Wednesday, 16 June 2021

दुसरा प्रश्न था आप सभी से कि :- त्रेता में भगवान राम अन्य राक्षसों को लक्षमण जी द्वारा , हनुमान जी , जामबंत जी , सुग्रीव जी द्वारा और अपने नर बानर सेना आदि से मरवाए पर रावण और कुंभकरण को स्वयं मृत्यु दे करके अपना लोक प्रदान कर दिए, इसके पीछे क्या कारण हैं ? ( वो दोनों जय विजय उनका द्वारपाल थे इसके अलावे उत्तर चाहिए ) श्री महाराज जी के तत्वज्ञान के आधार पर उत्तर दिजिए ।

अब दुसरे प्रश्न का उत्तर :-
दुसरा प्रश्न था आप सभी से कि :- त्रेता में भगवान राम अन्य राक्षसों को लक्षमण जी द्वारा , हनुमान जी , जामबंत जी , सुग्रीव जी द्वारा और अपने नर बानर सेना आदि से मरवाए पर रावण और कुंभकरण को स्वयं मृत्यु दे करके अपना लोक प्रदान कर दिए, इसके पीछे क्या कारण हैं ? 
( वो दोनों जय विजय उनका द्वारपाल थे इसके अलावे उत्तर चाहिए ) 
श्री महाराज जी के तत्वज्ञान के आधार पर उत्तर दिजिए । 

उत्तर :- दो चार भाई और बहन ने तत्वज्ञान के दृष्टिकोण से उत्तर दिय थे सही था , बस उसको और थोड़ा गहराई से मैं उत्तर लिख देता हुं । श्री महाराज जी के कृपा से । जो निम्नलिखित हैं :- 
तत्वज्ञान के दृष्टि से पहले समझते हैं :- भगवान जब भी धरा धाम पर अवतरित होते हैं अपने परकीया लीला ( व्यवहारिक लीला) में तो उसका बहुत बड़ा उद्देश्य और हर लीला का अलग अलग प्रकार होता है । और उनके आने से पहले उनका खास परिकर आ जाते हैं उनके लोक से , कोई निगेटिव रोल के लिए तो कोई पौजिटीव रोल के लिए । नहीं तो लीला होगी हीं नहीं । और यह लीला संसार के लोगों को राजयोग , ज्ञानयोग और भक्तियोग का व्यवहारिक सिद्धांत सिखाने के उद्देश्य से होता हैं ‌ , जिससे अलग अलग प्रकार के भाव वाले को उनके अपने अपने मार्ग के हिसाब से ज्ञान मिल जाए । रास्ता मिल जाए ।

तो भगवान श्री राम के रूप में अवतार लिए । उनको मर्यादा भी स्थापित करना था संसार में । मर्यादा पुरुषोत्तम बन कर आए । उच्च आदर्श जैसे आदर्श पति , बेटा , भाई , राजा आदि की स्थापना ।

तो अब उनके परम प्रिय भक्त आदि, जो उनके साथ उनके लोक को प्राप्त कर चुका भक्त , जो उनके सेवा में वहां रहते हैं उनको ही नीचे भी अलग अलग रोल निभाने का सेवा मिलता है । उनके सभी ऐसे भक्तों में तत्वज्ञान भरा रहता है चाहे वो किसी भी रोल में आए और जाए पृथ्वी पर उनके लीला में सहायता करने ।

अब रामावतार में भगवान स्वयं ही सीता बन गए । और स्वयं हीं तीनों भाई बन कर आ गए ।

"एकं सत् विप्रा बहुधा बदंती " एक भगवान अनके बन कर आ गए ।

१.स्वयं भरत रूप में निस्वार्थ भक्ति की पराकाष्ठा रूपी भक्ति करने का तरिका सिखाए भक्ति मार्गी जीव को कि निष्काम भक्त कैसा होता है कैसे करना चाहिए ।
२. खुद लक्ष्मण रूप में छोटे भाई बन कर दास भाव भक्ति अंगिकार किया और सिखाए दास भाव भक्ति मार्गी को कि कैसे किया जाता है ।
३. स्वयं सीता बन गए और समर्था रति का भक्ति सिखाया संसार को ।
४. स्वयं शत्रूघ्न बन कर आए , सबसे छोटे भाई के रूप में और सिखाया की कैसे आदेश का पालन करके भरत जैसे भक्त का भी दास यानि दास का भी दास कैसा होना चाहिए ?

