Wednesday, 23 June 2021

”मुजरिम कौन ?"एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर एक संत से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी ।

”मुजरिम कौन ?"
एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर एक संत से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी । अपनी दीनता को दर्शाते हुए उसने अपने गले में जूतों की माला डाल रखा था । संत ने उससे पूछा कि शरीर को सज़ा देने का क्या फ़ायदा अगर असली मुजरिम मन, आज़ाद घूमता फिरे ? 
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए संत ने यह कहानी सुनाई ।

एक स्त्री ने एक बकरा और एक बन्दर पाल रखा था और उन दोनों को उसने घर के पास बाँधा हुआ था । एक दिन उसने बड़े प्रेम के साथ खाना बनाया और दही लेने के लिए बाज़ार चली गई । बन्दर ने अपने हाथों से अपनी रस्सी खोलकर, रोटियाँ खाकर बकरे की रस्सी खोल दी और अपने गले में उसी तरह अपनी रस्सी डाल ली । जब वह स्त्री वापस आयी तो देखा कि खाना नहीं है और बकरा खुला फिर रहा है । लगी बकरे को मारने । कोई सज्जन यह सब देख रहा था । उसने कहा कि यह बकरा बे-क़सूर है, सारा क़सूर उस बन्दर का है ।

सो अपनी कामना पूरी करने के लिए यह मन-रूपी बन्दर सबकुछ कर लेता है ।
असली क़सूर तो मन का होता है लेकिन सज़ा बेचारे शरीर को भुगतनी पड़ती है ।

मन लज्जत का आशिक़ है । जब इसे पहले से कोई अच्छी चीज़ मिल जाये तो यह 
पहली को छोड़ देगा, और दूसरी के पीछे दौड़ेगा....
इसे चाहे दुनिया की करोड़ों लज्ज़ते दे दें
पर मन फिर भी वश में नहीं आता ।
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तो अगर जीवन में शांती और शकुन चाहिए तो...संतोषम् परम सुखम का मार्ग अपनाना होगा मन को शांत करके । 
भगवान से भी किसी भी कामना का पूर्ण त्याग करना होगा । 

और केवल अपने गुरू से प्रेम करना होगा "निष्काम प्रेम "। तभी आध्यात्म भी सही होगा और संसार भी । 
ये सब पीछला जन्म और अगला जन्म की चिंता से मुक्त होना होगा । जितना बन परे परोपकार के लिए दान कर दिजिए अगर है तो, नहीं है तो दान ले लिजिए। छिनिए नहीं किसी से , घुस नहीं , डकैती नहीं , किसी का शोषण नहीं , किसी के हक को मारना गंभीर पाप है । 
ऐसे भी संसार में जितना भी धनार्जन वाले हैं वो सब दान से प्राप्त धन से हीं अपना निर्वाह करतें हैं , यहां तक तो ठीक है, यह धनोपार्जन जीवन के लिए जरूरी है , पर जो व्यापारी अपने व्यापार द्वारा या नौकरी में जो गृहस्थ अनैतिक रूप से धन अर्जित करते हैं इनकी अंत गति अच्छी नहीं होती ।
अब नौकड़ी या व्यापार करने वाला कहेंगें की नहीं भाई हम तो मेहनत करते हैं , हमारी अपनी काबिलियत है , योग्यता है , हम अपने कर्म से कमाते हैं । हां आप कह सकतें हैं पर यह सच नहीं हैं । आप कर्म और कुकर्म में अपने जमीर के तौर पर समीक्षा करेंगे तब समझ जाएगें। 

अब अगर आप यह कहतें हैं कि आप अपनी योग्यता से कमातें हैं तो फिर आप यह कैसे सोंच सकतें हैं कि हम संत के निमित्त भगवान के निमित्त दान करतें हैं ।  
फिर तो मेहनत तो सबसे ज्यादा संत करतें हैं वो भी अपने लिए नहीं परोपकार के लिए और यह उनकी योग्यता है आपसे अनंत गुणा अधिक । वो अपने उपर कुछ भी खर्च नही करतें वल्कि अपना भी लुटा देतें हैं । वो अपनी योग्यता से आपको मोटिभेट करतें हैं, परोपकारी बनाते हैं । दयालु बनातें हैं मानव बनाते हैं । तो यह तो उनका कमाल है आपका नहीं ।
असली कर्मी और महादानी परोपकारी संत होतें हैं पराकाष्ठा का , जैसे श्री कृपालु महाराज जी , भगवान का साकार स्वरूप । A real philanthropist . जिन्होंने अपना सबकुछ दान कर दिया जीव हित के लिए । एक बैंक एकाउंट तो क्या एक लकड़ी का डब्बा भी उनके नाम से नहीं हैं । यहां तक की अपने निज जन यहां तक की तीनों पुत्रियों को भी जीव कल्याण में लगा दिया । इससे बढ़कर और मिशाल क्या हो सकता है भला ??
  🙏🏽☝🏽🙏🏽 पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी ।।

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