Thursday, 3 June 2021

तन से और धन से केवल भक्ति होती तो धनवान और बलशाली के लिए भक्ति की प्राप्ति एक क्षण की बात होती । धनवान और बलशाली का एकाधिकार भगवद् प्राप्ति पर भी हो जाता ।

तन से और धन से केवल भक्ति होती  तो  धनवान और बलशाली के लिए भक्ति की प्राप्ति  एक क्षण की बात होती । धनवान और बलशाली का एकाधिकार भगवद् प्राप्ति पर भी हो जाता ।  
वो चालिस पचास साल से लगें हैं महाराज जी के साथ , खुब नौटंकी किया , दिखाबा किया , दान किया , तन भी दिया पर मन नहीं दिया , वो सब समझते हैं । बाहर से बड़े शालिन है । बाहरी तौर पर ढोंग करना सीख लिया , अध्यात्म में चापलुसी सीख लिया संसार की तरह वहां भी , वो संसार बाले चापलुसी पसंद करेंगें , भगवान और संत नहीं । अंदर क्या है झूठ और फरेब , सब वो जानतें हैं ।
 मैं तो कडुबा हुं अपने गुरू की तरह खड़ा बोलता हुं किसी को धोखा नहीं देता और चापलूसी नहीं करता । सत्य को सत्य कहुंगा जो लगातार सेवा कर रहा है मैं उन लोगों का तारिफ दिल से ह्रदय तल से करता हुं और करता रहुंगा  ।

 किसी को अच्छा लगे ना लगे , जा सकता है। मुझे छोड़ कर ।  प्रार्थना है कोई अपने उपर ना ले मेरे इस पोस्ट को ।  मुझे कोई लोभ नहीं मुझे दोस्तों के लिस्ट की । दोस्त दो-चार हीं रहे  श्री महाराज जी के सिद्धांत के अनूकूल रहे जिससे मुझे और ज्ञान भगवद् चर्चा सही सही हो । शांती रहेगा । अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में आसान होगा । 

भक्ति अंदर की चीज है , ह्रदय और अंत:करण का वर्क है । अंत:करण की शुद्ध जरूरी है। वो शरीर की शुद्धि बाहरी शुद्धि , दिखावा , फिजिकल ड्रिल बाहरी तौर पर व्यवहार क्रिया से कोई मतलब नहीं । 

एक जल्लाद का दृष्टांत है एक क्या अनेक सत्य घटना है ।
एक जल्लाद जीव हत्या कर मांस का व्यापार करने बाला था । वो शालिग्राम के शिला से मांस तौल कर बेचता था और अंदर से भगवान की भक्ति करता था , हर पल नाम लेता था , एक क्षण भी नहीं भुलता था ।  एक पंडित मना किया उसको और वो उसका शालिग्राम ले लिया ।

 भगवान ने उस पंडित को फटकार लगाई और कहा " ए शालिग्राम शिला उसको वापस कर दें । और एक दिन उसी जल्लाद ने भगवद् प्राप्त किया । 
लोग पता नही ऐसा कहानी पढ़ कर क्या सिखतें हैं ? शिक्षा ग्रहण करतें है भी या नहीं ? आत्मसात किया या ऊपरे ऊपरे स्वाहा ?? या रंजन के दृष्टि से कथा पढ़ लिए सत्यनारायण कथा जैसे सिर्फ । ना चिंतन है ना मनन है ना प्रभाव है , पढ़ो और भुलो बस । क्या फायदा ??? 
वो पढ़ा और तराक कौपी पेस्ट , क्या तो दुसरे को दिखाना है और लाईक पाना है । मतलव नहीं आत्मसात करने से । वो दुसरा धराक से फिर कौपी पेस्ट , सब लगा है कौपी पेस्ट और पोस्टर की फैक्ट्री बनाने में । कोई मतलव नहीं खुद के मन को समझाने और अपनाने से । छी छी छी । 

इतिहास पुराण श्री महाभारत दृष्टांत है ,  हमारे इष्ट श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त अर्जुन को गीता का ज्ञान, हमारे दृष्टांत के लिए देकर  राष्ट्रहित में युद्ध का आदेश दिया था । वर्णा श्री अर्जुन तो पहले से हीं उनका बहुत बड़ा भक्त और सारे लौकिक एवं पारलौकिक ज्ञानों का स्वामी था । 

मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ (गीता १८-६५)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।66।। ( अध्याय 18 )

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।8.7।। (गीता )

आओ अर्जुण मेरे शरण में आ जाओ अपनी मन व बुद्धि दोनों मुझे दे दो और गलत का विरोध करो , मारो इन सबको जो अधर्म के साथ है ।
व्यवहारिक ज्ञान दिया और प्रैक्टिकल भी कराया , 
लेकिन लोग गीता का यह सब श्लोक रटतें है मुंह से केवल और कहते हैं गलत का विरोध ना करो समाज में चाहे कोई समाज को प्रदुषित कर दे , आपका जमीन जोत ले , आपकी बहु बेटी पर गलत नज़र रखे , पर उस निंदनिय का विरोध मत करो , बाहरी तौर पर चुप रहो । ख़ामोश रहो । यही भक्ति सिखा है क्या लोग ?? 
क्या श्री महाराज जी कहतें है कि कुछ मत करो ? चुप रहो ????
उन्होंने तो कहा है सब जरूरी काम करो और मन भगवान को दे दो तो तुम्हारा कर्म नोट नहीं करूंगा । तुमने कुछ नहीं किया , ए मैं लिख लुंगा । 
संसार में कौन यह कह सकता है कि उसका कर्म शुद्ध है आज कलयुग में , चाहे नौकड़ी हो या व्यापार , बिना घपड़-सपड़ के अर्थ कमा लेगा लोग ? तो फेसबुक पर नैतिकता और चिकना-चुपड़ा और दिखावा, बढ़ीया बनने का और गलत का विरोध नहीं करने का दिखावा से भगवद् प्राप्ति हो जाएगा तो मुबारक हो उनको । 

क्या भक्ति का दिखावा भक्ति है ? क्या फिजिकल ड्रील भक्ति है ? 
अगर यही भक्ति आपके लिए है तो करिए ऐसा भक्ति , मेरे लिए यह सब बाहरी नाटक है , मैं तो अंदर शुद्धि बाहर कितना भी गडबर हो का , बात  समझ लिया, जान लिया और मान भी लिया ,कोई चिंता नहीं यह जान लिया और मान भी लिया । 
 
जिसको बाहर से चिकना बनना है , भक्त कहलबाना है केवल,  बनना नहीं है । शौ औफ करना है , बाहर से अच्छा बनना है वो चिकना बने , मुबारक है उनको । मैं गलत हीं सही ,  मेरा भला बुरा मैं अपना समझता हुं ।

वो कहावत है " मन मलिन तन सुन्दर कैसे "??
       
" भगवान का भक्त कभी कायर नहीं होता और डरपोक कभी भक्त हो हीं नहीं सकता है । क्योंकि भक्त के पास अपने गुरू और भगवान का विशेष बल होता है। और भगवान और गुरू का आशिर्वाद होता है उसके माथे पर हमेशा । "

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