उत्तर :- क्योंकि वो स्वयं बुरा होता है ।
" यावत् पापैस्तू मलिनम , ह्रदय्ं तावदेव हि,
न शास्त्रे सत्यता बुद्धि: सद्बुद्धि सद्गुरौ तथा।।"
:- ( ब्रह्मवैर्वत पुराण ) "
जिसका मन बुद्धि चित्त जितना गंदा होता है , वो उतना ही बुरा सोंचता है , बोलता है , और करता है और सुनना पसंद करता है ।
मनुष्य अपने ही गंदे चित्त के कारण , गंदे मन के कारण , गंदे चिंतन के कारण दुसरे के बारे में गलत आईडिया लगा लेता है । दरअसल दुसरे में उसकी खूद कि परछाई दिखती है , खूद के अंदर कि गंदगी दिखाई पड़ती है लेकिन वो बेचारा समझता है कि यह बुराई दुसरे में है , मुझमें नहीं । बेचारे का चश्मा गंदा है , धूल पड़ी है उस पर , अब वो दुसरे को देखता है तो उसको दुसरे के चेहरे पर वही धूल नजर आता है , जबकि हकीकत यह है कि उसके चश्मे के शीशे पर हीं धूल है ।
जाकि रही भावना जैसी,
प्रभु मुरत देखी तीन तैसी ।। तुलसीदास जी।
जिस जीव का मन बुद्धि चित्त जितना दूषित है , उसका नजरिया उतना ही गंदा होता है, और उसी गंदे नजरिए से वो महापुरुष और भगवान के अवतार को भी देखता है तो उसे हर जगह , अपनी ही गंदगी प्रतिबिम्ब होती है । यही वास्तविक कारण है हर किसी में निगेटिव फिलिंग का ।
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।
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