प्रश्न था : -महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ में एक भी अस्त्र , शस्त्र न उठाने का प्रण लिया । युद्ध में खुद सारथी बने, धर्म युद्ध करने के लिए जीवों को ही प्रेरित किए । यहां तक की शिखंडी को भी युद्ध में शामिल करवाया आदि । भगवान श्री कृष्ण अगर चाहते तो एक मिनट में खुद अपने हाथों से तमाम कोरवो का विनाश कर देते । पर उन्होंने ऐसा नहीं किया । क्यों ? इसका उत्तर के सार को आपको गीता के कुछ श्लोक के द्वारा सिद्ध करना होगा । यहां तक की अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना भी कौरवों को दे दी , खुद अस्त्र शस्त्र नहीं उठा कर क्या संदेश दे रहें हैं हम लोगों को ?
मेरा उत्तर - तत्वज्ञान और व्यवहारिक सिख के आधार पर मेरा उत्तर यह है :-
तत्वज्ञान के आधार पर :- आप सभी जानते हैं कि भगवान केवल अपने से राग (प्रेम के कारण ह्रदय मे़ रखना ) या द्वेष ( अति दुश्मनी के कारण हर क्षण स्मरण ) वाले जीव को अपना लोक देते हैं स्वयं मार कर । भक्त के पराधिन होते हैं । और अपने अवतरण काल में अपने खिलाफ निगेटीभ ( विलेन का रोल ) भुमिका वाले को स्वयं मार कर अपना लोक दे देते हैं । उन्होंने पुतना , अघासुर वकासुर कंस , शिशुपाल आदि को स्वयं मृत्यु देकर अपना लोक दे दिए । पर कौरवों में और उसको साथ देने वाले सगे संबंधियों में एक भीष्म पितामह को छोड़ कर कोई उनका प्रेमी , भक्त नहीं था ।
कौरवो में धृतराष्ट्र , गंधारी , द्रोणाचार्य का अटैचमेंट मोह अपने पुत्रों में था तो 99 भाइयों का मोह दुर्योधन में था । दुर्योधन की कामना राज्य पाने का था । और पांडवों से नफ़रत था उसे , नहीं तो पांच गांव देकर राज्य पा लेता ।
इसलिए भगवान इन किसी को भी अपने विधान के अनुसार अपना लोक नहीं देना था स्वयं के हाथो मार कर ।
दुसरा यह ज्ञान देना था तमाम आगे विश्व के हम तमाम जीवों को की अपना कर्म खुद करो बिना फल की कामना किए , भगवान के भरोसे मत बैठे रहो की तुम्हारा काम भगवान कर देंगे आकर ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन........ गीता ।
भगवान को अपने ह्रदय में रखो , धारण करो , उनपर पुर्ण विस्वास करो , और कर्मयोग की शिक्षा दी । नहीं तो हम लोग अकर्मण्य हो जाते । इसलिए प्रण किया उन्होंने अपने व्यवहारिक युद्ध लीला में की वो शस्त्र नहीं उठाएंगे ।
अब व्यवहारिक युद्ध लीला में भुल जाईए थोड़ी देर के लिए की वो भगवान थे । तब समझेंगे ।
तो उन्होंने हमें यह शिक्षा दी की गुरू हमारा मार्गदर्शन करेगा केवल , साधना खुद करनी होगी और कर्मयोग के द्वारा गलत का विरोध एवं अपने संसार का काम स्वयं करना होगा , । संसार में भी आज अनुभवी लीडर स्वयं काम नहीं करते, वो तो थ्योरिटिकल और प्रैक्टिकल सब करके लीडर बना है । गाईड बना है। वो तो काम, कर्म करना सिखाता है अपने अनुगत शिष्यों को ।
श्रीकृष्ण भी युद्ध में भी इसी गाईड , लीडर , गुरू की भुमिका में है । अगर लीडर स्वयं काम करने लग जाए तो फिर सब निकम्मा होकर , अकर्मण्य होकर बर्बाद हो जाएगा । और डिपेंडेंट हो जाएगा लीडर पर हीं । इसलिए खुद हथियार नहीं उठाए ।
दुसरा :- उन्होंने अपनी सोलह अक्छ्वनी सेना दूर्योधन को दे दी । मतलव सही मार्ग, धर्म मार्ग , न्याय मार्ग , भक्ति मार्ग पर चलने के लिए अधिक साधन की आवश्यकता नहीं ।
दुश्मन से नफ़रत भी नहीं करना चाहिए , पुरी शक्ति से उसका विरोध करना है दुष्टो के कुकर्म का बिना उससे राग या द्वेष किए , नहीं तो स्वयं का नुकसान होगा , वो ह्रदय में आ जाएगा और विधान के अनुसार अगले जन्म में हम उसी दुष्ट के यहां जन्म लेने को बाध्य होंगे , इसलिए दुष्ट से नफ़रत नहीं वल्कि उसके दुष्कर्मो का विरोध करना चाहिए ।
वो दुष्ट तो ऐसे हीं मर चुका है अधर्म पथ पर पैर देने के कारण ,जमीर मर चुका है केवल शरीर चल रहा है उसका , सब उसी समय मर गया जब पाप अधर्म के कारण आत्म शक्ति चली गई उन सबकी । जो झूठ बोलता है , दुष्कर्म करता है, क्रिमिनल है । दुसरे का हक मारता है । अन्याय करता है समाज में । वो केवल हथियार और बौडी गार्ड के बल पर शेर बनता फिरता है, जबकी इन गलत कर्मो के करण उसका साथ भगवान छोड़ देते हैं स्वयं कब का । उनका साथ छोड़ते ही उसकी आत्म शक्ति समाप्त हो जाती है । वो जिंदा लाश बन जाता है और अपने सैनिक , बौडी गार्ड और हथियार के बल पर रोव झाड़ता है रहता है समाज में । और एक दिन टें बोल जाता है किसी के द्वारा । मौत बड़ा दुर्दाई होता है उसका , उसका साथ देने बाले उसके संबंधी और साथी भी दर्दनाक विनाश का भागी बनता है समय आने पर । उसका वंश समाप्त हो जाता है एक दिन , कोई नहीं बचता उसके वंश में उसके अन्याय से अर्जित धन और राज्य को भोगने वाला ।
रहा न कुल कोई रोवन हारा .....
