Saturday, 8 May 2021

भक्ति से सब शुलभ हैं , अष्टांग योग के बड़े बड़े नियम है ।

ये साधनचतुषट्य , षठ्सम्पत्ति मार्गी, अष्टांगयोगादियों की बात करने वाले इन चीजों को हीं सबसे उपर, अच्छा और महत्त्वपूर्ण बता देतें हैं और भक्ति को इसका एक मात्र अंग, जबकि भक्ति को इन साधनों की आवश्यकता कभी नहीं है  !  ए  क्यों भुल जातें हैं कि इसी कलयुग में भक्ति मार्गी मीरा कब इन सभी का सहारा लिया ??
रविदास , सुरदास , तुलसीदास , कबीरदास, कालिदास , रैदास , हितहरिवंश , श्रीहरिदास ,  तुकाराम , संत ज्ञानेस्वर , सखुबाई , रसखान  , बिद्यापती  आदी ने तो कभी योग तोग , जप , तप , अष्टांगयोगादि का सहारा नहीं लिया । ए  केवल भगवान और संतों  की सीधी सादी एवं सरल भक्ति हीं किए  , अपने गुरू एवं भगवान की शरणागति किया और अपने आंसुओं द्वारा उनको रिझाकर  उनको एवं उनके दिव्यप्रेम रस को प्राप्त किया । 
इसी कलयुग में षठ्गोस्वामीं जैसे सनातन गोस्वामीं , जीव गोस्वामी आदि ने आज से पांच सौ साल पहले कौन से योगादि का सहारा लिया था ? 

भगवान श्रीकृष्ण ने तो स्वयं कहें हैं अंबरीश कांड में  दुर्वासा जी को , कि 
अहं भक्त पराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज ।
साधूभिर्ग्रस्तहृदयों भक्तैर्भक्तजनप्रियः ।।

भावार्थ :- "भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा- दुर्वासा जी से  ! मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है । मेरे सीधे-सादे सरल भक्तजन अपने उदार ह्रदय से विनम्रता पूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, तो मैं स्वतः उनके वशीभूत हो जाता हूँ, और उनसे प्यार करने लगता हूँ, अब वो जो कहें वही होता है, मेरे कहे अनुसार कुछ होता ही नहीं, अत: मैं आपकी मदद नहीं कर सकता ।।"

भगवान‌ ने तो कभी नहीं कहा कि - 
अहं योगी पराधीनो या अहं ज्ञानि पराधिनों  ???

तुलसी दासजी ने भी भक्ति को स्वतंत्र हीं माना है :- 
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ।। ( रामचरितमानस)

त्रेता में भी भक्ति की महारानी शबरी आदि का उदाहरण है जो यहां तक नहीं जानती थीं कि उनमें नवधा भक्ति कुट कुट कर भरी हुई है । यह तो भगवान राम के मिलन के पश्चात्  उनको , नवदा भक्ति उनमें है ऐसा पता चला । 

द्वापर में लाखों गोपियां कब योग तोग का सहारा लिया ??? निष्काम भक्ति कि परमाचार्या गोपियां तो योग , ध्यानादि मार्गी श्री उद्ध्व जी को भी यह सब भुलवाकर भक्ति मार्ग का पथिक बना दिया था । 

यहां तक की प्रथम जगद्गुरु स्वामी श्री शंकराचार्य जी ने भी अंत में सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति किए थे । यह जग जाहिर है ।

कहां तक कहा जाय ! 
श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने भी मां काली की आज्ञानुसार  वृन्दावन धाम जाकर श्रीकृष्ण की भक्ति किए । मां काली ने वृन्दावन में हीं  श्रीकृष्ण का दर्शन करा कर उनको प्रेमाभक्ति प्रदान किए ।
और तो और उन्होने भी अपने शिष्य  विवेकानंद जी ( नरेंद्र) को  वृन्दावन भेज कर श्रीकृष्ण की हीं भक्ति कराकर भगवत् प्रेम रस प्रदान करवाया । 
इसलिए यह साबित है कि बड़े बड़े ज्ञानियों , ध्यानियों को भी सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण की हीं भक्ति और शरणागति करनी परती है और भक्ति एवं भगवान  के शरणागति  के पश्चात हीं अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है । वर्णा पतन हो जाता है । 
अतः हमें सदा अपने हरि गुरू की हीं शरणागति करना चाहिए ।
: -अपने गुरूदेव के दिए तत्त्व ज्ञान से ।

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