पर तुम जा नहीं सकते मेरे अन्तर्मन से
अटुट प्रेम का सागर उड़ेल कर
मेरे तन मन में अपना खुशबु उड़ेल कर
वोलो प्रिय फिर कब आओगे ?
कब फिर मेरे प्राण लौटाओगे ?
सार जगत का मुझको समझाकर ,
अपने निज शीतल स्वरूप दिखला कर
अलक्षित हो गए तुम जहान से ,
पर कैसे जाओगे मेरे अंतर्मन से
नस नस में विरह की अग्नी बुझाने
वोलो प्रिय फिर कब आओगे ?
या तो अपने पास बुला लो
या प्रिय तुम खुद हीं आ जाओ ,
श्री राधे जय जय श्री राधे , बोलो प्रिय तुम कब आओगे ?
( मेरी रचना )
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