Friday, 4 June 2021

जब रजनिश उर्फ ओशो ने भी उसी रसो वै स: ब्रह्म श्री कृष्ण के शरणागत हुए अपने उतर्रार्ध समय में सब कुछ छोर कर ।

बहुत बढ़िया बात, एक ज्ञान मार्गी कैसे भक्ति मार्गी हो कर अपना कल्याण कर लिया जीवन के उतर्रार्ध में , अंत तक एक बार पढ़ना ही होगा :- 
जब रजनिश उर्फ ओशो ने भी उसी  रसो वै स: ब्रह्म श्री कृष्ण के शरणागत हुए अपने उतर्रार्ध समय में  सब कुछ छोर कर । 
ओशो भी अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में यह दृष्टि पाया तो एहसास किया और सत्य को स्वीकारा की वहीं निराकार ब्रह्म अपने पुर्णता में श्री कृष्ण हीं है ।

 ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते, 
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते। 

ओशो को भी यह वेद मंत्र स्वीकार्य हो गया तब  :- 

"रसों वै सः।
रसं ह्येवायं लव्दानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् व्य प्राण्यात्।
यदव आकाश आनन्दो न स्यात्। एव ह्येवानन्दयाति।" 

और यह वेद मंत्र भी :- 

"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।। आनन्देन जातानि जीवन्ति।। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति" 

और जब उनको यह आत्म दर्शन हुआ की जब एक हमारी आत्मा भी जब हमारे शरीर में प्रवेश करके सगुण साकार हो सकता है । 
तो फिर वो निर्गुण निराकार भगवान श्री कृष्ण रूप में , राम रूप में , विष्णु रूप में , बुद्ध रूप में क्यों नहीं रूप धारण कर सकता है ।
अपने इस भुल को सुधारने के  बाद रजनीश जी  रो रो कर भगवान श्री कृष्ण से प्रेम की भिक्षा मांगा । 
और अंत में  जब अमेरिका में उनको जहर दिया गया किसी दुष्ट द्वारा  तो उन्हीं भगवान श्री कृष्ण को याद करते करते देह त्याग किया , कहते हैं कि  भगवान श्री कृष्ण उनको दर्शन भी दिए मृत्यू के ठीक पहले  और उनसे  पुछा की अभी तुम रहना चाहते हो  इस मृत्यू लोक में तो मांगों । मैं तुम को बिष के प्रभाव से मुक्त कर दुंगा ।
पर रजनीश जी ने मौक्ष मांग लिया । 
ओशो जी ने कहा है " सबसे पहले अपने अंत:करण को शुद्ध करो । खुद को ठीक करो , दुसरो में दोष ढुढ़ने में जीवन बीत जाएगा । 
अपना दृष्टिकोण को ठीक करो , वो कहते हैं जब तक अपने दोष को मिटाने में सफल नहीं हो जाते तबतक दृष्टि अशुद्ध रहेगी , और तुम्हारा खुद का दोष ही दुसरे में दृष्टिपात होती रहेगी ।
वो आगे कहते हैं कि जैसा पिलिया ( जौंडिस के रोगी ) के रोगी को हर वस्तु पीला नजर आता है ठीक उसी प्रकार तुम्हारा खुद के दोष के कारण संसार में हर बिषय वस्तु दोषपूर्ण नजर आएगा ।
वो कहते हैं अपने दृष्टिकोण को शुद्ध करने के लिए साधना करो । तब हर तरफ दोष नहीं , प्रेम हीं प्रेम नजर आएगा ।
प्रेम स्वयं तुममें उतरने लगेगा , पहले खुद पर फोकस करो  , खुद के चेतना को शुद्ध करो , नहीं तो तमाम जीवन भटकते रहोगे , थक जाओगे, निराशा आयगी , जीवन बोझ बन जाएगा । दुसरे में दोष देखना सबसे बड़ा दुख का कारण है,अशांति का मुख्य कारण है । 
याद रखना प्रेम कांटों के बाड़े से घीरे ह्रदय में कभी नहीं
उतरता , 
ईर्ष्या द्वेश , नफ़रत से भरे ह्रदय में परमात्मा का प्रेम नहीं ठहरता कभी , प्रेम दिव्य है , नफ़रत ईर्ष्या द्वेष , घृणा जहां होगी वहां प्रेम कभी नहीं उतरेगा , दोनों विरोधी‌ स्वभाव के हैं , विजातिय है  । 
जहां त्याग , दया , करूणा ,  निष्काम सेवा का भाव होता है प्रेम वहीं उतरता है क्योंकि ये सभी  सजातिय है । 
परमात्मा का दिव्य प्रेम फुलों से भरे  बगीचे में ही उतरती है । इसलिए अपने ह्रदय को फुल का बगीचा बनाओ ।

तुमको भी तो फुलों का बगीचा हीं पसंद है । कांटों का बाड़ा नहीं । क्योंकि तुम भी उसी का अंश हो । स्वाभाविक गुण में स्थिर हो जाओ, प्रेम उतरने लगेगा  । 
इसलिए किसी दुसरे में दोष मत देखो । 
 :- ओशो वाणी । 🙏🙏

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