामना अनुकूल है । फिर संसारिक दु:ख कैसे ना मिले ?
आज कलयुग के हममें से ज्यादातर जीवों की वास्तविक स्थिति, हमारी कर्तव्य परायणता कैसी है ? पर हमारी इच्छा , अपेक्षा कैसा है ? यह विरोधाभास हीं हमारे संसारिक दु:खों का मूल कारण है।
१.हम गुरू के आदेशों को, सिद्धांतों को नहीं मानतें हैं , या केवल उसी आदेशों व ऊपदेशों को मानेतें हैं , जो हमारे अनुकूल हो , हमारे मन लायक हो , जिसमें हमारी सुविधा हो । किन्तु अपेक्षा है कि गुरू कृपा हम पर पुरा पुरा हो । कैसे संभव है ?
२. हम भगवान का, हरि का सही सही सच्ची भक्ति नहीं करेंगें । केवल जल चढ़ा कर दो-चार अगरवत्ती जला कर धूप दीप दिखा कर अपनी सुविधा के अनुसार चढ़ावा चढ़ाकर और जहां मंदीर, मस्जिद , गुरूद्वारा , गिरिजाघर आदि मिले उसके सामने केवल सर झुका कर , मन को नहीं , केवल तन झुकाकर औपचारिकता पुरा करेंगें । लेकिन जो हम चाहते़ं हैं, इच्छा रखतें हैं वो भगवान , ईश्वर , खुदा , अल्ल्लाह , जीसस पुरा जरूर करें क्योंकि हमारी इच्छा की पूर्ति हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है ! अरे हम भगवान से चारसौबीसी करतें हैं तो वो सबके बापों के बाप है वो आठसौबीसी तो करेंगें हीं हमारे साथ ।
३. हम समाज में परिवार में बड़े बुजुर्गों को , योग्य शिक्षकों को और दुसरे किसी का भी अपमान करें पर हमारी अपेक्षा है कि सभी मेरा सम्मान करें हमेशा !
४. हम मां बाप के छत्र छाया में संरक्षण और साधन पर कमाऊ बन जाने पर, थोड़ा काबिल बन जाने पर अपने माता पिता को ना पुछे , उनको बुढ़ापे में साथ छोड़ दें , उनके लालन पालन ,स्नेह को भुल जाएं पर उनके बशियत पर , संपत्ति पर हमारा हीं पुर्ण अधिकार हो ।
५. हम अपने बड़े भाई को , ताऊ ,चाचा चाची का अपमान करें पर ये लोग हमेशा मेरा सहयोग करें , फेवर करें , हमारा खयाल रखे। हम लक्षुमण ना बने पर मेरा भाई राम जैसा हो । कुछ मां बाप भी पैदा करके छोड़ देतें हैं पर अपेक्षा होती है वेटा राम की तरह हो । बहन सुभद्रा जैसी ना हो पर भाई श्री कृष्ण जैसा चाहती है तो भाई बलदेव जैसा ना हो पर बहन सुभद्रा जैसी हो । हम राम जैसा ना हो पर पत्नी सीता जैसी चाहतें हैं ।
६. हम समाज के लिए कुछ ना करें पर समाज मेरे लिए सबकुछ करें ।
७. हम देश के लिए कोई भी मौलिक कर्तव्य का पालन ना करें लेकिन देश का संविधान में निहित मौलिक अधिकार के अनुसार देश से हमको सबकुछ मिले ।
८. हम जनमानस में नफ़रत का जहर घोलें लेकिन जनमानस हमेशा मेरा सम्मान करें ।
९. हम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उचित पौस्टिक आहार को ना ले और गलत आहार जैसे मांस , मदिरा , शराब , कबाब , जंक फुड , मैदा से बना सामान जैसे पिज्जा , बर्गर , पेस्ट्रीज , नुडल्स , चाऊमीन , खुब तला हुआ मसालेदार चटपटा खुब खाएं पर अपेक्षा है कि हमारा शरीर बीमार ना परे कभी । शरीर हरवक्त हमारे मनोनुकूल चले। खुब मोबाईल कंप्युटर आदि इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स का ग़लत इस्तेमाल करें दिन भर पर आंख हमारी कमजोर ना हो। ऊंचे आवाज में डीजे सुने पटाखा फोड़े पर कान सलामत रहें ! आदि । खुब रफ तरिके से गाड़ी चलावें पर दुर्घटना ना हो कभी ।
१० . हम प्रर्यावरण , प्रकृति का खुब नूकसान करें पर प्रकृति हमारे अनुकूल रहें हमेशा ! हम दुसरे जीव को दु:ख दे , मारे , काटे पर हम उससे सुख की अपेक्षा करतें हैं । क्या यह सही है ?
हमारी यही विरोधाभासी कामना जब पुरा नहीं होता तो हम अत्यधिक दु:खी होतें हैं संसार में । हम जब अपने कर्त्तव्यों के प्रति सचेत ना होकर केवल अपने कामना की पूर्ति की इच्छा करते हैं अधिकार स्वरूप समझते हैं संसारी सुखों को तो भगवान का संविधान कानुन हमें रोग, शोक , संसारिक दु:ख देता है । चाहे आज मिले या कुछ काल बाद । इसमें आश्चर्य कैसा ?
निश्कर्ष :- हम बोतें हैं पेड़ बबूल का और अपेक्षा करतें हैं स्वादिष्ट गुद्देदार आम का , जो कदापी संभव नहीं है ।
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