अब आइए उनका सेबक , द्वारपाल जय विजय को मिला निगेटिव रोल निभाने का आदेश ।
पौजीटिव रोल निभाना तो फिर भी आसान है लेकिन निगेटिव रोल निभाना, वो भी उनके अनन्य दास के लिए कितना पीड़ा दायक होगा इसकी कल्पना हम आज भी नहीं कर सकते ।
हम लोग जीरो वाला भक्त हैं तो जरा सा कोई दो बात बोल देता है आज , अपमान कर देता है तो तिलमिला जाते हैं । कोई तत्वज्ञान पर बात भी करता है सही सही , तो उससे जलन होता है । नोचने दौड़ते हैं उसको । पर सोचिए जय विजय को यह रोल निभाने में कितनी पीड़ा हुई होगी ? 
पर असली भक्त तो भगवान के आदेशों के पालन के लिए नरक का भी वरण करने को तैयार रहता है ।
जय विजय जानता था कि पुरा विश्व अनंत काल तक उसको गाली देता रहेगा । पर फिर भी वो दोनों भगवान के सुख के लिए रावन और कुंभकरण के रूप में अवतार लिया त्रेता में । हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में सतयुग के अंत में , और शिशुपाल एवं कंस के रूप में द्वापर में धरा धाम पर आया ।

अब आप पुछेंगे कि भगवान अपने जन को राक्षस का लीडर बनने का आदेश क्यों दिए । तो उत्तर है कि राक्षसों का , दुष्टों के विनाश के लिए । संपुर्ण राक्षसों के विनाश के लिए ।
आप ध्यान से समझिए , रावन तत्वज्ञानी था । एक बार जिसको भगवद् प्राप्त हो जाता है तो उसपर माया कभी फिर अधिकार नहीं कर सकती है और वो दोनों तो सदा से माया से परे उनका द्वारपाल सेवक था । इसलिए दोनों भाई सब जानता था । उस दोनों को भगवान से अनंत प्रेम था ।
 नफरत नहीं था और ना द्वेष था उस रूप में भी । 
सदा से भगवान के लोक में उनका दास बन कर रहने वाले तो हमेशा से माया से परे होते हैं तो उनको भला फिर माया कैसे लग सकती है ? 
और जब वो माया से परे हैं तो उनको माइक दुर्गुणें कैसे लग सकती है । और जब नहीं तो वो काम क्रोध , मद मोह लोभ ईर्ष्या द्वेष कैसे कर सकता है भला । बोलिए आप ही ! 

कुछ लोगों ने अपने उत्तर में लिखा द्वेष था उसको । नहीं नहीं , ऐसा नहीं था दोनों के ह्रदय मे, दोनों के ह्रदय में भगवान राम से केवल और केवल अनन्य प्रेम था, निष्काम प्रेम था । कोई द्वेष नहीं था ।
रावण सब जानता था अंदर से कि सीता जी कौन है और वो एक्टिंग में जिस सीता को हर लाया है वो अग्नी पुत्री हैं ।

आप लोग श्री महाराज जी के बहुत से किताब और सभी प्रवचन को नहीं सुना और सुना भी है तो भुल जाते हैं । और विडियो डालने पर उसको ध्यान से नहीं सुनते , उनके सभी किताब खरिदते नहीं । और लंबा पोस्ट पढ़ते नहीं । केवल लाईक और शेयर ,बस यही हमारा काम है यहां । खुद समझे नहीं पर दुसरे को जनाने की जल्दी है । दुख होता है यह देख कर । और कोई समझाता है तो उसको व्यंग करने लग जाते हैं उल्टे , हम लोग खुद को बड़ा ज्ञानि साबित करने में लगे रहते हैं । यह अहंकार है कि मैं तुमसे बहुत पहले से जुड़ा हुआ पुराना साधक हुं , वो सब समझ गया , सब जानता हुं । अहंकार भरा जा रहा है उल्टे हमलोगो में । कोई एक प्रश्न पुछ दे तो टांय टांय फीस । 
और जब कोई सही उत्तर दे देता है तो कहते हैं कि हम तो पहले से जानते थे । जब जानते थे तो उत्तर पहले क्यों नही । और फिर बाद में क्यु जनाते है हम कि हम तो जानते थे जी । 
कितना गलत आदत है हमारा ? मैं उनलोगो को साधुवाद देता हुं जिन्होंने कुछ प्रतिशत सहित हीं सही उत्तर दो दिया । इस प्रश्नोत्तरी से कुछ एक दो असली जिज्ञासुओं को लाभ तो होगा कम से कम । 

