Tuesday, 15 June 2021

पीपल का परिक्रमा करने और उसके नीचे दीपक जलाने व पीपल के पेड़ आदि की पुजा करने का आध्यात्मिक विज्ञान क्या है , और आज का वैज्ञानिक साक्ष्य क्या है समझिए ।

बहुत जरुरी बात , अंत तक पढ़े और खुद को बचावें :- 
सनातन वैदिक धर्म में ज्योतिषी शास्त्र में पीपल का परिक्रमा करने और उसके नीचे दीपक जलाने व पीपल के पेड़ आदि की पुजा करने का आध्यात्मिक विज्ञान क्या है , और आज का वैज्ञानिक साक्ष्य क्या है समझिए । 

आजकल  के समय में  पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना बड़ी संख्या में खतरनाक है क्यों ? अब दीपक जलाने से कोई लाभ नहीं ।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं से समझते है और अंध विश्वासों को दुर करते हैं ।

सबसे पहले वैज्ञानिक पहलुओं का चर्चा करते हैं :- 
पीपल का पेड़ , अर्जुन का पेड़ चौबिसों घंटे कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करती है और उसको आक्सीजन में तब्दील करके  बाहर छोड़ती है । यह वैज्ञानिक शोधौ द्वारा साबित है , सब जानते हैं इस जेनरल नौलेज को ।

तो पुराने जमाने में दो हजार से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक भारत का हीं नहीं विश्व का पौपुलेशन पचास लाख भी नहीं था वन्य प्राणी और मनुष्य से उतना कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता था , और इस कारण कार्बन उत्सर्जन हजारों गुणा कम था । कोई मोटर गाड़ी , कल कारखाना आज के जैसा नहीं था जो भयानक कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता हो ।

अब अधिक जंगलों के कारण और कम कार्बन उत्सर्जन के कारण पेड़ पौधों को जीवित रहने के लिए बहुत मात्रा में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की आवश्यकता होती थी स्वाभाविक है ।

पीपल , बड़गद,  नीम , अर्जुन , तुलसी के पेड़ में अनेकों औषधिय गुण है सबकी चर्चा करना संभव नहीं इस पोस्ट में । आप में से बहुत लोग जानते हैं ।
जब वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा कम थी पुराने जमाने में , या वैलेंस थी तो,  पीपल आदी को अधिक कार्बन-डाई-ऑक्साइड मिले जिससे उसमें वृद्धि हो, पौधा स्वस्थ रहें  तो हमारे वैज्ञानिक ऋषि मुनि किसानो को, गृहस्थों को  इन पेड़ों के नीचे कर्मकांड बना कर इसकी पुजा और दीपक जलाने का विधान बना दिया । जिससे वो पेड़ कार्बन-डाई-ऑक्साइड ले और औक्सिजन बना कर आस पास के वातावरण को शुद्ध करे ।
उन्होंने लोगों को उस पेड़ की परिक्रमा का विधान भी बना दिया , उस समय पीपल बरगद आदी के पेड़ के मोटाई की व्यास कईयक मीटर की होती थी तो जब लोग उसका सात परिक्रमा , एक सौ आठ परिक्रमा करता था तो पेड़ के नीचे शुद्ध औक्सिजन और वातावरण के कारण मानव के फेफड़ों व स्वास्थ पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता था । मन मस्तिष्क स्वस्थ होकर अच्छा विचार उत्पन्न करता था , जिससे आचरण और कर्म बढीया हो जाता था और अच्छे भाग्य का निर्माण होता था महिलाओं और पुरुषों दोनों को ।

आध्यात्मिक पहलुओं पर ध्यान देंगे तो जहां का वातावरण शुद्ध होता है वहां भगवान , देवता का निवास होता है ,  हमारे वेद के अनुसार महाचेतन भगवान जड़ यानि माया , अपरा में और चेतन यानि पराशक्ति दोनों में विद्यमान है तो जाहिर है कि औषधिय गुणों वाले पेड़ पौधो में ज्यादा अनूभुत हैं ।
इसलिए इन पेड़ों में भगवान का बास कहा गया है हमारे  सनातन धर्म में ।
आज से ढाई हजार  वर्ष  पहले भगवान बुद्ध को गया जी में पीपल ( जिसे बौधिक वृक्ष कहा जाता है ,) के पेड़ के नीचे के अति शुद्ध वातावरण में दैविक ज्ञान प्राप्त हुआ था । पीपल , बडगद आदि का पेड़ चुंकि बड़ा विशाल होता है इसलिए यह ध्वनी प्रदुषण को भी शोख कर शुन्य कर देता है , उस पर शुद्ध औक्सिजन के कारण बने शुद्ध बातवरण के कारण शरीर से उर्जा का क्षय बहुत कम होगा तो स्वाभाविक है बहुत दिनों तक अन्न की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और ध्यान अच्छा लगेगा ।

पर आज उसी कर्मकांड के नाम पर ज्योतिष लोग पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाकर भाग्य बदलने का नाम देते हैं मुर्खतापूर्ण बुद्धि के कारण ।

अब आजकल के प्रदुषित काल में यह दीपक जलाने का कोई लाभ नहीं । कारण कि आज वातावरण में जरूरत से कहीं ज्यादा  कार्बन-डाई-ऑक्साइड पहले से मौजूद हैं उपर से हजारो की  संख्या में लोग एक हीं पेड़ के नीचे हजारों की संख्या में दीपक जलाकर परिक्रमा करते पाए जाते हैं । जिससे उसी दीपक के गैस को और ईन्हेल खुद कर लेतें हैं जिससे भाग्य बदलना तो दुर ओक्सीजन के कमी से डिप्रेशन , एंजाइटी बढ़ जाता हो और फिर किस्मत और खड़ाब हो जाता है । 
तो हम लोग पढ़ें लिखे हैं समझना चाहिए और बचना चाहिए इससे ।

और हद तो तब है हंसी लगता है मुझे अब शहरीकरण के कारण सोसाइटी में गमले में लगे पीपल बरगद  आदि के छोटे से पेड़ के नीचे अनेकों लोग अनेको दीपक जलाकर दो कदम भर में सट कर परिक्रमा करके सोचते हैं कि धार्मिक कर्मकांड के फर्ज को पुरा करके देवता को खुश करके अपना भाग्य बना लेंगे ।
अरे और ज्यादा कार्बन-डाई-ऑक्साइड पी कर अपना फेफड़ा भी खड़ाब कर लोगे । और एंजाइटी आदी का शिकार होकर किस्मत और खड़ाब कर लोगे । :- 
यह मेरा अपना लेख है ‌वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रमाण पर आधारित है । और यथार्थ है आपके लाभ के लिए डाला है आज , किसी का , कहीं का कौपी पेस्ट नहीं है । :- संजीव कुमार ।
आगे तील के तेल और अंगुठी में पत्थर के मिथक पर बात करूंगा फिर कभी ।

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