Tuesday, 29 June 2021

मेरा संस्मरण ,

मेरा संस्मरण :- 
किस प्रकार सदगुरू जीव को उसके जन्म से पहले और फिर उसके बाद अपने शिष्य को संभालते हैं प्रेरणा देते हैं और दिलवाते भी हैं संसार के महान जीवों के द्वारा भी !
किस प्रकार गुरू अपने लीला संवरण के बाद सर्वव्यापक होकर सबका कल्याण करतें हैं !

युवाओं को और हमारे भाई बहनों को मैं वहीं कहना चाहता हुं जो मुझे 1988 में बाबा आमटे ने विवेकानन्द पुरम कन्याकुमारी में कहा था ।

 उस दिन से मेरी उच्श्रृखंलता, चंचलता समाप्त हो गई और मैं अपने कोर्स के अलावा अच्छी अच्छी पुस्तकों को पढ़ने का आदत शामिल कर लिया अपने जीवन में । और करीब लगभग दो हजार से उपर पतली व मोटी पुस्तके/पत्रिकाएं पढ़ी है आज तक , इसमें मेरे गुरूदेव की चालिस से अधिक पुस्तकें और लगभग साठ से उपर पत्रिकाएं भी शामिल है ।
यह कैसे हुआ तो बाबा आमटे और डॉ सुब्बाराव साहब ( भाई जी कहतें है सभी इनको ) के प्रेरणा से । और इनकी प्रेरणा ने संसार में मेरे जीवन की दिशा बदल दी थी । मैं जीवन को एक गंभीर अध्ययन बना लिया , दुसरे को सिखाने के लिए नहीं वल्कि खुद को पहले संवारने के लिए । वर्णा मेरा भी जीवन आम हो जाता , मजाक हो जाता , फुहर हो जाता ।
दुसरा सबसे बड़ा आत्मिक और मानसिक , बैचारिक या आध्यात्मिक परिवर्तन श्री कृपालु जी महाप्रभु एवं पूज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से मिलने के बाद हुआ । 
ऐसा लगता है कि मेरा जीवन भी जन्म से पहले ही विल्कूल प्रोग्राम्ड था श्री कृपालु जी महराज जी द्वारा ।

श्री कृपालु महाप्रभु श्री गुरूदेव हीं मेरे जीवन का पुरा रोड मैप पहले से तैयार कर रखा था और अपने मिलाने से पहले मुझे अध्ययन के मामले में एकाकी बनाया , हर तरह के अच्छी से अच्छी शिक्षा , पुस्तकों द्वारा हीं नहीं वल्की संसार में भी महान लोगों के सानिध्य के द्वारा और फिर बाद अपने तत्वज्ञान से ओतप्रोत कर दिया ।
इसलिए यह महसूस करता हुं कि गुरू का संबंध एक जन्म का नहीं होता , यह रिस्ता जन्म जन्मांतर का होता है । 
 मैं विवेकानन्द पुरम में कुछ दिन प्रत्येक शाम समुद्र के किनारे बाबा आम्टे के साथ टहलता था ।
एक शाम टहलते हुए उन्होंने मुझसे कहा था उस समय मै छात्र था कौलेज में , एन एस एस में था । " अच्छी अच्छी पुस्तकें पढ़ने की आदत डालो , इससे सोंच अच्छी और उदार होगी , चरित्र और संस्कार का निर्माण होगा, जीवन को सही दिशा मिलेगा, सही दृष्टिकोण बनेगा , वृत्ति शुद्ध होगी जिससे प्रवृत्ति उदार और संयमित होगा । भोगवादी संस्कृति से उपर उठोगे और अपने जीवन को शांती मय बना पाओगे "
" इससे आचरण बदलेगी, और खुद बदल जाओगे ,आचरण बदलेगा तो तुम्हारे कथनी और करनी में फर्क नहीं दिखेगा । इससे परिवार अच्छा होगा , परिवार अच्छा होगा तो समाज भी अच्छा होगा और समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र बदलेगा, और फिर दुसरे युवा को भी प्रेरित करो " 

उन्होंने कहा था कि जीवन के अंतिम समय तक स्वध्याय करते रहना चाहिए अच्छी अच्छी पुस्तकों का । लोग सोचते हैं क्या होगा उम्र गुजर गई । अब तो मरना है !

नहीं ऐसा नहीं सोचना चाहिए । जीवन के अंतिम समय में अच्छी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन , ध्यान और साधना और बढ़ा देना चाहिए । जिससे अंत गति अच्छी होती है और एक नया बढ़िया शरीर मिलता है एक अच्छे संस्कारों के साथ नया जीवन मिलता है । आत्मा दुसरा शरीर धारण कर लेता है और यह एक युग पुरूष के निर्माण की प्रक्रिया है इसमें कई जन्म लेने परतें हैं अध्ययन शील साधक को । 

अब तो श्री कृपालु महाप्रभु के पुस्तकों के अध्ययन बार बार और साधना में हीं मन लगता है संसार के काम के बाद और संसार के काम के दौड़ाने भी गुरूदेव हीं हमेशा साथ रहतें हैं । लेकिन इसके लिए जीवन की चंचलता उच्श्रृखंलता को समाप्त करना होता है । नहीं तो ध्यान साधना में ऐसे लोगों को मन नहीं लगता चाहे कितना भी प्रयास कर लें । अंदर से शांत होना होता है गंभीर होना होता है तब सहज ज्ञान उतारा जाता है गुरूदेव के द्वारा अंत:करण में , फिर रूपध्यान सहज बनता है ।

 व्यक्ति केवल हाड़ मांस का पुतला नहीं है वल्कि विचारो का भंडार है । अच्छे विचारों का भंडार होने के लिए, बहुत अच्छे अच्छे विचारकों और महापुरूषों के पुस्तकों का अध्ययन लगातार करना होता है , साधना एवं उनका संग करना परता है । फिजिकल संग ना हो कोई बात नहीं । 
महापुरुषों का पुस्तक हीं उनका विचार होता है उनका निज स्वरूप होता है । उनकी पुस्तकें हीं उनका साकार रूप होता है उनके जाने के बाद ।
 इसलिए उनके पुस्तकों का संग हीं , अध्ययन हीं और उनके बतलाए सिद्धांतों का अनुसरण हीं उनका वास्तविक संग है । वर्णा तो लोग उनके भौतिक स्वरूप के संग होते हुए भी संग नहीं होते वास्तव में , लाभ नहीं ले पाते हैं । 
इसलिए महापुरुष अपने लीला संवरण के बाद और भी व्यापक हो जातें हैं कडोरों को वास्तविक संग देने के लिए अपना विस्तार कर लेतें हैं । जिससे बहुतों का कल्याण होता है । 
आज हमारा सौभाग्य है कि श्री महाराज जी की दो सौ से अधिक पुस्तकें साधकों के लिए उपलब्ध है । और फिर वार्षिक पत्रिकाएं भी है । हम साधकों के लिए बहुत है । और बांकी लोगों के लिए , बहुत से महापुरुषों के पुस्तके हैं ।‌ पढना चाहिए ।
यह मेरा निजी अनुभव है जो चल रहा है लगातार ।
श्री राधे 
 मैंने अपना अनुभव शेयर किया । धन्यवाद ।🙏❤️🙏

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