आंसु बहाने वाला भी नहीं बचता उसके मौत पर , अग्नी देने वाला तो बहुत दुर की बात है ।
और भगवान ने यह भी अनुभव कराए कि समाज में 99% लोग अधर्मी का ही साथ देते हैं । महाभारत में यही हुआ पांडव के पक्ष में भगवान थे और एक दो राजा थे , बस । पर इस विश्वयुद्ध में पांडवो का अपना संबंधी भी उसी अधर्मी दुर्योधन के पक्ष में लड़े और मारे गए।
इसलिए याद रखिय धर्मयुद्ध में आपका साथ कोई नहीं देगा आपका साथ भगवान देंगे केवल और आपका गुरू देगें , एक उनका साथ हीं सब पर भारी पड़ेगा , चिंता नहीं करना है । आपकी जीत होगी एक दिन ।
तीसरा :- लिमिटेड रिसोर्सेज ( साधन )ही होगा आपके पास कर्मयोग के लिए , उसी लिमिटेड रिसोर्सेज से लक्ष्य हासिल करना होगा ।
चौथा :- धर्म युद्ध में धर्म में साथ चाहे वो शिखंडी ही क्यूं ना हो आपका साथ दे रहा है तो उसका सम्मान करना चाहिए । एक कमजोर गलिहरी भी आपका साथ दे रहा है तो उसका भी सम्मान करना चाहिए । कोरोना से युद्ध के समय केन्या जैसा देश भी आपका साथ दे तो उसको ठुकराना नहीं चाहिए वल्कि उसके उपहार को सम्मान के साथ स्वीकार्य करना चाहिए । नहीं तो अधर्म होगा । और आपका साथ भगवान वहीं छोड़ देंगे ।
पांचवां :- अधर्म का साथी अगर आपका सबसे प्यारा भीष्म जैसा ताऊ भी दुर्योधन जैसा जीव के पक्ष में खड़ा हो जाए तो उनसे मोह ममता त्याग देना चाहिए और पीछे नहीं हटना चाहिए । वल्कि अधर्म को साथ देने वाला , समाज में चीर हरण के समय खामोश होकर देखने वाला भीष्म , द्रोण जैसा शिक्षक , अधर्म के साथ देने वाले का बद्ध सबसे पहले करना चाहिए उसके बाद अंत में मुख्य दुराचारी को । कि देख तुम्हार साथ देने वाला कोई नहीं बचा । तुम्हारा सब समाप्त हो गया तुमसे पहले।अब भी शरेंडर कर दो। पर दुराचारी शरेंडर भी नहीं करता अंत में चुल्लू भर पानी में मुंह छूपाना परता है उसको ।
दुर्योधन भी यही किया । एक छोटा तालाब में जाकर छिप गया । उसके नफ़रत का आग उसी को जलाने लगा था ।
इसलिए भगवान ने स्वयं हथियार नहीं उठाकर पांडवों को ज्ञान देकर उसके मोह ममत्व को समाप्त कर यह कहा अंत में कि
सर्वधर्मान्परित्यज्य माम् एकं शरणं ......
सर्वेषु कालेषु माम् मनुष्मर युद्ध च ......
कर्मयोग की शिक्षा देते हुए अंत में भक्त बर्बरीक के द्वारा यह भी सिखा दिया कि अपने कर्मयोग का भी श्रेय अपने गुरू को दो, खुद को नही। गलत फहमी में मत रहो , अहंकार मत करो की यह शुभ काम तुमने अपने स्वयं के बाहुबल से किया है । हर अच्छे काम का श्रेय भगवान और गुरू को दो । नहीं तो अहंकार ह्रदय में आकर बैठ जाएगा और तुम भी दुर्योधन की तरह हो जाओगे एक दिन ।
मैं तो अपने श्री गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी के कृपा से जो तत्वज्ञान और व्यवहारिक शिक्षा पाई है साधना से उनके बल से वही लिखा है । कोई त्रुटी हो तो क्षमा करेंगें ।:- संजीव कुमार , रांची । 🙏❤️🙏
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