यह महत्वपूर्ण बात उनकी सहायता के लिए जो असली संतों के वारे में शंका करते हैं , उनको जानने से समझने से पहले अपनी क्षुद्र बुद्धि से बहुत तरह का सवाल खड़ा करते हैं :-
सही संत और वास्तविक महापुरूषों के पास लौकिक परलौकिक दोनों प्रकार का ज्ञान होता है, वो ईश्वर के तरह अन्तर्यामी होते हैं। भगवान की योगमाया शक्ति उनके पास उतना ही है जितना सच्चिदानंद श्री कृष्ण के पास ।
संत व महापुरूष अपने इन शक्ति से कोई चमत्कार नहीं दिखाते कभी , वो तो भगवान से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग जीव कल्याण के लिए करते हैं , जीव को तत्वज्ञान देकर जीव के अनंता अनंत जन्म के मैल से दूषित मन को निर्मल बनाते हैं । पर इसके लिए जीव के मन में संत के प्रति श्रद्वा और विश्वास हो , और इस श्रद्धा और विश्वास की उत्पत्ति उनके संग से सत्संग से होता है । वास्तविक संतो के ह्रदय में पतितो के उद्धार की अधिक चिंता होती है । कारण दयालु स्वभाव के होने के कारण उनसे जीव का दुख नहीं देखा जाता है ।
संसार में भी एक सात्विक मां बाप अपने बिगरैल बच्चे के सुधरने की कामना करती रहती है । भगवान से प्रार्थना करती रहती है , ठीक उसी प्रकार हमारे गुरू को माता सम कहा गया है , वो पतितो के मल को धोकर भगवान के भक्ति के काबिल बनाते हैं ।
पर जो जीव संत के पास जाएं ही नहीं , उनका सत्संग करें ही नहीं ।
उनको और उनके सिद्धांत को ठीक से समझने के बदले अपने अनंत जन्म के दूषित ज्ञान से तरह तरह का सवाल करे पहले , अपनी दुषित बुद्धि से शक करें , अपनी बिगड़े दिमाग से किसी संसारी के लिखे किताब से प्राप्त ज्ञान से संत से बहस करें उनके अनुयायियों से बहस करें तो उसका भला कैसे हो ।
इसलिए नियम है कि संत के पास जाने से पहले अपनी खोपड़ी से पिछला सभी ज्ञान को शून्य मानना होगा । चाहे हम कितने बड़े संसारिक विद्वान हो , शास्त्रों को भले रट लिया है , गलत अर्थ खोपड़ी में डाल लिया है , अहंकार त्याग कर दीन बन कर , पिछला अर्जित सभी ज्ञान शून्य होकर किसी वास्तविक संत के शरण में जाकर पुरे ध्यान से उनको सुनना होगा ।
जब तक हम उनके मुख से उनकी बाणी सुनेंगे नही, उनके प्रवचन के संकलन रूपी पुस्तकों को पुर्ण ध्यान लगा कर , समाहित चित्त से पढ़ेंगे नहीं और जहां नहीं समझ में आए तो उनसे या वो उपलब्ध ना हो तो उनके मूल प्रचारक से समझेंगे नहीं , परिप्रश्न नहीं करेंगें और अपनी खोपड़ियां लगाएंगे तो कल्याण कैसे होगा ?
