Tuesday, 24 October 2023

संसार में अधिकतर जीव स्वयं को अच्छा और दुसरे को गलत समझता है, यहां तक कि वो महापुरुष और भगवान पर भी सवाल खड़ा करता है , ऐसा क्यों ?

पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी से एक साधक का प्रश्न:- संसार में अधिकतर जीव स्वयं को अच्छा और दुसरे को गलत समझता है, यहां तक कि वो महापुरुष और भगवान पर भी सवाल खड़ा करता है , ऐसा क्यों ?
उत्तर :- क्योंकि वो स्वयं बुरा होता है ।
" यावत् पापैस्तू मलिनम , ह्रदय्ं तावदेव हि,
न शास्त्रे सत्यता बुद्धि: सद्बुद्धि सद्गुरौ तथा।।"
:-  ( ब्रह्मवैर्वत पुराण ) " 

जिसका मन बुद्धि चित्त जितना गंदा होता है , वो उतना ही बुरा सोंचता है , बोलता है , और करता है और सुनना पसंद करता है । 
 मनुष्य अपने ही गंदे चित्त के कारण , गंदे मन के कारण , गंदे चिंतन के कारण दुसरे के बारे में गलत आईडिया लगा लेता है । दरअसल दुसरे में उसकी खूद कि परछाई दिखती है , खूद के अंदर कि गंदगी दिखाई पड़ती है लेकिन वो बेचारा समझता है कि यह बुराई दुसरे में है , मुझमें नहीं । बेचारे का चश्मा गंदा है , धूल पड़ी है उस पर , अब वो दुसरे को देखता है तो उसको दुसरे के चेहरे पर वही धूल नजर आता है , जबकि हकीकत यह है कि उसके चश्मे के शीशे पर हीं धूल है । 

जाकि रही भावना जैसी,‌
प्रभु मुरत देखी तीन तैसी ।। तुलसीदास जी। 

 जिस जीव का मन बुद्धि चित्त जितना दूषित है , उसका नजरिया उतना ही गंदा होता है, और उसी गंदे नजरिए से वो महापुरुष और भगवान के अवतार को भी देखता है तो उसे हर जगह , अपनी ही गंदगी प्रतिबिम्ब होती है । यही वास्तविक कारण है हर किसी में निगेटिव फिलिंग का । 
:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

No comments:

Post a Comment