सबसे पहले यह जानना जरूरी है तब समझ पाएंगे तिल के तेल का चढाने के पीछे का कहानी:-
राजा भोज स्वयं बहुत बड़े विद्वान थे और कहा जाता है कि उन्होंने धर्म, खगोल विद्या, कला, कोशरचना, भवननिर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं जो अब भी विद्यमान हैं। इनके समय में कवियों को राज्य से आश्रय मिला था। उन्होने सन् 1000 ई. से 1055 ई. तक राज्य किया। इनकी विद्वता के कारण जनमानस में एक कहावत प्रचलित हुई- कहाँ राजा भोज, कहाँ गांगेय, तैलंग। धार में भोज शोध संस्थान में भोज के ग्रन्थों का संकलन है। भोज रचित 84 ग्रन्थों में दुनिया में केवल 21 ग्रन्थ ही शेष है। भोज बहुत बड़े वीर, प्रतापी, और गुणग्राही थे। इन्होंने अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी और कई विषयों के अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया था। ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे।
भारत में अकाल का बहुत पुराना इतिहास रहा है। 1022-1033 के बीच कई बार अकाल पड़ा। सम्पूर्ण भारत में बड़ी संख्या में लोग मरे थे।
हमारे उपनिषदों से पता चलता है कि शनी देव और हनुमान जी में युद्ध हुआ । इस पर टीवी धारावाहिक भी बना है ,जो देखेंगे होंगे वो जानते होंगे । इसलिए अति संक्षेप कर रहा हुं ।
अब इस युद्ध में शनी देव को चोट लगा । हनुमान जी ने उनको बंदी बना लिया । भगवान राम के निकट ले गए
शनी देव को जीवन दान मिला भगवान से और वो भगवान के दया और करुणा को देख भाव भक्ति में खो गय । उनको भगवद् प्रेम मिल गया । इसका आभार उन्होंने हनुमान जी को व्यक्त किया और बोला जो भी आपको भजेगा । उसको मैं कष्ट से मुक्ति दे दुंगा खराब प्रारब्ध को मिटा दूंगा । और जो प्रभु श्री राम को अपने ह्रदय में धारण करेगा उसका तो अनंत जन्म ठीक हो जाएगा हीं ।
हनुमान जी ने भी उनके चोट पर तील के तेल का लेप किया और कहा जो आपको यह तील के तेल का लेप भाव भक्ति से चढ़ाएगा उसको मैं उसका सब कष्ट हर लुंगा ।
अब यह बात शुरू हुआ । श्रद्धालु उनको थोड़ा सा , बस थोड़ा सा तील का लेप चढ़ाने लगे और यह ज्योतिष शास्त्र के उपाय के नाम पर एक विकराल रूप ले लिया ।
अब राजा भोज के समय आकाल परा । उनके राज्य में तेलहन मुख्य लाभकारी नगदी फसल था । जिससे राज्य को बहुत सा टैक्स मिलता था । तेलहन की काफी कमी हो गई । पर जब अकाल मिटा तो फिर इतना तेलहन हुआ की उसके उत्पाद को कोई खरिदने वाला नहीं था । मुफ्त में देने पर भी कोई लेवाल नहीं था ।
उनके राज्य के किसान अपने मुख्य फसल का लागत तक नहीं वसूल पा रहे थे , भूखे मरने लगे अकाल समाप्त होने के बाद भी । राजा भोज विद्वान तो थे ही । अर्थशास्त्री भी थे ।
उन्होंने पंडितों , ज्ञानियों , ज्योतिषों के रूप में अपने नवरत्नों के साथ फैसला लिया और ज्योतिषों के और पंडितों के द्वारा पुरे भारत में शनी देव को भर भर क्विंटल तेल चढाने का ज्ञान बांट दिया । फिर क्या था अचानक तील के तेल का डिमांड पुरे भारत के अनेक राज्यों से आने लगी और किसानो को और राज्य को बहुत सा धन मिला ।
तो उस समय फिसकल डेफिसिट को पुरा करने का यही तरिका था । जो उन्होंने सही किया ।
वही प्रथा शास्त्रो में जगह लेकर आज तक कायम है । पर आज बिना भक्ति भाव के नकली तेल हजारों टन चढ़ रहा है । उपाय के नाम पर अधर्म व्याप्त है ।
तेल के छोटा सा लेप के जगह पर टनों नकली तेल !
आपके घाव पर आपके सगे आकर सब मिलकर आपको नकली तील के तेल में डुबा दे कैसा लगेगा आपको ?
माना की तील के तेल में फंगस रोधी गुण है इसका मतलव यह थोड़े है कि आपको नकली तेल में डूबा दिया जाए ।
देखिय मैने हकीकत लिखा है । जिसको पसंद है माने जिनको गलत तरिका रूपी अंधविश्वास पसंद है वो उसी को माने । वर्णा हमारे लिए हमारा सनातन धर्म बहुत वैज्ञानिक हैं कोई अंध विश्वास नहीं । हमारे सनातन में पाखंडियो द्वारा जबरदस्ती घुसरे गए इन्हीं तरह के गलत ज्ञान रूपी अंधविश्वासों के कुछ कारणों से विरोधियों को मौका मिल जाता है सवाल खड़ा करने का ।
जबकि उनके वहां भी अंधविश्वासों का कमी नहीं ।
पर हमें तो खुद को खुद के धर्म के अंधविश्वासों को समाप्त करने का प्रयास करना है, गलत तरिका रूपी व्याप्त कर्मकांड के बारे में लोगों को जागरूक करना है । दूसरे को तो हम कभी बदल नहीं सकते । 🙏❤️🙏
No comments:
Post a Comment