इसलिए प्रत्येक जीव जो अपना कल्याण चाहता है उनको पहले के सभी ज्ञान वान को , अहंकार को त्याग कर , अपने दिमाग को पिछला सभी ज्ञान से रिक्त करके उनके द्वारा दिया गया तत्वज्ञान सुनना और उनसे ही समझना होगा , तब श्रद्धा और विश्वास दृढ़ होगा उनपर और जब एक बार श्रद्धा और विश्वास ह्रदय में आ गया फिर क्ल्याण पथ पर जीव अग्रसर हो जाता है , फिर आगे का रास्ता स्पष्ट होने लगता है और असली तत्व ज्ञान बड़ी तेजी से संत के कृपा बल से जीव के निर्मल चित्त में ठीक ठीक उतरने लगता है वेतार की तरह , माध्यम की कोई आवश्यक्ता नहीं रहती , जीव का तार अदृश्य रूप से अपने गुरू से जुड़ जाता है सदा के लिए ।
यह तार ऐसा नहीं की आंधी में टूट जाए और फिर जोड़ने का उद्धम करना परे , न न ऐसा नहीं होता , यह तार दिव्य तार होता है, और हां हरिगुरू अपनी कृपा से जीव को तत्वज्ञान समझने कि शक्ति भी दे देते हैं , जीव को बिना संस्कृत पढ़ें संस्कृत के श्लोक समझ में आने लगता है , फिर भाषा का अवरोध नहीं होता है ।
वास्तविक गुरू अपना हाथ किसी के माथे पर नहीं रखते अन्य के जैसे । उनका आशिर्वाद उनके ह्रदय का दिव्य तरंग है जो अपने शिष्य को हमेशा आलोकित करता रहता है , उनके ह्रदय से निकले एक दिव्य उर्जा , एक दिव्य शक्ति हमेशा शिष्य को चारों तरफ से सुरक्षा प्रदान करती रहती है , फिर वो शिष्य कभी भटक नहीं सकता और उस पर कुसंग हावी नहीं हो सकता कभी ।
चाहे वो कितना भी गहरा कुसंग के वातावरण में पर जाएं । गुरू का सुरक्षा चक्र उसकी रक्षा करता रहता है ।
मेरा निज अनुभव है यह ।
मैं बहुत नहीं खोलुंगा ।
शिष्य को ह्रदय में गुरू के ह्रदय से प्राप्त हो रहे दिव्य तरंग अतुलित आनंद का एहसास कराना शुरू कर देता है । पर इसके लिए भीतर से गुरू के प्रति सच्चा अनुराग होना जरूरी है और इसके लिए शुरू शुरू में एकांत साधना की आवश्यकता है । फिर यह साधना हमेशा होती रहती है , चाहे अपना संसारिक कर्म करते रहिए या कहीं भी रहीए । गुरू सतत ह्रदय में विराजमान होतें हैं । यह है राज की बात , अनुभव की बात ।
सुरदास , कबीर , मीरा , रै दास , तुलसी , रामकृष्णपरमहंस , रबीदास , तुकाराम , बिद्यापति आदी उदाहरण हैं , वास्तविक गुरू के पैर परके , इनके चरण शरण से ही तो अनेकों जीव तर गए , और हम जैसे संसारी अधम पतित जीवों का कल्याण तो श्री कृपालु महाप्रभु द्वारा हीं सुनिश्चित हुआ जो स्वयं युगल सरकार है यह कहने कि बात अब नहीं रही , यह अनुभव की बात अब हो गई है ।
. . मैकोले की शिक्षा में दम कहां जो एक मानव को मात्र इंसान बना दे | यह शिक्षा ही तो भारतियों के चरित्र के पतन का कारण है हम लोग तो सच्चे दरवार में जाने के काबिल भी थे ? चाहे वो आज का हाईयर क्वालिफाईड व्यक्ति हीं क्युं नही !
वो तो वास्तविक संत की कृपा है की वो हमलोगों के अनंत जन्मों के अनंत पाप को देखकर भी करुणावश सारे पापों को नज़र अंदाज करके अपनातें हैं भाई ।
उनके कौलेज में हाई मार्क्स की जरूरत नहीं ।
उनके कौलेज में युनिवर्सिटी में तो फेल का ,शून्य नंबर बाले अति विचित्र पतित का पहले एडमिशन हो जाता है ।
पर इसके लिए एक ही योग्यता है एडमिशन के लिए , सर्व अहंकार ज्ञान शून्य , तृण से बढ़ कर दीन और बृक्षों लताओं से बढ़ कर सहिष्णुता ।
फिर वो एडमिशन ले लेते हैं ।
संसारिक बिषय भोगों के ज्ञान की जरुरत ढ़ोगी साधु संन्यासियों को परती है |
और इंसान अज्ञानताबश उसके द्वारा ठगे जाता है | जिस कारण सही संतों के पास भी जाने से हिचकते हैं ।
इसलिए हमें यह सब समझना होगा ।और वास्तविक संत को अपना गुरू स्वीकार करके उनका संग करना होगा ।
अब कोई चकाचौध से प्रभावित होकर किडनी निकाल कर बेचने वाले डाक्टर के अस्पताल में जाकर अपना सबकुछ गवां ले तो सारे सच्चे और चरित्रवान डौक्टर का क्या दोष , सब डौक्टर तो गलत नही है |
ठीक उसी प्रकार सारे संत तो गलत नही होते है न भाई | इसलिए आई क्यू का इस्तेमाल करके सारा पिछला कुड़ा कबाड़ा दूषित ज्ञान जो इधर से उधर से , पढ़ कर दिमाग में इक्ट्ठा किया है उसको त्याग कर असली संत के शरण में जाना होगा । अन्यथा अनंत काल तक दुख भोग ही मिलेगा । चाहे कितना पूजा पाठ , जप तप , हवन , कर्म कांड , तिरथ विरथ , मुख से बजारू भजन लेखक और गायक के साथ किर्तन करते रहें हम ।
जय जय श्री राधे :- आपका संजीव ।
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