गलती से जो संसार समझता है वहीं समझ लिया आप भी कि रावण आदि को द्वेष था राम से , इसलिए राग द्वेष बाला फार्मुला बता दिया आप , यह फार्मुला हम घोर मायाधिन संसारी के लिए लागु है । महापुरूषों के लिए नहीं । महापुरुष लोग केवल प्यार करते हैं उनसे । राग द्वेष का फार्मुला उनके लिए भी लगा देना पुरा गलत है । दो जोर दो ही पांच हो गया है आप से तो आगे सब उत्तर गलत ही होगा । स्वाभाविक है ।

वो तो द्वेष का नाटक किया था रावण कुंभकर्ण दोनों ने , हमको आपको दिखाने के लिए , और सबसे बड़ी बात लंका के सभी राक्षसों के विनाश करवाने में भगवान के अवतार के उद्देश्य को पुरा करने के लिए वो नाटक किया , जो रोल दिया भगवान ने वो निभाया उन दोनों ने ।
अगर वो नाटक करने के दौरान शरेंडर कर देता या खुद पहले आ जाता मरने तो तमाम राक्षसों का विनाश कैसे होता । इसलिए वो सभी को मरवा दिया पहले ।
और देखिए जानबुझ कर विभिषण को लात मार कर राज्य से मुक्त कर के भगवान के पास भेज दिया क्योंकि वो धर्मराज का अवतार भगवान का भक्त विभिषण था । 
अगर वो लात नहीं मारता भरी सभा में और बोल देता कि हे मेरे‌ प्यारे भाई मैं और तुम तो जानते हैं कि तुम भगवान का भक्त हो , यहां से निकल जाओ , उनके शरण में चले जाओ तो फिर उसका पुत्र आदि मेघनाथ असुर आदि सचेत हो जाता और भाग जाता । 
पर रावण को तो तमाम असुरों के विनाश के बाद श्री लंका में विभिषण के रूप में धर्म राज के शासन के स्थापना के उद्देश्य में भगवान का मदद करना था ।

इसलिए महापुरुष था रावण और कुंभकरण व विभिषण, मंदोदरी आदि । 
इसलिए यह सब नौटंकी करना परा उन सभी को ।

अब आइए मेघनाथ जो भक्त नहीं था , महापुरूष नहीं था , कर्मकांडी में महान था वो सब का विनाश लक्ष्मण जी आदि से हुआ । 
पर एक परम भक्त को कोई दुसरा परम भक्त कैसे मार सकता है भला । यह नियम नहीं है भगवन के यहां ।
इसलिए रावण कुंभकर्ण को भगवान स्वयं मारे । 
क्योंकि सभी भक्त महापुरुष भगवान से अनन्य निष्काम प्रेम करता है ‌जो उनके लोक से आता है । माया से परे होता है अंदर से और वो भी भगवान की शक्ति योगमाया से हीं काम करता है अवतार काल में ।

अब आइए व्यवहारिक पहलु पर भी ध्यान देते हैं ।
तो चुंकि भगवान का रामवतार संसार के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार था ।
इसलिए उनको युद्ध के मैदान में मर्यादा धर्म का भी पालन करते हुए श्री लंका के राजा को , संसार के सामने मृत्यु दंड देने का विधान रूपी फर्ज भी स्वय निभाना था ।

राम के चरण पादुका अयोध्या के गद्दी पर आसीन था । इसलिए वो वनवासी होने के बाबजूद भी राजा भी थे ।
एक राजा को वो भला अपने दास भाव के भक्त लक्ष्मण जी के हाथों कैसे मृत्यु देते और अपना लोक भेजते । यह मर्यादा के खिलाफ था ।
इसलिए उनको दोनों दृष्टियों से लीला करना था ।
यही कारण था ।

मैने भी विना किसी कि सहायता लिए यह उत्तर दिया है पहले से दिमाग में भर दिए हैं श्री महाराज जी । जो श्री महराज जी कि कृपा से प्राप्त तत्वज्ञान है उसके आधार पर मैंने लिखा । श्री महराज जी साक्षी है । इसका उत्तर देने में मैंने किसी से कोई सहायता नहीं लिया है । श्री महाराज जी का चिंतन से प्राप्त कृपा बल से मैं लिखा । किसी प्रकार के त्रुटि के लिए क्षमा करेंगें । आप सभी के चरणो में नमन । 
श्री राधे । 
आपका संजीव कुमार ।


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